नूर मुहम्मद ‘नूर’ की 2 ग़ज़लें

नूर मुहम्मद 'नूर'

जन्म : 17 :08 :1952

गांव :महासन, डाक : महुअवां कारख़ाना, जनपद : कुशीनगर।

पिछले 5 दशक से निरंतर लेखन।

हिंदी की तमाम पत्र- पत्रिकाओं  में अनगिनत रचनाओं का प्रकाशन। अबतक चार किताबें प्रकाशित। एक लंबी कविताओं, एक कहानियो और दो ग़ज़लों की। भारतीय रेलवे में 36 साल सेवा देकर, 2012 में सेवा निवृत्त। सम्प्रति स्वतंत्र लेखन।

 

प्रकाशित पुस्तकें :  ताकि खिलखिलाती रहे पृथ्वी (कविता संकलन), दूर तक सहराओं में (ग़ज़ल संकलन), आवाज़ का चेहरा (कहानी संकलन), सफ़र कठिन है (ग़ज़ल संकलन)

सम्पर्क : नूर मोहम्मद नूर / 18/5 रामनगर लेन, कोलकाता 700024. प. बंगाल।

 

नूर मुहम्मद ‘नूर’ के शीघ्र प्रकाश्य ग़ज़ल संग्रह ‘सबका शायर’ से दो ग़ज़लें

 एक

रात-दिन, शायरी  नहीं  अच्छी

इतनी  आवारगी   नहीं  अच्छी

शक  भरी  दोस्ती  नहीं  अच्छी

छोड़ ये  आशिक़ी  नहीं  अच्छी

कोई  चांदी,   तो कोई  सोना  है

कौन  सी  स्त्री    नहीं     अच्छी

अब तो यलग़ार बोल  दे,  उठकर

उफ्फ!  तेरी  बेबसी   नहीं  अच्छी

अब तू कुछ कर भी रौशनी के लिए

देख! ये   बे-हिसी   नहीं   अच्छी।

अगस्त के आखिरी हफ्ते में उपलब्ध होगा

दो

चेहरा – चेहरा नक़ाब, क्या  कीजै

अब यही  है   हिसाब   क्या  कीजै

पूरा     किरदार,   जानवर    जैसा

हाथ  में  है   किताब, क्या  कीजै

ख़ार   हंसते   हैं,   मुस्कुराते    हैं

रो   रहा  है   गुलाब, क्या   कीजै

ख़ून  सस्ता  है,  हर   कहीं   मेरा

और  मंहगी शराब,   क्या    कीजै

रोज़  लिख – पढ़ भी मैं  रहा, लेकिन

हो  रहा  हूं  ख़राब   क्या   कीजै

—-

इस ग़ज़ल संग्रह की प्री-बुकिंग शुरू हो  चुकी है। जितनी प्रति बुक होगी, उतनी ही प्रति प्रकाशित की जाएगी। अपनी प्रति आज ही सुरक्षित करें।

 

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *