निर्मल गुप्त की कविता ‘सदाकत का शिनाख्ती कार्ड’

निर्मल गुप्त

सदाकत देखते ही देखते

चौरसी* से कुरेद लेता सख्त से सख्त काठ पर

खूबसूरत बेल बूटे , नाचता हुआ मोर

छायादार पेड़ ,फुदकती गिलहरी , उड़ती तितली

खिला हुआ फूल , खपरेल वाला सुंदर मकान

मटकी लिए जाती पतली कमर वाली षोडशी.

 

उसे मिला हुआ था सरकार बहादुर से

माकूल मुआवज़ा, पेंशन आदि का अस्फुट आश्वासन

दिलासा के ढाढस भरे गोलमटोल अलफ़ाज़

शिल्पकार होने का चित्रमय शिनाख्ती कार्ड.

 

लोग कहते यार सदाकत तू शिल्पकार तो शानदार  है

वह मारे ख़ुशी के लगभग दोहरा  हुआ जाता

पहली फुरसत में  सही दिशा भांप

परवरदिगार के सजदे में सर नवाता

उसे नाज़ था अपनी  हुनरमंदी पर

अक्सर बच्चों सहित अधपेट सोता  

उकता गया आखिरकर.

 

उसने हुनरमंद हाथों को कांख में दबा

मस्जिद के पेश इमाम से पूछा

हज़रत बताएं करूं क्या

जवाब आया – पांच वक्ती नमाज़ी बनो

फिर इससे पूछा , उससे पूछा

एक दुनियादार ने दबी जबान में सलाह दी

मियां छोड़ो ये कारीगरी -वारीगरी

चलो आओ ई- रिक्शा चलाओ.

 

उसने झिझकते झिझकते

बैटरी वाली रिक्शा किराये पर उठाई

चाभी घुमाई ,बेआवाज़ स्टार्ट हुई

दौड़ चली  सड़क पर

वह सवारियां ढोता

जायज़ भाड़ा लेता, मालिक को किराया देता है

पुलिस वाले को नाजायज़  हफ्ता भी

जुम्मेरात को चढ़ा आता पीर पर बताशे

उसके हुनरमंद हाथ अब कतई शर्मिदा नहीं.

 

अधपेट सोना अफसाना हुआ

वह जब कभी चौरसी को देखता

तो उदास हो उठता –बेवजह

घर के सहन में लगी जंग खाई कील पर लटका

डोरे में बंधा शिल्पकार वाला शिनाख्ती कार्ड

हवा के तेज झोंके के साथ डोलता

सदाकत वल्द करमुद्दीन को मुंह चिढाता है.

++++++++++++++++++

चौरसी –लकड़ी पर नक्काशी करने वाला हाथ का औजार

Leave a Reply