सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव के आने वाले उपन्यास ‘ये इश्क बड़ा आसां’ एक अंश

उसने ध्यान से अहोना की ओर देखा। 50 फीसदी से ज्यादा बाल सफेद हो गए थे। कच्चे-पके बालों की मिलावट ने उसके व्यक्तित्व को और निखार दिया था। उम्र 55 के आसापास तो थी ही लेकिन चेहरे पर बुढ़ापे की दस्तक अभी नहीं पड़ी थी। गोरा चेहरा पहले की तरह ही दमक रहा था।

कान और नाक में पहले की तरह ही छोटी-छोटी बूंदें। लिपस्टिक आज भी नहीं लगाया था। सफेद छोटे-छोटे लाल फूल कढ़ी साड़ी में फब रही थी। लग रहा था किसी स्कूल की कड़क प्रिंसिपल है।

अनमित्र ने एक चीज़ बड़े ध्यान से लक्ष्य किया और चौंक गया। अहोना के मेकअप करने की आदत में अनमित्र की पसंद आज भी झलक रही थी। उम्र के इस पड़ाव में भी वो वैसा ही मेकअप कर रही थी, जैसा उसने कॉलेज के दिनों में अनमित्र से वादा किया था।

‘मेरी ही तरह उसपे तेरे हुस्न का असर है
उम्र तुझे दूर से ठिठक के देखती है।

अहोना ने जवाब देने की जगह उसकी ओर मुस्कुरा कर देखा था।

‘बालों को छोड़ दें तो तुम पर तो उम्र का कोई असर दिखता ही नहीं’

‘बुढ़ापे में अच्छा फ्लर्ट कर लेते हो। जवानी में तो ये सब नहीं करते थे तुम?’ अहोना ने मजाकिया अंदाज़ में कहा।

‘नहीं, बूढ़ा नहीं कह सकती तुम मुझे। देखो मेरे एक भी बाल सफेद नहीं हुए हैं।’ अनमित्र ने मुस्कुराते हुए कहा था।

‘जब एक भी बाल सिर पर है ही नहीं तो फिर क्या काला, क्या सफेद’
दोनों ठठाकर हंस पड़े थे। मानो एक बार फिर कॉलेज पहुंच गए हो। मानो रेलवे स्टेशन पर नहीं, कॉलेज के कॉमन रूम में बैठे हों लेकिन व्यस्ततम स्टेशनों में से एक सियालदह स्टेशन ने शोर मचा-मचा कर बता दिया कि वे रेलवे स्टेशन पर ही है।

दोनों लौट आए। अतीत ऐसी जगह नहीं, जहां ज्यादा देर तक रूका जा सके।

अनमित्र ने एक लंबी सांस लेते हुए कहा—हां, बूढ़ा तो हो गया हूं। चेहरे पर हल्की-हल्की झुर्रियां पड़ गई हैं। पूरी तरह गंजा हो गया हूं। आंख पर पॉवरफुल चश्मा चढ़ गया है। फ्रेम भी कितना गंदा सा है। बहुत भद्दा लग रहा हूं ना?

‘सुंदर कब थे तुम?’ अहोना ने तिरछी नजर से देखा था उसे, ‘बस दूसरे सुंदर लगते थे तो उनका मजाक जरूर उड़ाते थे तुम’

फिर हंसा था अनमित्र—लिपस्टिक वाली बात का बदला ले रही हो ना?
‘नहीं, मैं लिपस्टिक लगाती ही नही। सिर्फ शादी और बहू भात के दिन लगाना पड़ा था वो भी इसलिए क्योंकि सजाने के लिए ब्यूटी पॉर्लर से ब्यूटिशियन आई थी।’

अनमित्र ने एक गहरी सांस ली थी।

‘लेकिन क्यों अहोना? मेरा एक गंदा सा मजाक और उस पर तुम्हारी ये भीष्म प्रतिज्ञा । आखिर तुम जिंदगी भर अपने आपको ये सजा क्यों देती रही?’

‘ये बात तुम नहीं समझ पाओगे’
‘हां, बुद्धू हूं मैं’ अनमित्र की आंखों के आगे श्रावणी का चेहरा आ गया, जो चिल्ला-चिल्ला कर कह रही थी—
बुद्धू! बुद्धू!! बुद्धू!!! बुद्धू!!!!

क्या वो सचमुच बुद्धू ही है। उसने अहोना की आंखों में झांक कर देखने की कोशिश की कहीं वो भी उसे बुद्धू तो नहीं समझती लेकिन चश्मे ने साथ नहीं दिया। नजदीक का पॉवर अभी तक वो ग्लास में लगा ही नहीं पाया है। इसलिए पास होकर भी वो आंखें उससे दूर थीं। बहुत दूर। कुछ नहीं देख पाया।

उसने चश्मा उतार लिया। रूमाल से पोंछने की कोशिश की तो अहोना ने उसके हाथ से चश्मा ले लिया। अपनी सफेद साड़ी से वो चश्मे को साफ करने लगी। अनमित्र मन ही मन बोल उठा।

मेरा चश्मा तुम्हारा रूमाल था
ये भी तो प्यार का इक़बाल था

कॉलेज के जमाने में भी उसका चश्मा अहोना ही अपने रूमाल से साफ कर दिया करती थी। हालांकि तब माइनस पॉवर था और वो भी बहुत कम। अब तो माइनस-प्लस दोनों है। ज़िन्दगी में शायद ऐसे ही संतुलन आता है—प्लस भी,माइनस भी लेकिन वो अपनी ज़िन्दगी को अभी संतुलित नहीं कर पाया था। माइनस पॉवर लगाना अभी बाकी है।

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