नीतेश मिश्र की 4 कविताएं

1. क्या हो कि अगर

क्या हो कि अगर शहर ना हो

तो शायद 

नहीं बिकेंगी शरीर और आत्माएँ

‘इश्क़ में शहर होना’ जैसी सारी संभावनाएं

सिरे से खारिज की जा सकेंगी

नहीं करेगी कोई प्रेमिका

अपने प्रेमी का इंतज़ार शहर के बगीचे में

सभी रास्ते सिर्फ गाँव को जाते हो

क्या हो कि अगर ना हो दालान

बस गाँव की मड़ई हो

और ढिबरी लेकर पढ़ रहा हो उसमें 

कोई ‘नया ज्ञानोदय’

जिनके पन्नों पर छपा हो

कोई नया शहर

क्या हो कि अगर प्रेम ना हो

तो विद्यालय में कितना होगा अनुशासन

कितनी दूरियाँ होंगी

दो लोगों के बीच

चाँद और चांदनी की

वो सारी बातें जो बांध के रखती थी

दो लोगों का दिल 

कहाँ चली जाएंगी

सभी प्रेम की कविताओं को

कौन लगाएगा आग

और कौन लटकायेगा

प्रेम कवियों को सूली पर

क्या हो कि अगर

पुरानी सभी स्मृतियाँ कर लें आत्महत्या

तो मिट जाएगा मेरा पटीदार के साथ झगड़ा

साहूकार कर दे मेरे बाप को पहचानने से इंकार

और भूल जाएं माताएँ अपनी देवी की मनौतियां

भूल जाएँ सब गीता के उपदेश

और पुरानी सभी स्मृतियों की आत्महत्या से

भूल जाएं सब धार्मिक स्थल के दंगे

दूरियां जो ग्रंथों ने रची है

क्या हो कि अगर

ये शहर

इस शहर में प्रेम

प्रेम की सभी स्मृतियां

नष्ट हो जाएँ…

2. अब नाखूनों को बढ़ने दिया है

सीना फाड़ देनी वाली चीत्कार

आहों के पीछे छिपते आँसू

चिल्लाती भीड़

चीखों का नंगा नाच

मारने पीटने की भीषण आवाजें

जरूर किसान होगा

जब उठती चिन्गारियाँ 

दावानल बन जाती है

तो भड़क उठती है 

बिल्कुल किसी ज्वालामुखी की तरह

ये हारा हुआ

दुखी 

विषाद से घिरा किसान

अब -हक माँगने आया था

वो जो लाश पड़ी है न चौराहे के पास

वही किसान है

जो मर चुका है

और मरे लोग वापस नहीं आते

आता है तो मारने वालों का मुआवजा

रोते झींगुरों की आवाजें

आँसुओं के समाचार

और मारने पीटने की आवाजें

इसी प्रतिशोध में 

अब नाखूनों को बढ़ने दिया है

___________

3. कुछ धर्म कुछ पंथ

मैं विषय नही चुन पाता

शायद मुक्तिबोध ने सही कहा था

कि विषयों की अधिकता हो गयी है

पर मैं नहीं लिख सकता मुक्तिबोध की तरह

पर्वतों को स्याह

मुझे अनुमति मिलेगी(?) कहने की 

कि चाँद का मुँह टेढ़ा है

मैं नही रौंद सकूंगा हरी घासों को 

अज्ञेय की तरह

पर देखना है सब कुछ 

आहुति बनकर

मैं नहीं लिख सकता 

देश की परिभाषा

पाश की तरह

और मार्क्स तो अब शब्द ही रह जाय

और इस तरह मैं चीर दूँगा

अपने साहित्य का पन्ना

और सीख लूँगा

कुछ धर्म कुछ पंथ

4. विद्रोही कलम 

वो जला देंगे

उन किताबों को

जिन पर विद्रोह के जिल्द हैं

उन पाडुंलिपियों को 

जो उनके विपरीत जा रही हैं

वो फोड़ देंगे 

तुम्हारी कविताओं का मुँह

और नहाएंगे उस गिरते खून में

फेकेंगे तेजाब 

तुम्हारी कविता के शीर्षक पर

पर लिखना तुम 

लिखना ऐसे कि

झुलस जाए चेहरा उनका 

बिल्कुल तेजाब की तरह

लिखना ऐसे कि

फड़फड़ा उठे तुम्हारे कविता की जीभ

और गिर जाए औधे मुँह

लिखना ऐसे कि

अब अमावस न आने पाए

लिखना ऐसे कि 

जब सदी बाद कोई लौटे

तो प्राप्त हो उसे 

तुम्हारे कविता की फड़फड़ाती जीभ

नीतेश मिश्रा

दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज मेें स्नातक के छात्र। विश्वविद्यालय स्तर की काव्य पाठ प्रतियोगिताओं में काव्य पाठ। मो. नं.- 8934023575

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