नूर मुहम्मद ‘नूर’ के ग़ज़ल संग्रह ‘सफ़र कठिन है’ से 5 ग़ज़लें

नूर मुहम्मद 'नूर'

जन्म :  17 अगस्त 1952, महसोन, कारखाना मछुआवां, कुशीनगर (उ.प्र)

प्रकाशित कृतियां :  ताकि खिलखिलाती रहे पृथ्वी (कविता संग्रह), आवाज़ का चेहरा (कहानी संग्रह), दूर तक सहराओं में (ग़ज़ल संग्रह), सफ़र कठिन है (ग़ज़ल संग्रह)

पत्र-पत्रिकाओं में नाटक छोड़कर सभी विधाओं में लेखन। अगस्त 2012 में दक्षिण पूर्व रेलवे मुख्यालय से सेवानिवृत्त

संपर्क : जे-18/5, रामनगर लेन, कोलकाता 24

मोबाइल–09433203786

ई मेल–noorluckynoor@ gmail.com

एक

धर्म जब धर्म से बेबात ही लड़ जाता है

आदमी कौन कहे, देश उजड़ जाता है।

अर्थ हर बार बहकते हैं अनर्थों की तरफ़

शब्द से जब भी कोई अर्थ बिछड़ जाता है

जब भी चिंघाड़ के चलती है जुनूं की आंधी

होश का पेड़ भी पत्तों सा उखड़ जाता है

इतना देखा है  कि अब और नया क्या देखें

अब तो ख्वाबों से ख़लल नींद में पड़ जाता है।

फिक्र बिल्ली की तरह ‘नूर’ झपट्टा मारे

चैन चिड़िया की तरह फुर्र से उड़ जाता है।

 

दो

आपको तो आयतें या सिर्फ़ मंतर चाहिए

यानी कि मशहूरियत से ज़्यादा भयंकर चाहिए

रोटियां तालीम बच्चों को मिले या मत मिले

उनका कहना है कि मस्जिद और मंदिर चाहिए

उसके घर में कुछ नहीं है, पर समझ उसकी तो देख

उसको घर के वास्ते ख़ाली, कलंडर चाहिए

रूप से व्यवहार से चाहे असुंदर लोग हों

ज़ोर है इस बात पे कि शहर सुंदर चाहिए

धीरे-धीरे मुल्क, सहरा में बदल जाये भले

शाइरी का नूर तुझको तो समंदर चाहिए

 

तीन

अब ये करतब भी करिश्मा भी दिखाओ लोगों

देश को देश के लोगों से बचाओ लोगों।

सारे मक़तूल भी क़ातिल भी हैं अपने घर के

अपने घर बार को मक़तल न बनाओ लोगों

अब जो बोया है वही काटना होगा सबको

लो ये दहशत है ये नफ़रत! इसे खाओ लोगों

एक जंगल के अंधेरे में फंसी है मख़लूक

अब तो मिलजुल के कोई आग जलाओ लोगों

अपने धर्मों से कहो और वो सीखें तहज़ीब

अब ये जोखिम भी सरेआम उठाओ लोगों

फिर से बन जाएंगे ये दैरोहरम टूट के भी

टूटकर दिल न जुड़े दिल को बचाओ लोगों।

चार

स्याह दिन जिस तरह कामगारों के हैं

रंग  यूं आज मेरे विचारों के हैं।

झंडियां, ख़्वाब की किर्चियां, सिसकियां

अब सहारे यही बेसहारों के हैं।

गो अंधेरे में डूबे हुए घर हैं सब

सारी बस्ती में चर्चे सितारों के हैं।

सुख तलक जा न पाएंगे ये रास्ते

रास्ते दूसरे दुख के मारों के हैं।

लाख उनकी समाधि पे फूंके गए

क़ब्र के खंडहर जांनिसारों  के हैं।

बेच डाले गए रंग हर रूप के

आज तो रंग बस रंगदारों के हैं।

दुश्मनी भी निभाते  नहीं ठीक से

हाल बेहाल भी आज यारों के हैं।

भर के फिरते हैं अलफाज़ में स्याहियां

‘नूर’ किस्से यही नूरदारों के हैं।

पांच

जब शाम डराती है तो डर क्यों नहीं जाता

मैं सुब्ह का भूला हूं तो घर क्यों नहीं जाता।

ये वक्त ही दुश्मन है सितमगर है, अगर तो

मैं वक्त के सीने में उतर क्यों नहीं जाता।

सिमटा है अंधेरों में उजाले की तरह क्यों

यह दर्द मेरे दिल का बिखर क्यों नहीं जाता।

आज़ाद हूं तो फिर मेरी परवाज़ किधर है

नश्शा ये ग़ुलामी का उतर क्यों नहीं जाता।

हर रोज़ ही डंसता है उजाले को हवा को

वह सांप विषैला है तो मर क्यों नहीं जाता

क्या है जो उभरता है मेरे ज़ेहन में अक्सर

क्या है जो झिझकता है संवर क्यों नहीं जाता।


‘सफ़र कठिन है’ ग़ज़ल संग्रह का प्रकाशन कोलकाता के प्रतिश्रुति प्रकाशन ने किया है। 033-22622499 पर प्रकाशक को फोन कर  इस पुस्तक को प्राप्त किया जा सकता है

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