नंदना पंकज की कविता ‘कौवे की व्यथा’

मैंने तिनका- तिनका चुना
बड़े जतन से घोंसला बुना
अपना संसार बसाया
दे अंडे परिवार बढ़ाया
तन का गर्मी दे सेती रही
माँ की ममता देती रही
कवच तोड़ चूजे निकल आये
मैं रही कलेजे से लगाये
अपनी चोंच से खिलाया निवाला
आँखों के तारों सा पाला
धूप, बारिश, तूफान से बचाया
मैंने उड़ना उसको सिखाया
किंतु जब उसके बोल फूटे
दिल के सारे पुर्जे टूटे
मैंने जिसपे दुलार लुटाया
वो निकला संतान पराया
मेरे अंडों को दिया था बदल
कोयल ने मुझसे किया छल
कोयल जो सुरों की रानी है
दुनिया जिसकी दीवानी है
मीठे बोलों से दिल लुभाती है
जग मुठ्ठी में कर जाती है
कोयल की मक्कारी का
गीत मैंने जब सुनाया
सब ने कड़वा-कड़वा कहके
दूर मुझको मार भगाया
लेकिन इस कड़वे सच को
जब तक मिले न न्याय
अनवरत् चलेगी तब तक
मेरी काँव-काँव,काँय-काँय,

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