नूर मुहम्मद नूर की पांच ग़ज़लें

एक
क्या पता क्यों खुशी सी होती है
ज़िन्दगी ज़िन्दगी सी होती है
ऐ अंधेरो! अभी जरा ठहरो
मुझमें कुछ रौशनी सी होती है
किससे पुछूं, कोई बतलाए क्यों?
दोस्ती दुश्मनी सी होती है
दिल भी घबरा रहा है हैरत से
उसमें कुछ आशिक़ी सी होती है
कौन बतालाए शायरी मेरी
सच में क्या शायरी सी होती है?
दो
क्या बताऊं कहां मैं रहता हूं
वहशियों के जहां में रहता हूं
मैं ही वो आग जो भभकती है
और अक्सर धुआं में रहता हूं
तिरगी की कहानियां लिखूं
नूर की दास्तां में रहता हूं
अपने अल्फाज की तरह मैं भी
वादी-ए-बेजुबां में रहता हूं
जैसे वो इंडिया में रहता है
मैं भी हिन्दोस्तां में रहता हूं
तीन
हवा से, रोशनी से, ज़िन्दगी से
मैं आजिज आ न जाऊं शायरी से
भरोसा तोड़ता फिरता हूं सबका
मैं क्या बोलूं अपने आदमी से
मैं सहरा से ज्यादा कुछ कहां था
वही रिश्ता प्यासा तिश्नगी से
यही काम आएगी ऐ नूर भाई
भरोसा हो चला है तिरगी से
ये दुनिया और उसकी दुनियादारी
फकत देखा करूं बस बेबसी से

चार
प्यार करना गुनाह होता है
ख्वामखा दिल तबाह होता है
और कुछ भी तो शेर पे कहिए
ये क्या बस वाह वाह होता है
सच हमेशा से ही फकीर-ए-वक्त
झूठ ही बादशाह होता है
कौन पहने भी ताज सा उसको
नूर तो कजकुलाह होता है
खुद से ही अब मेरी नहीं पटती
जैसे तैसे निबाह होता है

पांच
ज़िन्दगी के नए सवालों सा
मुझमें अब भी है वो खयालों सा
जो है बाहर, वही अंदर भी
हर घड़ी रात-दिन बवालों सा
एक वो ही नहीं है अफसुर्दा
नूर भी खुल्द के निकालों सा
अब बहुत खुश हूं पेट में उसके
वो मुझे खा गया निवालों सा

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