ओम नागर की 7 प्रेम कविताएं

ओम नागर

20 नवम्बर, 1980 को गाँव -अन्ताना, तहसील -अटरु, जिला- बारां  ( राजस्थान ) में  जन्मे ओम नागर ने कोटा विश्वविद्यालय,कोटा से  हिन्दी  एवं राजस्थानी में स्नातकोत्तर और  पी-एचडी की उपाधि प्राप्त की। हिन्दी एवं राजस्थानी साहित्य में कवि,अनुवादक और डायरी लेखक के रूप में  विशिष्ट पहचान रखने वाले युवा कवि- लेखक ओम नागर के अब तक हिंदी में दो कविता संग्रह ” देखना एक दिन”-2008 , “विज्ञप्ति भर बारिश ” -2015 एवं भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा पुरस्कृत एवं प्रकाशित हिंदी कथेतर गद्य ( डायरी ) ” निब के चीरे से ” -2016 और ” तुरपाई ” ( प्रेम की कुछ बातें,कुछ कविताएँ ) -2019 में प्रकाशित। 

राजस्थानी भाषा में तीन कविता संग्रह-” छियांपताई -2003  “, ” प्रीत “- 2005  और ” जद बी मांडबा बैठूँ छूँ कविता “-2011, कथेतर गद्य ” हाट  ” ( राजस्थानी डायरी ) -2018 ।  साथ ही  ‘‘जनता बावळी हो’गी’’-2009  (  शिवराम के नुक्क्ड़ नाटक संग्रह -” जनता पागल हो गई ” ), ‘‘ कोई ऐक जीवतो छै ’’ श्री लीलाधर जगूड़ी के कविता संग्रह- ‘‘अनुभव के आकाश में चाँद ’’ -2010 और ‘‘ दो ओळ्यां बीचै’’ – 2014 श्री राजेश जोशी के कविता संग्रह- ‘‘दो पंक्तियों के बीच’’ का राजस्थानी अनुवाद साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित। वहीं राजस्थानी पत्रिका ” राजस्थानी गंगा ‘ के ‘ हाड़ौती विशेषांक ‘ और स्वतंत्रता सेनानी एवं लोक कवि भैरवलाल ‘ काला बादल ‘ के आत्मकथात्मक संस्मरण पुस्तक’ काला बादळ रे ! अब तो बरसा दे बळती आग ‘ का संपादन। 

आकाशवाणी केंद्र कोटा,जयपुर और जयपुर दूरदर्शन,पत्रिका टीवी से समय-समय पर रचनाओं एवं साक्षात्कार का प्रसारण। पंजाबी, गुजराती, नेपाली, संस्कृत, कोंकणी, मराठी ,अंग्रेजी ,संथाली आदि भाषाओं में कविताओं का अनुवाद। नया ज्ञानोदय – कविता वार्षिकी , इंद्रप्रस्थ भारती -साहित्य वार्षिकी ,वागर्थ, परिकथा, संवदिया, इंडियन लिटरेचर के युवा कविता विशेषांक – इंडिया 40 और समकालीन भारतीय साहित्य, राजस्थान पत्रिका ,दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिगंधा, नई  दुनिया सन्डे, सृजनकुंज, डेली न्यूज़, व्यंग्य- यात्रा,अक्सर,दस्तावेज , कुरंजा, मन्तव्य, शुक्रवार , शेष, दैनिक नवज्योति ,मधुमती, शुक्रवार ,दुनिया इन दिनों, शीराज़ा, राष्ट्रदूत, कथादेश, विभोम -स्वर,जननायक, समावर्तन पत्रिका के ‘ रेखांकित ‘ स्तम्भ सहित देश की सभी प्रमुख हिन्दी- राजस्थानी भाषा पत्र -पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। 

ओम नागर को प्रदेश -देश की कई प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा उल्लेखनीय साहित्य सृजन के लिए  पुरस्कृत व सम्मानित किया गया । जिनमें राजस्थानी कविता संग्रह ” जद बी माँडबा बैठूँ छूँ कविता ” के लिए साहित्य अकादेमी का  ” युवा पुरस्कार “, कथेतर ( डायरी ) “निब के चीरे से” के लिए भारतीय ज्ञानपीठ का  ” नवलेखन पुरस्कार,” तथा शिवराम के हिन्दी नुक्क्ड़ नाटक संग्रह ” जनता पागल हो गई है ” के राजस्थानी अनुवाद ” जनता बावळी होगी ” के लिए राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी ,बीकानेर का  ” बावजी चतर सिंह अनुवाद पुरस्कार”,  हिंदी कविता संग्रह ” देखना एक दिन ” के लिए राजस्थान साहित्य अकादमी,उदयपुर का “सुमनेश जोशी पुरस्कार, हिन्दी कविता ” अंतिम इच्छा ” के लिए राजस्थान पत्रिका सृजनात्मक पुरस्कार, हिन्दी की मासिक पत्रिका ” पाखी ” की ओर से ” गाँव में दंगा” कविता के लिए ” युवा शब्द साधक सम्मान ” ,कलमकार मंच ,जयपुर द्वारा हिंदी कविता ” हँसी के कंठ में अभी रोना बचा है ” के लिए कविता श्रेणी का ” प्रथम पुरस्कार ” , कथा संस्थान, जोधपुर द्वारा ” सत्यप्रकाश जोशी कविता सम्मान ” प्रमुख है ।

ईमेल –dr.opnagar80@gmail.com

http://dromnagar.blogspot.com

मोबाइल -09460677638 

 
  1. भाषा का आखिरी विलोम

अच्छा हुआ 
नीली नहीं है तुम्हारी आँखें
वरना ! आँखों के लिए झील का संबोधन 
कितना पुराना-सा लगता है अब

मुझे तो तुम्हारी आँखों का शफ्फ़ाक रँग ही
अच्छा लगता हैं
क्षीर की तरह पवित्र
गंगा की तरह निर्मल

अच्छा हुआ 
तुम्हारी गोरी कलाइयों में जो चूड़ियाँ बजती है छन्न-सी
वो हरी नही
नीली ही हैं सब की सब

वरना ! फ़िल्मी गीतों में “गोरी हैं कलाइयाँ
और हरी-हरी चूड़ियों का संबोधन
कितना पुराना-सा लगता है अब

तुम्हारी नीली चूड़ियों के झुण्ड में
एक अकेली लाल रँग की चूड़ी फँसी है बेचारी
जो जोरी-जबरी भी न उतारी गई होगी कलाई से

काश ! और न सही
मणिहार ही हुआ होता जीवन में 
तो तुम्हें 
यह नीली चूड़ियाँ पहनाते वक़त 
एक-अकेली लाल चूड़ी के बाँध आता अपना दिल

और यह कहता हुआ गुजर जाता तुम्हारी गली से
कि-” परदेशी बलम के कान तक देती है दस्तक
यह नीली चूड़ियाँ।”

अच्छा हुआ 
सफ़ेद मोतियों की गलमाला पड़ी हैं 
जीवन-घटों पर
वरना ! इन सुंदर और सुडौल जीवन-घटों के लिए
कलश का संबोधन 
कितना पुराना-सा लगता है अब

अच्छा हुआ
तुम्हारी नेल पॉलिश और लिपस्टिक का रँग
नीला न हुआ
सच कहूँ -” दिल के रँग के ही अच्छे लगते हैं 
गुलाब से होंठ
सुआ की तरह दाँत से कुतरे गए सुंदर नाखून।”

वरना ! चेहरे को चाँद 
और दिल को गुलाब का संबोधन 
कितना पुराना-सा लगता है अब

क्या हुआ 
जो नीले रँग की स्याही से लिख रहा हूँ तुम्हें
यह प्रेमिल  संबोधन/ कुछ-कुछ प्रेम कविता जैसा

जिन्हें सुनकर धड़कने वाला दिल 
और मुस्कराते होंठों का रँग भी तो 
लाल ही हैं ना प्रिये!

वरना ! नए-नए प्रेमी को
कवि का संबोधन
कितना पुराना-सा लगता हैं अब

क्या हुआ
जो विज्ञान कहता है 
कि जीव की देह का रँग जब पड़ने लगे 
लाल से नीला 
समझिए मृत्यु 
दबे पाँव बढ़ रही है जीवन की ओर

काल को जीवन का संबोधन 
होता हैं प्रेमियों की भाषा का आख़िरी विलोम 

सदा एक-सा ही होता जिसका 
अर्थ,भावार्थ
और परीक्षा की घड़ी सप्रसंग व्याख्या भी होती है 
एक-सी ही

सही है जीवन को मृत्यु का संबोधन
कितना पुराना-सा लगता हैं अब।।

 

2. एक पत्ता

एक सितारा
जो टूटकर समा गया
आकाश के किसी छोर

एक लम्हा
जो चुराया था तुम्हारे लिए
उसे ले उड़ी पगली पवन

एक फूल
जिसे देना था तुम्हे अलसुबह
तोड़ ले गया कोई राहगीर

एक बात
जो कहनी थी तुम्हीं से
इन दिनों नही आ रही याद

एक पत्ता
जो उड़कर चला आए वहाँ
रख लेना नोटबुक में संभाल के।

3. रोज छूट ही जाता है कुछ न कुछ

रोज छूट ही जाता हैं
कुछ न कुछ

आज बतियाना था जी-भर
हँसना था उन्मुक्त
जैसे कोई परिंदा पिंजड़े से
भर रहा हो पहली आज़ाद-उड़ान
उड़ते चले जाना था 
तुम्हारी बातों के उड़न खटोले में 
आकाश की ओर

रोज छूट ही जाता हैं
कुछ न कुछ

आज फूलों की बस्ती में जाना था 
अलसुबह चुनना था हरसिंगार
एक तितली पकड़ कर रखनी थी
तुम्हारी कोमल हथेली पर
ग़ुलाब जो तुम्हारे होंठो से चुराकर 
हुए है सुर्ख़
जूड़े में टाँगना था आहिस्ता-आहिस्ता

रोज छूट ही जाता हैं
कुछ न कुछ

आज चाँदनी रात में निरखना था देर तक
सितारों से भरा आसमान
कोई मन्नत माँगनी थी टूटते हुए तारे से
एक चाँद दूसरे चाँद से मुख़ातिब 
देखना था छत पर

लेकिन रोज छूट ही जाता हैं
कुछ न कुछ
छूटने का क्या किसी दिन यूँ ही छूट जाएगा
देह से साँसों का साथ

तुम तो आत्मा में हो 
और आत्मा तो अजर -अमर होती हैं ना प्रिये !

4. तुम ने कुछ नहीं कहा

तुम ने कहा-हवा
मैं हो गया-बादल

तुम ने कहा-धरती
मैं हो गया -आकाश

तुम ने कहा-नदी
मैं हो गया-समंदर

तुम ने कहा-आग
मैं हो गया-पानी

तुम ने कहा-देह
मैं हो गया साँस

तुम ने कहा-आँख
मैं हो गया-रोशनी

तुम ने कहा-छाँव
मैं हो गया-पेड़

तुम ने कहा-प्यास
मैं हो गया-जल

तुम ने कहा-स्वाद
मैं हो गया-नमक

तुम ने कहा-नींद
मैं हो गया-सपना

तुम ने कहा-रेखाएँ
मैं हो गया-हथेली

तुम ने कहा-पैर
मैं हो गया-रास्ता

तुम ने कहा-कीचड़
मैं हो गया-कमल

तुम ने कहा-ईश्वर
मैं हो गया-अर्चन

तुम ने कहा-फल
मैं हो गया-दुआ

तुम ने कहा-अंगुलियाँ
मैं हो गया- मुट्ठी

तुम ने कहा-कान
मैं हो गया-प्रेम गीत

तुम ने कहा-डोर
मैं हो गया-पतंग

तुम ने कहा-काज़ल
मैं हो गया-पलक

तुम ने कहा-नाक
मैं हो गया-ख़ुशबू

तुम ने कहा-कली
मैं हो गया-भँवरा

तुम ने कहा-अँधेरा
मैं हो गया-दीपक

तुम ने कहा-लोहा
मैं हो गया-पारस

तुम ने कहा-ओस
मैं हो गया-धूप

तुम ने कहा-शब्द
मैं हो गया-कागद

तुम ने कहा-छुअन
मैं हो गया-मोरपंख

तुम ने कहा-होंठ
मैं हो गया-गुलाब

तुम ने कहा-प्रेम
मैं हो गया-हृदय

तुम ने कहा-भूख़
मैं हो गया-रोटी

तुम ने कहा-शिराएँ
मैं हो गया-रक्त

तुम ने कहा-चाँदनी
मैं हो गया -चाँद

तुम ने कहा-दिन
मैं हो गया-सूरज

तुम ने कहा-अभिधा
मैं हो गया -व्यंजना

तुम ने कहा-भाषा
मैं हो गया-मौन

तुम ने कहा-मनुष्य
मैं हो गया-कवि

तुम ने कहा-जीवन
मैं हो गया-कविता

तुम ने कुछ न कहा
मैं हो गया-तुम्हारा।

5. तुम्हारा कहा सुना है मैंने

तुमने कहा-प्रेम 
मैंने कहा – सचमुच !

तुमने फिर कहा-प्रेम 
मैंने कहा-सोच लो !

तुमने फिर से कहा-प्रेम
मैंने कहा-आँसू बहुत है !

तुमने एक बार फिर से कहा-प्रेम
मैंने कहा-सह सकोगे जुदाई

तुमने दुबारा फिर से कहा-प्रेम
मैं सोचता रहा नफ़रत के बारे में

तुम्हारा कहा सुना है मैंने।

6. ढ़ाई आख़र

लाख चौकस रखिए
अपनी खुली आँखें आठो पहर
फूल के खिलने का सही अंदाज़
न तितली को पता होता है
और न भँवरे को सुनाई देती
कोई मुनादी

लाख अच्छी है
आपकी घ्राण शक्ति 
नाक के नथुनों को चाहे भले
कोई अलहदा खुशबू
की पहचान हो मुक्कमल
पर भाव के भूखे रहे है सदा ईश्वर
जो दो अगरबत्तियों,बसन्दर
में नहीं ढूँढते होंगे
पूजा की कोई नई भिन्न महक

लाख बेहतर सुनते है
आपके दो कान
बारीक,मोटी और कर्कश
जो भी बोलते हैं उसकी दस्तक
दो और कान तक पहुँचती है
ज़रूर
पर कान है कि 
बाँसुरी की आवाज़ पर
हो जाते है सजीव
बाँस की इस विरलता है ने उसे
कृष्ण के होठों की
शोभा बना दिया।

लाख सुनिए कानों से
लाख देखिए आँखों से
लाख खुशबू से भरा है चमन
लाख स्पर्श 
पर लाख नहीं बोलती जुबाँ
यहाँ ढाई आख़र में
मिल जाता है 
सृष्टि सृजना का सूत्र।

7रहना है अभी प्रेम में तुम्हारे

आज सुबह-सुबह
जिन भी फूलों ने खोली अपनी पलकें
उन फूलों ने मुस्कराना
तुम्हीं से सीखा होगा प्रिये !

आज सुबह-सुबह
पूरब दिशा से निकला जो सूरज
उसकी मुलायम किरणों ने 
छुआ देह को
इस छुअन में तुम्हारे स्पर्श की
सिरहन
पोरों से लिखे हो जैसे तुम्हीं ने
अढाई आखर प्रिये!

आज सुबह-सुबह
ही लगे थे मुझ परी के पंख
यह प्रेम है या कोई जादू की छड़ी
पलकों के पट लगाती 
कि अंजान दस्तक की अनुगूँज
कोई सरगम 
जिसे दरकार हो किसी लम्बे आलाप की
प्यार का कोई भी नग्मा
गुनगुनाओ ना प्रिये!

आज सुबह-सुबह
ही बिसर गया तुम्हें देना
शुभकामनाएं प्रेम दिवस की
सदियों तक
जन्मों तक
रहना है अभी प्रेम में तुम्हारे
बताओ न 
बताओ न
कैसे एक दिवसीय 
हो सकता है अपना प्रेम प्रिये!

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