नित्यानंद गायेन की पांच कविताएं

उफ़नती  नदी  का  दर्द

और तुम्हारे आंसुओं ने

बता दिया

उफ़नती नदी का दर्द

कमजोर आदमी का दावा

मेरा यकीन था

या भ्रम

कि करता रहा दावा

तुम्हें जानने का !

यह भरोसा अपने भीतर छिपे

उस कमजोर आदमी का दावा था,

जो खुद को जान नहीं पाया

आज तक …….!

मेरा वर्ग

चेहरा,

रंग,

और तन के कपड़े

से तय किया उन्होंने

मेरा वर्ग !

किसी ने

गौर नहीं किया

मेरी भाषा पर !

देशद्रोही

और इस तरह

मैं बन गया गुनाहगार

कि दोस्ती के नाम पर

नहीं दिया मैंने

तुम्हारे गुनाहों में साथ

तुम्हारे

झूठ को नहीं माना

रिश्तों के नाम पर

मैंने वही कहा हर जगह

जो सत्य था मेरे लिए

और अंत में

मैं बन गया

देशद्रोही !

प्रेम ही खुद में सबसे बड़ी क्रांति है

ख़ुशी लिखना चाहता था

लिख दिया तुम्हारा नाम

लिखना चाहता था ‘क्रांति’

और मैंने ‘प्रेम’ लिख दिया

सदियों से

प्रेम ही खुद में सबसे बड़ी क्रांति है .

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *