पल्लवी मुखर्जी की 6 कविताएं

पल्लवी मुखर्जी

पिंजरा

गहन सन्नाटा है यहाँ

मत झाँको

इस पिजंड़े के अंदर

यहाँ कुलांचे भरती 

कोई हिरनी नहीं उछलेगी

न ही दिखेगी….

दूर-दूर तक कोई हरीतिमा

जिस पर छोटे-छोटे खरगोशों के

नन्हें-नन्हें पाँव होते हैं और

जाने कहाँ -कहाँ से आ जाती हैं

अनगिनत चिड़ियाँ…

जिनकी चहचहाहट से

तुम रहते हो कोसों दूर

इस पिजंड़े में झाँकने से

दिखाई देगी तुम्हें

मेंरी प्यास….

सुनाई देगी ….

मेंरी साँसो की आवाज

जो तुमसे कहना चाहती है

खोल दो सारी दीवारें

ईंट,पत्थर, कांक्रीट की बनी ठोस

जिस पर न कोई घास उगेगा

न खिलेगा पलाश

न ही महुआ टपकेगी और

न ही कोई अंकूर फूटेगा

 

मैं पूरी पृथ्वी की गोलाई को

नापना चाहती हूँ

घूम जाना चाहती हूँ

धरती के हरेपन पर

 

 

कविता क्या है?

जिस तरह लोहा

भट्टी की आँच में तपकर 

पिघलता है

और लोहार पीट-पीट कर

उसे ढाल देता है

एक आकार में

उसी तरह शब्द उबलते है

मन के भीतर

छटपटाते हुए

बेचैन होकर शब्द

फूँट पड़ते है बाहर

फिर कवि…..

उन्हें उठाता है

ठीक उसी तरह

जैसे कुम्हार मिट्टी

को चाक में घूमाकर

गढ़ लेता है

एक खूबसूरत आकार

 

कवि लिख लेता है एक कविता

 

यादें

कुछ यादें

दफ्न हो जायेंगी

मिट्टी में यूं ही

जो अक्सर मेरी चुप्पी में

गुदगुदा जाती है

स्कूल के अहाते के बाहर

तुम्हारा मुझे देखना

और मेंरे मन का डोलना

जैसे शांत नदी

उछल जाती है मात्र एक कंकड़ से

उस एहसास के साथ 

गहरी नींद में उतरना

और सुबह…

माँ की एक चपत से 

झट से उठ जाना

आईने में खुद को निहारना

और चुपके से

बिंदी का लगाना

 

फिर तुम

ओझल हुऐ वैसे ही

जैसे आंधी के बीच

एक पत्ता

विलीन हो जाता है…..दूर

 

 

मिट्टी से दूर

जंगल को जानना हो तो

जंगल में उतरना होगा

कोयल को सुनने के लिये

बाग में आना होगा

गुलाब को समझना हो तो

काँटों से गुज़रना होगा

मिट्टी को महसूसना हो तो

छूना होगा मिट्टी को

उसी तरह…..

जैसे….

वो थापती है मिट्टी

सुबह-शाम

बना लेती है एक घरौंदा

मिट्टी की महक से

महकती है वो रात-दिन

 

और तुम…….

कांक्रीट के बने जंगलों में रहते हो

मिट्टी से कोसों दूर

 

 

सार्थकता

मेंरे कलम की सार्थकता तभी है

जब मैं तुम्हारे अंदर के 

मनुष्य को जगा दूं

तुम पाषाण मत बने रहो

उस हड़प्पाई बुत की तरह

अवाक और स्थिर……

गौर करो थोड़ा,

झरनों को,

मेंरी तरह,

उड़ती चिड़िया की आँखों में डूब सको,

उत्सुक हो जाओ,

बहती नदी को देखकर,

जैसे मैं हो जाती हूँ

जब तितली उड़ती है

फूलों पर…

या शबनम की बूंद 

ठहर जाती है 

पत्तियों पर

 

मेंरी आँखों की चमक देखकर

चुप मत रहो

तुम्हारे चुप होने से

मेंरे शब्द गूंगे हो जाते है

और दफ्न हो जाते है दूर कहीं

मैं चाहती हूं

इन अंतहीन शब्दों की खोज में

मेंरे साथ चलो

दूर….

बहुत दूर

 

 

एकदिन

बजबजाती नालियों के बीच से ही

फूंटेगा मेंरा स्वर

और तुम देखते रहोगे

सत्ता के शीर्ष पर आसीन होकर

तुम चलाओगे स्वच्छता का अभियान 

और मैं….

मक्खी -मच्छरों से उलझता हुआ

आगे बढ़ूंगा

 

मैं जानता हूँ

माँ की साड़ी गुलाबी नहीं है

चुल्हे पर चढ़ी डेचकी में

चावल कम है और

पानी ज्यादा

घर की छत टूटी हुई है

कोने में पड़ा बस्ता उदास है

घरकी चिमनी में 

तेल नहीं है

 

फिर भी मैं

ज़िंदा हूँ

क्योंकि मेंरी माँ

मेंरे लिए ले आती है

कटोरी में भरकर धूप

सिखलाती है मुझे

उड़ना…

जैसे चिड़िया सिखाती है

अपने बच्चों को

जाल फेंकते शिकारी से भी

बचकर बाहर निकलना

 

और फिर एक दिन

तुम मुझे देखोगे

शीर्ष पर बैठते

उस दिन तुम्हें मेंरे मनुष्य होने पर

ज़रा भी संदेह नहीं होगा

 

 

You may also like...

1 Response

  1. दिनेश गौतम says:

    बहुत अच्छी कविताएँ हैं पल्लवी की छहों कविताएँ। सभी कविताएँ गहरी भावभूमि की कविताएँ हैं और पल्लवी के बहुत संवेदनशील मन का पता देती हैं। उन्हें बधाई।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *