नूर मुहम्मद ‘नूर’ की पांच ग़ज़लें

एक

और कब तक लहू जलाऊं मैं
और कितनी ग़ज़ल सुनाऊं मैं

तीरगी सुनके, मुस्कुराती है
नग़्म-ए-नूर गुनगुनाऊं मैं

याद रहते हैं दर्दोग़म उसके
दर्द अपना ही भूल जाऊं मैं

जादु-ए-लफ्ज़, बेअसर बेजां
फिर भी जादू यही जगाऊं मैं

नूर उसको , न भूल पाऊंगां
काश! उसको ,जो याद आऊं मैं

 दो

अपने ही हाथ से फिसल जाऊं
जी में आए कहीं निकल जाऊं

हो रहे हैं कमान से तेवर
मैं कहीं तीर सा न चल जाऊं

अपने ही दिल की, आग से इकदिन
डर है मुझको, कहीं न जल जाऊं

देख लूं , मैं भी वक्त में धंस कर
क्या पता मैं भी कुछ उबल जाऊं

नूर गिर-गिर के थक गया हूं बहुत
जी में आता है कुछ संभल जाऊं

तीन

कहां पटती, पटाए जा रहा हूं
हर इक से बस, निभाए जा रहा हूं

सुनानी जबकि मुझको गालियां थी
ग़ज़ल तब भी सुनाए जा रहा हूं

किसी के काम क्या आउंगा लिखकर
बस अपने को भुनाए जा रहा हूं
पता है, रौशनी होनी नहीं है
चराग़ेदिल, जलाए जा रहा हूंअंधेरा , तिश्नगी , नाकामयाबी
कमाना था कमाए जा रहा हूं

चार

फेसबुक क्या है ? एक दरिया है
शे’र कहता हूं डाल देता हूं

ढ़ाल कर लफ्ज़ेसंग में खुद को
आसमां में उछाल देता हूं

इसलिए टूटते नहीं सपने
अपने ख़ूं में उबाल लेता हूं

बस अंधेरा बना रहे,, घर से
नूर को मैं, निकाल देता हूं

पांच

ये नई चोट तो नहीं लगती
ख़ामख़ा छटपटा रहे हैं लोग

शोर है इस तरफ की बस्ती में
और उस ओर जा रहे हैं लोग

जिंदगी क्या इसी को कहते हैं
ज़िंदगी को चबा रहे हैं लोग

सिर्फ बातों से कुछ नहीं होगा
सिर्फ बातें बना रहे हैं लोग

उड़ रहे हैं गुबार, गुलशन में
जाने क्या गुल खिला रहे हैं लोग

फिर नए लफ्ज़ आ गए उड़कर
तालियां फिर बजा रहे हैं लोग

रोज़, ग़र्क़ेअज़ाब होते हैं
रोज़ गंगा नहा रहे हैं लोग

अपनी शुहरत पे बुत चरागां हैं
बुत बनाकर जला रहे हैं लोग

अब कटोरे हैं हाथ में उनके
रोजी-रोटी कमा रहे हैं लोग

पेश आते हैं दोस्तों की तरह
दुश्मनी भी निभा रहे हैं लोग

बात बिल्कुल नहीं है हंसने की
जाने क्यों मुस्कुरा रहे हैं लोग

भूनकर , मज़हबी जुनूनों पर
एक दूजे को खा रहे हैं लोग

इतने तारे फलक पे क्या होंगें
जितने नारे लगा रहे हैं लोग

खुद ठिकाना नहीं है रहने का
ईशस्थल बना रहे हैं लोग

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