नित्यानंद गायेन की दो कविताएं

नित्यानंद गायेन

 

अगले वर्ष

अगले वर्ष फिर निकलेगी झांकी राजपथ पर 
भारत भाग्य विधाता 
लेंगे सलामी 
डिब्बों में सजाकर परोसे जाएंगे 
विकास के आंकड़े
शहीदों की विधवाओं को पदक थमाएं जाएंगे
राष्ट्र अध्यक्षों के शूट की चमक और बढ़ जाएगी 
जलती रहेगी अमर ज्योति इंडिया गेट पर 
मूक खड़ी रहेगी लाल किले की दीवार 
भीतर कहीं रो रहे होंगे बहादुरशाह ज़फर –
न मैं मुज़्तरउनका हबीब हूँ न मैं मुज़्तरउनका रक़ीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजड़ गया वो दयार हूँ” |
दबा दी जाएगी आत्महत्याओं की सभी खबरें
भूख, बलात्कार पर कोई बात न होगी 
स्पेस सेंटर मंगल से आगे यात्रा की रूपरेखा प्रस्तुत करेगा 
नए लड़ाकू विमान शामिल होंगे सेना में
भारत माता की जय का जयगान होगा 
देश बस्तर, विदर्भ से होते हुए कालाहांडी फिर उससे आगे निकल जायेगा
हर रोने वाले को ठूस दिया जायेगा जेल में 
जहाँ कोई भी सुन न सके सिसकियाँ तक 
फिर हमारे राष्ट्रीय टेलीविजन पर 
राष्ट्र नायक कहेंगे मन की बात ‘ !
शांतिप्रिय लोग गाँधीजी को देंगे श्रद्धांजलि 
दंगों के बाद |

मैं और तुम 
यूँ ही जीते रहेंगे अपनी -अपनी जिन्दगी
खाना, सोना और साँस लेना 
यही दिनचर्या है |
मैं खुश नहीं कर पाता सबको 
उनकी यही शिकायत बनी रहेगी 
देश में तमाम बदलावों के बावजूद 
मेरे -तुम्हारे अगले साल में कुछ भी नया नहीं होगा

मेरा देश कहाँ  है 

दरअसल यह हत्याओं का दौर है 
पड़ोस में तालिबान, अलक़ायदा और जैश-ए…जैसे संगठन हैं
तो कुछ और दूरी पर है ..काले झंडे वाले आइएसआइएस
इन सबका बाप लोकतंत्र की दुहाई देने वाला अमेरिका है 
सब जानते हैं |
पर सच यह भी है कि मेरे देश में हत्याओं के इस दौर को मिला है 
इक नया नाम -आत्महत्या !
किसान की हत्या बदल जाती है आत्महत्या में,
उसी तरह गरीब, शोषित और दलित को मजबूर किया जा रहा है
आत्महत्या के लिए …
ताकि हत्या के आरोप से बच जायें वे 
खाप को उपयोगी बताया गया है समाज के लिए एक मुख्यमंत्री द्वारा 
उससे पहले एक वजीर ने कहा था – 
लोग तो मरते रहते हैं
गायें बचनी चाहिए !
पुलिस ने पहन ली है ख़ाकी निकर
तिरंगा फहराया गया है
संसद भवन के ऊपर 
जय भारत भाग्य विधाता के नारे लगे जोर से 
मैंने पूछा – कहाँ गया मेरा देश !
मुझे गद्दार कहा गया ..
गालियाँ दी  मेरी  माँ  को

कि उसने  जनम  दिया  एक  गद्दार  को   
मैंने कहा – 
मैं कवि हूँ …
हँसते हुए उन्होंने कहा …चुप रह चूतिये !
राजा के विरुद्ध लिखेगा …तो देश निकाला जायेगा |
वैसे सच बताओ …
क्या यह मेरा ही देश है 
जिसे मैंने इतिहास और भूगोल की किताबों में पढ़ा था !

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3 Responses

  1. रमेश प्रजापति says:

    नित्यानंद गायेन की इतनी बेहतरीन कविताओं से परिचय ही नहीं कराया आपने बल्कि पढ़ने के लिए भी विवश कर गयी ये कविताये। इन कविताओं में विरोध का स्वर मुखरित हुआ है धन्यवाद दोनों मित्रो को

  2. रमेश प्रजापति says:

    नित्यानंद गायेन की इतनी बेहतरीन कविताओं से परिचय ही नहीं कराया आपने बल्कि पढ़ने के लिए भी विवश कर गयी ये कविताये। धन्यवाद दोनों मित्रो को

  3. अनवर सुहैल says:

    नित्यानन्द गायेन की कविताएँ हमारे समय की विडम्बनाओं को स्वर देने का अक्खड़ प्रयास करती हैं। इन कविताओं में याचक की मुद्रा नहीं है। बल्कि ये कविताएँ प्रतिरोध और प्रतिबोधन की कविताये हैं

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