नूर मुहम्मद ‘नूर’ की 2 ग़ज़लें

एक

आग दिल की एक है, आंखों का  पानी एक है

हम  ग़रीबों के   मुक़द्दर    की कहानी एक है।

नित नए अनुभव, नई चोटें, नई अनुभूतियां

तेरी-मेरी  ज़िन्दगी  वरना   पुरानी  एक  है।

ज़ख़्मे दिल तूफ़ान सपने  हौसले  तन्हाइयां

वक़्त ने जो हमको बख़्शे हैं, निशानी एक है।

अब  कहां आदर्श नैतिकता चरित्रों की महक

मुझमे तुझमे आदमियत की निगरानी एक है।

नूर खिल पाती नहीं क्यों फूलफल की वादियां

गो कि सबकी चाहतों की बाग़बानी एक है।

दो

क्या हुआ जो घर नहीं, खुशियां नहीं कंगाल हूं

पर अदब की दौलतोज़र  से तो मालामाल  हूं

कम से कम यूं देख तो सकता हूं मैं दुनिया के

ग़म  मुब्तलाए  गर्दिश  दौरां  सही  पामाल हूं

वह, अभी जो क़ैद अंधेरों में  कल चमकेगा जो

मैं वही  तारीख  हूं  दिन  हूं महीना -साल हूं।

वह चना लोहे का तोड़े दांत फौलादों  के जो

वह, जो हर पानी में गल सकती नहीं वो  दाल हूं

कल  हवाओं में जो लहराएगा दस्तेमुफलिसी

मैं  वही  बेरंग परचम हूं, वही रूमाल हूं।

 

मुब्तलाए–फंसा हुआ, गर्दिश दौरां–बुरा समय

पामाल–पद-दलित, दस्तेमुफलिसी–गरीबों के हाथ

 

 

 

 

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