पल्लवी मुखर्जी की 2 कविताएं

पल्लवी मुखर्जी
  1. स्त्री

स्त्री शब्द-शब्द उतारती है तुम्हेंअपने जीवन मेंभोर की लालिमा मेंलिपे चूल्हे परतुम्हारी चाय कीभीनी खुशबू सेफैलती है उसकी सुबहपूरा दिन और पूरी रात पढ़ती रहती है तुम्हें स्त्री बिना तुम बासी रोटी पर उगे फफूंद को भी उदरस्थ कर लेते हो  स्त्री तुम्हारे भीतर की सुगंध है…..। जो बासीपन हटा देती है       2.   पुरुष        हे पुरूषएक बार गुज़रोमहीने के दंश और प्रसव वेदना सेएक बार महसूसोकि किस तरहऔरत की कईनाड़ियाँ चीरकरसृजन होता है तुम्हाराया स्त्री देह काफिर तुम समझ पाओगेस्त्री के वास्तविक स्वरूप को और फिर कभीतुम्हारे हाथ मेंनहीं होंगे वो धारदार नाखूनजो नोंचते है स्त्री देह को तब तुम वास्तव मेंबुद्ध कहलाओगे जिसे पृथ्वी पुकार रही हैअब लौट आओबुद्ध ….

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