नंदना पंकज की दो कविताएं

नंदना पंकज  

ज्वार-भाटा

चढ़ती हुई चाँदनी के साथ
चिर-विरह को अभिशप्त
समुद्र के हृदय की
तरल वेदनाएं
उबलने लगती हैं

चाँद का गुरुत्व
बढ़ा देता है
मिलन की आतुरता
और किसी
विक्षिप्त प्रेमी की भाँति
व्यग्र हो छटपटातीं हैं लहरें
दहकते लपटों सी उछलतीं हैं
टीस भरी लालसाएं
प्रेयसी के चेहरे को चूमने
उसे अपने आलिंगन में
डुबो लेने की चाह लिये
कल्पनाओं का ऊँचा आलाप भरके
सामर्थ्य की पराकाष्ठा तक
ऊपर ऊठती हिलोरें
यथार्थ की तलछट पे
पटका खा गिरतीं हैं
निरंतर इसी क्रम में
चल रहे अनंत संघर्ष से
यूं तो अनभिज्ञ नहीं है चाँद
साथ ही ज्ञात है उसे
अपने परिमंडल से भटकने का
परिणाम भी
लीक से हटना
प्रलय का निमित्त हो सकता है
इसी भय से विवश
भावनाओं पे निष्ठुर नियंत्रण
कर रखा होगा शायद
किंतु शांत और निर्लिप्त
लगने वाले चाँद को
जब समुद्र की लवणयुक्त नयनों में
अपना भीगा थरथराता सा
प्रतिबिंब दिखता होगा
कुछ ज्वार तो उसके
अंतस में भी
अवश्य ही उठता होगा

     परिश्रम का फल

‘परिश्रम का फल मीठा होता है।”
बहुत ही बड़ा झूठ है ये,
परिश्रम का फल मीठा नहीं
नमकीन होता है,
क्योंकि सींचा जाता है इसे
श्रमिकों की कभी न
सूखने वाली
पसीने की धार से,
प्रायः घुला होता इसमें
आँसू और लहू का
अतिरिक्त लवण,
और यूं नमक
इतना तेज़ हो जाता है कि
फल खा ही नहीं पाता
श्रमिक
सो जाता है
भूखे पेट..

परिचय : नन्दना पंकज को  कविता लेखन के लिये वर्ष 2005 में   ‘हिंदी अकादमी, दिल्ली’ से पुरस्कृत व वर्ष 2016 में ‘अंग महिला सम्मान’ से नवाजा जा चुका है। वो ग्रेटर  नोएडा में रहती हैं और स्वतंत्र लेखन करती हैं।

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