पल्लवी मुखर्जी की 5 कविताएं

पल्लवी मुखर्जी

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एक

एक खोल के भीतर
घुसा हुआ है रेशम का कीड़ा
जैसे किसी कोख की
अंधेरी खोह में है एक शिशु
छटपटाता है मुक्ति के लिए

मुक्ति की प्यास उसे भी है
जो देख रहा है
अपने सामने मृत्यु को आते
गले में अटके हैं प्राण
फांस की तरह
छटपटाता है बूंद भर मुक्ति के लिए

और वह भी
मुक्त होना चाहती है
जो चाहती है
थोड़ी हवा
बूंद भर आकाश
जिसके चारों ओर
तुमने है बुना रेशम का जाल
और छोड़ दिया उसे
मुक्ति के लिए

देख रही है वह
खिड़की से बाहर नाचती पत्तियों को और
गिरती बूंदों को विलीन होते मिट्टी में

कुछ बूंदें हथेली में बंद है

दो

हर काली रात के बाद
हम वैसे ही बच कर निकल आते हैंं
जैसे किसी घने काले बादल को
हटाता हुआ सूरज
अचानक हँसता हुआ सामने आ जाता है
अपनी पूरी आभा लिए हुए

इस कठिन समय में
बेबुनियाद विचारों को ताक पर रखकर
मुस्कुरा सकते हैं थोड़ा
इन पीले सरसों के फूलों की तरह
जिन्हें किसान सींच रहा है मग्न

जबकि ….
हम खो रहे हैं रोज़
थोडा़-थोड़ा अपने आपको

बहुत बड़ी बात होगी
अगर बच जाता है थोड़ी सी बूंद भी
इस धरती पर
हमारे होने की

तीन

निस्संदेह
उस स्पर्श को ढूँढ़ती हूँँ
जब पहली बार तुमने छुआ था
पहली बार बारिश हुई थी
पहली बार भीगते ओस में
टिमटिमाए थे जुगनू
पहली बार छिटकी चाँदनी का
न था कोई ओर-छोर
पहली बार अनगिनत
तितलियों को देखा था गुदगुदाते
पहली बार ढलती शाम का सूरज
हथेली से उतरकर धँस गया भीतर
पहली बार चुपके से मैंने
तुम्हारीं आँखों को बंद किया

और अथाह समुद्र की गहराई में
डूबते-उतरते तुम्हारे साथ दूर तक आ गई

अब निहत्थे ताक रहे हैं हम
आकाश की ओर
छिटकी चाँदनी के लिए

चार

बहुत पीड़ित हूँ मैं
एक छद्म आवरण का खोल पहनकर
भीतर से खिलखिलाती नहीं हूँ मैं
कहाँ ढूँढू उस मुस्कान को?
जब अल्लसुबह
आईने पर होती थी
ओस से भीगी हुई
कहाँ ढूँढू?
तुम बताओगे?
जब कानों में सिर्फ़ चीखें हैं
नंन्ही चीखें
जिनकी पाँवों की रुन-झुन से
गूँजता था तुम्हारा आँगन
जो बड़ी नहीं हुई

इन दिनों खूब बारिश हो रही है
रक्त की बारिश
रक्त से भीगी धरती में अब
गौरेयों के झुंड नहीं होते
वहाँ लाशें होती हैं
माताओं की

पांच

इन दिनों सबसे कठिन है जीना
जब भीतर की दीवार दरक चुकी है
और शिराओं से खून नहीं
लावा बह रहा है
साँसें भी प्रदूषित है
मिट्टी भी जवाब दे रही है
फिर किसान क्या करें?
उसका सीना लहुलूहान हो गया है
मिट्टी खोदत-खोदते
उसने जो बीज रोपे थे
वो मर चुका है

किसान को कभी
बीज की लाश ढोते देखा है???

One comment

  1. An impressive share! I have just forwarded this onto a co-worker
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    And he actually bought me dinner because I discovered it for him…
    lol. So let me reword this…. Thank YOU for the meal!!
    But yeah, thanx for spending the time to talk about
    this issue here on your internet site.

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