आशीष कुमार त्रिवेदी के उपन्यास ‘तुम्हारे लिए’ का एक अंश

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उपन्यास अंश

आशीष कुमार त्रिवेदी के उपन्यास ‘तुम्हारे लिए’ का एक अंश

मदन से मिलने के बाद से जय और भी बेचैन हो गया था। मन में उथल पुथल मची थी। इतना सब कुछ होने के बाद भी क्या वृंदा उस पर विश्वास करेगी। यदि उसने मिलने से मना कर दिया तो क्या होगा।

दरअसल जय की उलझन का कारण यह नहीं था कि वृंदा क्या निर्णय लेगी। वह तो अपने मन को ही नहीं समझ पा रहा था। आखिर क्यों उसका मन इस तरह वृंदा की तरफ आकर्षित था। क्यों वह चाहता था  कि वृंदा एक बार उससे मिल ले। उससे मिल कर आखिर वह क्या बताना चाहता था।

कभी कभी उसे लगता था कि कहीं वह अनजाने ही वृंदा से प्रेम तो नहीं करने लगा है। इन दिनों जिस तरह वह उसके दिलो दिमाग में छाई रहती थी उससे तो यही आभास मिल रहा था। जो भी हो वह किसी भी तरह एक बार वृंदा से मिलना चाहता था।

जब मदन ने उसे सूचना दी कि वृंदा उससे मिलने को तैयार है तो वह मन ही मन सोचने लगा कि आखिर उससे बात क्या करेगा। वह जानता था कि जब वृंदा उससे मिलने आएगी तो चुभती हुई निगाहों से उसे देख कर पूछेगी ‘कहिए क्यों मिलना था आपको?” तब उसके लिए जवाब देना कठिन होगा क्योंकि यह सवाल तो वह स्वयं अपने आप से करता था। फिर भी वह इस सवाल के अलग अलग जवाब सोचता रहा। लेकिन कोई भी जवाब उसे ही संतुष्ट नहीं कर पा रहा था।

अब उसे लगने लगा था कि सचमुच ही वह वृंदा को चाहने लगा है। तभी तो बिना किसी ठोस वजह के  वह उससे मिलने को बेकरार है। अब एक नया सवाल उसे मथने लगा। वह कभी वृंदा से ठीक तरह से मिला भी नहीं । दो बार ही दोनों एक दूसरे के सामने आए। उन परिस्थितियों में प्यार होना तो असंभव लगता है। लेकिन उसे वृंदा से प्यार शायद तब ही हुआ था जब वह रिहर्सल के दौरान रंगशाला आई थी। तब उसके आत्मविश्वास, अपने मकसद के लिए उसके जुनून ने उस पर जादू कर दिया था। उसका प्यार वृंदा की सुंदरता पर रीझ कर नहीं हुआ था। वह तो वृंदा के भीतर की आग से प्रभावित हो गया था। वह आग, वह लगन जो उसके अपने अंदर नहीं थी।

जय के दिल में प्रेम की आग जल उठी थी। जिसे अब वह साफ समझ पा रहा था। अतः उसने अपने दिल की बात वृंदा को बताने का निश्चय किया।

जय विक्टोरिया पार्क में बैठा वृंदा की प्रतीक्षा कर रहा था। करीब पाँच मिनट बाद ही वह उसके सामने खड़ी थी।

“बताइए क्यों बुलाया था आपने?” वृंदा ने तल्ख स्वर में पूछा।

पहली बार वृंदा उससे सीधे मुखातिब हुई थी। जय कुछ पलों के लिए उसे देखता रहा।

“बोलिए भी। मेरे पास इतना समय नहीं है।”

जय ने खुद को काबू कर मन ही मन अपने विचारों को व्यवस्थित किया। वह अपनी बात कहने ही जा रहा था कि अचानक पुलिस वालों ने दोनों को घेर लिया।

“यू आर अंडर अरेस्ट…” अंग्रेज़ पुलिस इंस्पेक्टर ने वृंदा से कहा।

“यू कैन लीव मिस्टर जयदेव…” इंस्पेक्टर उसकी तरफ मुड़ कर बोला।

जय की कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा कैसे हुआ। उसने वृंदा के चेहरे की तरफ देखा। उसके चेहरे पर ठगे जाने का भाव था। आँखों में जय के लिए नफरत झलक रही थी। पुलिस वृंदा को उसकी आँखों के सामने से ले गई। वह बुत की तरह खड़ा रह गया।

जय बहुत देर तक पार्क की बेंच पर सर झुकाए बैठा रहा। ‘पुलिस को वृंदा के यहाँ होने की सूचना किसने दी?’ वह अंदाज़ नहीं लगा पा रहा था। वृंदा उससे इस पार्क में मिलने वाली है इस बात की जानकारी केवल मदन को ही थी। ‘तो क्या मदन ने……’ अपने मन में उठते इस सवाल को उसने तुरंत ही खंडित कर दिया।

वृंदा के चेहरे के भाव उसकी आँखों में किसी तस्वीर की तरह बस गए थे। बार बार उसके बारे में   सोच कर उसका कलेजा कट रहा था। वह तो इस उम्मीद से आया था कि अपने मन की बात उससे कहेगा। लेकिन जो हुआ उसने वृंदा की निगाहों में उसे -धोखेबाज़ बना दिया। 


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