नूर मोहम्मद ‘नूर’ की दस ग़ज़लें

एक

बे-देश हो रहल बा जे हिंदोस्तान में
हरछन समा रहल बा हमर देह-परान में

कुछ ए तरा से लोग बा नेतन के मन में, ओह
जइसन के गंदगी हो भरल नाबदान में

चहुंओर चित होके पड़ल बा तमाम देश
पर झंडा उड़ि रहल बा गजब आसमान में

भासा सभे के, देख ल, दुमदार हो गइल
अगियो कहां बा आज केहू के जुबान में

काहे तू बार – बार, अंहारे गिरे ल नूर
अब्बो कहीं कमी बा हो तहरी उड़ान में।

दो

बाघ लिक्खेनी, शेर लिक्खेनी
हम का तीतर-बटेर लिक्खेनी

आंखि आपन तरेर लिक्खेनी
हम तबीयत से शेर लिक्खेनी

देस भर में, सड़क से संसद ले
जउन हो ता , अन्हेर लिक्खेनी

तीन

बा अंहरिया , जवान चारु ओर
नूर के , इम्तेहान चारु ओर

एगो बस आदमी, गिरत जा ता
उठि रहल बा मकान, चारू ओर

जांगरन के त जइसे, लू मरलस
एक्के जइसन थकान चारू ओर

एगो बस हंसि रहल बा, मुअ ‘ना, भर
रो रहल संविधान , चारु ओर

इंडिया में , बदल रहल दे ख
नूर हिंदोस्तान , चारू ओर

 चार

आह। क्या ख़ूब भा रहा है मुझे
मेरा ग़ुस्सा कमा रहा है मुझे

आग अबतो भिगोए, सुब्होशाम
और दरिया जला रहा है मुझे

सोचता हूं कि क्यों अंधेरा, नूर
रातभर गुनगुना रहा है मुझे

शे’र वह, जो चमक के बुझ जाए
सच कहूं तो , गंवा रहा है मुझे

किसकी दस्तक ये दिल के दरवाज़े
कौन अब याद आ रहा है मुझे

पांच

बात – बे – बात ढ़ूढ़ती है मुझे
इक मुलाक़ात ढ़ूढ़ती है मुझे

फिक्रोफन में सुख़न में शे’रों में
मेरी औक़ात ढ़ूढ़ती है मुझे

अपनी हद में रहे, कहो उससे
किस की सौग़ात ढूंढती है मुझे

तीरगी, सुन! कहीं छुपा मुझको
नूर की ज़ात ढ़ूढ़ती है मुझे

छह

डूबता हूं, उभरता हूं मैं
इस तरह जीता, मरता हूं मैं

हर जगह, हर गली, हर सड़क
थरथराता, गुज़रता हूं मैं

बस यही, ज़िंदगी है मेरी
टूटता हूं , बिखरता हूं मैं

नूर हूं, इसलिए आजतक
तीरगी को अखरता हूं मैं

अब ग़ज़ल ही मेरा आईना
देखता हूं , संवरता हूं मैं

सात

मेरे दिल में ये जल रहा क्या है
अब ये मत पूछ, चल रहा क्या है

ख़ुद ही अब देख ले उतर करके
फ़िक्रोफ़न में उबल रहा क्या है

कब संभालेगा रे, ज़मीं अपनी
यूं हवा में उछल रहा क्या है

बंद भी रख , कभी ज़ुबां अपनी
मुंह से तेरे निकल रहा क्या है

तीरगी ही, तेरी कमाई है
अब उजाले में पल रहा क्या है

आठ

सारी खुशियों से मैं ख़लास रहूं
आज दिल, कर रहा उदास रहूं

दूर हो जाऊं, दूर जो मुझसे
जो नहीं पास, उसके पास रहूं

कितनी उरयानियत है दुनिया में
क्यों न कल के लिए कपास रहूं

रौशनी ही न , जब मुझे चीन्हे
क्यों न फिर तीरगी- श्नास रहूं

ख़ुश्हवासी कभी तो , आएगी
जाने क्यों नूर, बदहवास रहूं

 नौ

पानी उठा रहा है
पानी बिठा रहा है

कैसे इसे बुझाऊं
पानी जला रहा है

पानी में सुब्ह ही से
पानी नहा रहा है

ये कौन है जो ऊपर
पानी बना रहा है

इक पानीदार सेवक
पानी गंवा रहा है

ग़ज़लों से नूर, अपनी
पानी कमा रहा है

दस

ख़ूं – सना ज्यों , कोई मंज़र हूं
लाश बच्चों की, मैं अक्सर हूं

सांप हूं मैं , आस्तीनों का
आदमी जैसा, मैं खंजर हूं

दी गई जो तोड़, वो मस्जिद
बन नहीं पाया , वो मंदर हूं

दुख मुझे, दिखता नहीं अपना
किसके सुख का, मैं सुख़नवर हूं

कुछ, उगा पाया नहीं अबतक
आजतक, लफ़्ज़ों में बंजर हूं

घाघ नंबर एक का, चुप्पा
जीभ लेकिन देख , गज़ – भर हूं

यूं तो पेशा , रहज़नी मेरा
मोतबर मैं , नूर रहबर हूं

One comment

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