नीलम नवीन ‘नील’ की तीन कविताएं

खुशियां

सर्द सुबह
गुनगुनी सी धूप
मीठी गर्म चाय
नंगे पावों के नीचे
नर्म दूब
बेसिरपैर की गप्पें
अधखुली कुछ खुली
पोटलियां खुशियों की
थोड़ी शिकायतें
मेरे पास है
तुम्हें देने को
किन्तु आज
व्यस्त तुम
बेहद अस्तव्यस्त हो

खामोशी की खोज

गुनगुनी सर्दियां
आते जाते बादल
ताप व सिहरन के
खट्टे मीठे अहसास
सफेद चांदी सा बर्फीला
हिमालय करता जैसे
मन की कोई बात
रुनझुन रुनझुन
पायल सी तोड़ती
कोई कहीं निश्वास
मदमस्त जिन्दगी
मौन तोड़ते पंछी
सांय सांय वृक्षों की
सारंगी सी बजती
जैसे खामोशी भी
भी खोज रही हो
अपने संगी साथी !

किवाड़ों की सांकल
किवाड़ों की सांकल खोलो
घर, आंगन, देहरी
राह ताकती आने का
तुम आओ तो सही
ले आओ साथ
फिर चहलकदमियां
हंसी और तुनकमिजाजियां
खोज लेना यादें
वो मान मनौव्वल
घर के कोने कोने में
मुस्कराना और कहना
कभी यहीं बैठा मैं
हंसा और रोया था ।
दीमक लगी, धूल भरी
किताबें झाड़ लेना
कहीं मिल जायेगे
कुछ यादों के अवशेष
संजो और सहेज लेना
तुम आओ तो सही
किवाड़ों की सांकल खोलो
घर,आंगन, देहरी
राह ताकती आने का !

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1 Response

  1. Prasoon parimal says:

    खुशियाँ ,ख़ामोशी की खोज और किवाड़ों की सांकल…तीनों एक-पर-एक…साधुवाद नीलम जी !!

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