नीलिमा श्रीवास्तव की दो कविताएं

मै स्त्री

मैं स्त्री
कभी अपनों ने
कभी परायों ने
कभी अजनबी सायों ने
तंग किया चलती राहों में

कभी दर्द में
कभी फर्ज में
कभी मर्ज में
वेदना मिली
इस धरती के नरक में

कभी शोर में
कभी भोर में
कभी जोर में
संताप सहे अपनी ओर से

कभी अनजाने में
कभी जान में
कभी शान में
कुचले गये अरमान झूठी पहचान में

कभी प्यार से
कभी मार से
कभी दुलार से
छली गयी हूॅ मैं स्त्री इस संसार में
तुम औरत हो

जब तक घर के चार दीवारी में हो
लोग तुम्हारी प्रशंसा करेंगे
तुम्हे इज्जत से देखेंगे
जब तुम घर की देहरी पार करोगी
लोगों की पैनी निगाहें तुम्हारा पीछा करेंगी
जब तुम गली से गुजरोगी
छीटाकशी की बौछारें तुम्हारे दामन पर गिरेंगी
गली पार करके
जब अपनी मंजिल पर बढ़ोगी
लोग तुम्हे चरित्रहीन कहने से भी
बाज नहीं आएंगे
किंतु, वाकई में तुम सही हो
मंजिल तक पहुॅचना चाहती हो
तो पीछे मुड़ना मत
लोगों की बातों को
धूल समझ कर झाड़ते हुए
जैसे जा रही हो
बस चलती जाना

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