पल्लवी मुखर्जी की 8 कविताएं

पल्लवी मुखर्जी
  1. पृथ्वी         


जब भी बादल

घुमड़ते हैं

पैर टिकता नहीं है घर पर

घूरते घर को छोड़कर

निकल पड़ती हूँ

और चलती जाती हूँ सड़क पर

टिप-टिप बूंदों के साथ

कुछ बूंदें हथेली से उछाल देती हूँ

जैसे बादल को लौटा रही हूँ

उसका प्रेम


आश्वस्त हूँ

मेरे भीतर बहती है एक नदी

जो पहाड़ी से निकलती है

मेरे भीतर कोई गाँव भूखा नहीं है

अकालग्रस्त

अलबत्ता एक जंगल जरूर है हरियाता

सरयी के घने पेड़ों से घिरा

ढूंढ़ती हूँ नदी

ढूंढ़ती हूँ जंगल

पर चुभते हैं

पत्थर कांक्रीट के

तेज़ और नुकीले

हवा भी कसैली 


सोचती हूँ

कितना ज़रूरी है प्रेम

पृथ्वी के लिए और

एक स्त्री के लिए भी


  1. दहलीज से बाहर देह


रुको स्त्री

दहलीज पार न करना

खिड़की से देखो

अपने हिस्से का आकाश

टाँक दो

उस हिस्से पर चाँद -सितारे

जैसे टाँकती हो

छोट-छोटे कपड़ों पर

तकिये के गिलाफों पर

बिस्तर के चादरों पर

दीवार के कैनवस को भी

रंगों से भरना जानती हो तुम


स्त्री तुम

पूरे आँगन को

नापती रहो

अपने कदमों से

उचकती रहो

आकाश को

पकड़ने के लिए


आँगन के बाहर गिद्ध हैं

गिद्ध नोचते हैं देह को

फेंक देते हैं

उसी नदी में

जिसमें तुम अपने पाँव रखना चाहती हो

स्त्री तुम

दहलीज पार न करना

दहलीज के बाहर

देह हो तुम


  1. वह औरत नहीं लोहा है


ये बसंत नहीं

गर्मी की तपती दुपहरी है

वह औरत

औरत नहीं

लोहा है

जिसके सर पर तगाड़ी है

लोहे की

जिसके स्तन से चिपका है शिशु

पी रहा है चुक-चुक

पिघलता लोहा

औरत जानती है

पेट भर भात के लिए उसे

निकलना होगा

भोर में

और तपना होगा

लोहे की तरह


दिन चढ़े

जब उसकी देह

थककर पक चुकी होगी

उतारेगी थकन

उसी नदी में

जो तप रही होगी

धीरे-धीरे


इन दिनों औरत

भूल चुकी है

नमक का स्वाद

नमक

उसकी हथेली पर है


  1. मुठ्ठी में सुबह


उस गली पर मैं खड़ी हूँ

जहाँ से मेंरे घर की छत

साफ़ नज़र आती है और

गली के इसी मोड़ पे खड़ी है वह

जिसके सर पर छत नहीं है

और न ही उसके हिस्से की ज़मीन

उसके हिस्से एक गुलमोहर का पेड़ ज़रूर है

जिसके नीचे उसका रैन बसेरा

पत्थरों से बने चूल्हे के ऊपर

चढ़ी है एक पिचकी हुई

एल्युमिनियम की डेचकी


वह डरती नहीं है

गर्मी के इन खौफनाक दोपहरों से

और न ही

काली अंधियारी रातों से

वह जानती है

हर दिन उसकी मुट्ठी में एक सुबह होती है

और गुलमोहर के ढेर सारे फूल भी


अपनी साड़ी के भीतर

हसिया खोंचकर

जूड़े में सजा लेती है गुलमोहर

और खनकती हंसी के साथ

मुझे ऐसे ताकती है जैसे

मैं उसकी हंसी छीन लेना चाहती हूँ और

चुनवा देना चाहती हूं

किसी किले में


  1. प्रेम


मेरे प्रेम में है

हवा

पानी

धूप

बारिश

हरियाते जंगल

कतारबद्ध खड़े

साल-सरई के 

लंबे लंबे वृक्ष


मेरे प्रेम में है

आंगन के नीम पर बैठी कोयल

जिसकी आँखों में

झाँक लेती हूँ दूर तक


मेरे प्रेम में है

खिड़की के उस पार

आकाश का पीला सा चाँद

जिसकी शीतलता से

मैं पलकें मूंद लेती हूँ


मेरे प्रेम में है

मेड़ पर सुस्ता रहा किसान

जिसके पसीने की गंध से

धान की बालियां पकती हैं

और

मेंरे प्रेम में तुम भी हो

पर मुझसे प्रेम नहीं करती

शहर की एकमात्र सूखती नदी

जिसका पानी पूरा शहर पीता है

नदी से निकाले जा रहे हैं

धड़ाधड़ रेत

ट्रैक्टरों पर सवार होकर

बन रही हैं अट्टालिकाएँ

और गली का ननकुआ

सोया है बेसुध 

नदी के छोर पर


आओ कि तुम्हारे प्रेम को

ढँक दूं

एक खूबसूरत लिबास में

जिसकी खूशबू से महकती रहूं ताउम्र

तुम्हारे प्रेम को

ज़ाया न करूं

जैसे वक्त फिसल जाता है

रेत की तरह

मैं इंच-इंच

बढ़ती जाऊँ

गुलमोहर की तरह

रूकूं नहीं

इन कीचों में भी

पर तुम

थोड़ा ठहर जाना

गुलमोहर के लाल लटकते झूमते

फूलों को देखकर

और लौट आना प्रेम लेकर

उसे ड्राईंगरूम के गुलदान में मत सजाना

उसे आँखों की नदी में

उतार लेना


मैं आश्वस्त हूँ

तुम्हारे भीतर का बाज़ उड़ चुका है

सिर्फ़ बचा है प्रेम


  1. रिक्तता


तुम जानते हो

एक औरत की नब्ज़

कहाँ कमज़ोर पड़ जाती है

फिर अपना

पासा

सही जगह पर

फेंकते हो


औरत

घूमने लगती है 

तुम्हारे चारों ओर

निरंतर

जैसे पृथ्वी घूम रही है

औरत

भूलने लगती है

अपना शैशव

बचपन

लड़कपन 

यौवन

बची रहती है

सिर्फ़ रिक्तता


  1. मासूम ख्वाहिश


निरंतर

तुम्हारी आँखों का प्रेम

पढ़ लेती हूँ

जब तुम उपले थापती

उस औरत को

देखते हो


पढ़ लेती हूँ

उस प्रेम की अनंत गहराई 

जिसमें एक असीम 

शांति होती है

कोई धधकती आग नहीं

जो किसी स्त्री देह को

राख करने पर तुली हो


मुझे वही प्रेम चाहिए

वही ललक

वही उत्सुकता

जिस दिन 

तुम इस प्रेम को 

समझ जाओगे

धरती पर स्त्री

फूल की तरह खिलेगी

तितलियों सी उड़ेगी

गौरैया सी चहकेगी और

सोंधी मिट्टी की गंध से

सराबोर,

धरती

बच जायेगी

बंजर होने से


  1. एक दिन डूब जाएगी धरती


मैं

आकाश

पहाड़

समुद्र

लांघ कर

तुम तक

पहुंची

पर वहां प्रेम नहीं था

चाकू से किये गये घाव थे

घाव से

खून रिस रहा था


मैं

टपकते खून को

हाथ बढ़ाकर

पोंछना चाहती थी

पर मैं

जानती हूँ

ये घाव

बहुत गहरे हैं

किसी रुई के फाहे की

हैसियत नहीं

जो इन्हें सोंख ले


इन पर

विरासत की मार है

पीढ़ियों की चोट है

ये आसानी से नहीं जायेंगे

कितनी भी नर्म मिट्टी की लेप से

इनकी पीड़ाएं निकलेंगी

और एक दिन

बहा ले जायेगी

समस्त नदी

आयेगा सैलाब

और

डूब जायेगी धरती


——

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