नूर मुहम्मद ‘नूर’ की पांच कविताएं

अंधे और बटेर

जब से अंधों के हाथ
लगी है बटेर
अंधे हरा – हरा
हंस रहे हैं
उन्हें चारों ओर
बस हरा-हरा सूझ रहा है

उनकी धृतराष्ट्र आंखों में
नई सदी के
हरे – हरे सपने हैं
नक़्शे हैं
लगातार बजाते हुए ताली
और करते हुए जुगाली
वे पतझड़ में
वसंत की
कमेंट्री कर रहे हैं

ऐसे में आंख वाले
अंधेरे में
बस टो – टटोल रहे हैं
टटोल रहे हैं
कनपट्टी के इर्दगिर्द कान
मुंह में ज़ुबान।

बेनाम

कल्पना में
पहले मैने
उसका एक
सुंदर चित्र बनाया
फिर मेघों का रंग
उसकी घनी केशराशि में भर
नक्षत्र एक तोड़
उसके ललाट पर
चिपका दिया
फिर गुलाब की
पंखुड़ियों को
उसके गाल – होंठों पर मल
उसके दांतों की क़तारों में
बिजलियां उंडेल दीं
आकाश का सारा नील
सागर की सारी गहराई
उसकी आंखों में निचोड़
मैने सुगंधित हवाओं को
उसके दुपट्टे में बांधा
फिर उस पर
अपना नाम लिख दिया
और बेनाम हो गया।

मां

वो
पड़ी गली में
परचून की रद्दी काग़ज़ सी
वो सूखी – सिकुड़ी, मुरझाई
लिजलिजे मांस की गठरी
मइया! किसकी मां है
क्यों वो रो पड़ती है अक्सर
फफक – फफक कर
फैला अपनी बांह
लिजलिजी।

कविता नहीं होती तो…

कविता नहीं होती
तो शायद मैं भी नहीं होता
मैं नहीं होता तो कविता भी
नहीं होती शायद
कविता ने मुझे
मैंने कविता को बड़ा किया
मैंने कविता को
कविता ने मुझे खड़ा किया
कविता ने मुझे
मैंने कविता को बचाया
मैंने कविता को कितना बचाया
यह तो ठीक – ठीक मुझे नहीं पता
पर मुझे कविता ने ही बचाया
जैसे वो बचाती आई मूल्यों को
सभ्यता – संस्कृति, दुनिया को
कविता सभ्य मनुष्य की
एक और सभ्यता
एक और संस्कृति
कविता ने मुझे हरबार
हर जगह बचाया
कविता ने मुझे बेशऊर
मग़रूर होने से बचाया
बचाया मशहूर होने से
कविता ने मुझे अमीर
होने से बचाया
बचाया मुझे फ़क़ीर होने से
कविता को, कविता होने से
मैंने कितना बचाया
यह तो मुझे नहीं मालूम
पर कविता ने
मुझे कवि होने से
ज़रूर बचाया
और भरपूर बचाया
और मैं बना रहा
एक मामूली आदमी बदस्तूर
जी हुज़ूर।
मुझे कविता ने ही बचाया
और मैं भी बचाता रहा
कविता को शायद।

 विता और पुरस्कार

इस महादेश के
तमाम महानगरों
नगरों, कस्बों और
गांवों में
चारों ओर
छितराए पड़ी हैं
दो ही चीज़ें
पुरस्कार और कविताएं
कविताएं और पुरस्कार
कवि चुन रहे हैं कविताएं
कवि चुन रहे हैं पुरस्कार
कविताएं पुरस्कृत
कवि चमत्कृत।
कवि पुरस्कृत
कविताएं चमत्कृत।

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2 Responses

  1. Neena Sahar says:

    कविता ने मुझे
    कवी होने सर बचाया
    कविता ने मुझे बेशऊर
    मग़रूर होने से बचाया

    बहुत बहुत बधाई नूर मुहम्मद नूर जी… इस बहुत खूबसूरत रचना के लिए ।
    अनेक शुभकामनायें

    सादर
    नीना सहर

  2. राजकिशोर राजन says:

    कविता ने मुझे
    मैंने कविता को बड़ा किया
    मैंने कविता को
    कविता ने मुझे खड़ा किया
    जिंदगी और कविता से अजहद प्यार करने वाले
    कवि मे ही इतना आत्मविश्वास हो सकता है। इस कविता के लिए बहुत बहुत बधाई।ऐसी कविता ही कविता की दुनिया को हमेशा जिन्दा रखेगी।दिल्ली दरबार वाले पतझर मे वसंत की कमेंट्री करते रहें।

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