पल्लवी मुखर्जी की 5 कविताएं

पल्लवी मुखर्जी

एक

आओ सुनते है

एक दूसरे की धड़कनों को

 
धड़कनें
धड़कती हैं जैसे
घड़ी की सुई
टिक-टिक करती
 
और ले जाती हैं हमेंं उम्र के उस दौर में
जहाँ न मैं….
मैं रहती हूँ
न तुम….
तुम रहते हो
 
हम एक हो जाते हैं
उम्मीदों का हरापन लेकर
 
 
दो
 
तुम एक पुल हो
जिस पर से
तमाम रिश्ते गुज़र रहे हैं
धड़ाधड़
 
जैसे गुज़रती है रेल
किसी पुल से
और उसकी चीख में
दब जाती है
पुल की  थरथराहट
 
तीन 
तानाशाह
खरगोश की तरह दुबका है
अपनी माँद में
 
तानाशाह
डरता है
धूप से
हवा से
बारिश से और
परिंदे से भी
 
तानाशाह 
अकेला नहीं है
गुज़र रही है
लाखों चींटियां
बना रही है उसे
अपना ग्रास
धीर-धीरे
 
चार
जिस तरह चकले पर
घूम जाती है एक रोटी
 
ठीक उसी तरह
घूमती है पृथ्वी
अपने ही कक्ष में
 
मैं भी घूमती हूँ
अपने हिस्से की उम्र
 
पांच
वो औरत
वैधव्य से गुजरती
 
टाँग देती है खूँटी पर
उम्र का बचा हुआ सुख
 
चाँद डूब चुका है
 
बचा है सिर्फ़
अमावस्या

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1 Response

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