नन्दना पंकज की दो कविताएं

बंदिनी का संशय

अब जबकि तुम

लगातार लिख रहे हो

मेरे लिये

प्रेम और मुक्ति की

कविताएँ,

मेरी सुप्त जिजीविषा को

जगाते हुए,

दिखा रहे हो

सपने

उन्मुक्त आकाश के,

भर रहे हो नस-नस में

विद्रोह की चिंगारियाँ,

और तुम्हारे

भावपूर्ण शब्दों के स्रोत से

अद् भुत ऊर्जा जुटाकर

मैं यथाशक्ति

फड़फड़ा रही हूँ

अपने लहूलुहान

कतरे-छँटे पंखों को,

संभव है शीघ्र ही

पिंजरा तोड़ मुक्त हो जाऊँ,

किंतु क्या तुम

आश्वस्त कर सकते हो मुझे

कि बाहर और शिकारी

घात लगाये नहीं

बैठे होंगे

मुझे नोच खाने के लिये,

सुरक्षित रहेगी

मेरी उड़ान

दुनिया के तेज़

नाखूनी पंजों से…

 

रोटी का मूल्य

एक बार फिर

सिद्ध कर दिया तुमने

कि रोटी का मूल्य

किसी भी दौलत से

कहीं अधिक है ,

तभी तो उस भूखे की

दसगर्दा धूनाई की,

जम कर उतारा उसपे

मन की सारी भड़ास,

अधमरा करके छोड़ा उसे

रोटी चुराने के अक्षम्य अपराध में,

देश चुराके खाने वाला

दूर देश में बैठा

अट्टहास कर रहा है

हमारी न्याय व्यवस्था पर,

‘सबसे बड़ा चोर कौन’

इसपर बहस के लिये

संसद में तैयारी हो रही है

जूतम-पैज़ार की।

 

 

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