हमारा हर शब्द हमारी पक्षधरता बतलाता है : पंकज बिष्ट

पंकज बिष्ट को दूसरा राजकमल चौधरी स्मृति सम्मान

मेघ पांडे

“यह पुरस्कार मुझे अपने लिए मिले पुरस्कारों में सबसे बड़ा लगा है क्योंकि यह एक लेखक की जीवन भर की कमाई के पैसे से प्रारंभ किया गया है। लगा जैसे नोबेल प्राइज मिल गया हो। हमारी अम्मा कहा करती थीं- घर का जोगी जोगड़ा। पर अब जमाना दूसरा है। वह जितना फैला है, आदमी उतना ही सिमट गया है। यानी अगर अपने ही लोग आपको नहीं पहचानेंगे तो समझो कोई नहीं पहचानेगा। इसलिए मैं अपने मित्रों का आभारी हूं कि उन्होंने मुझे कुछ देर से ही सही, पिछले कुछ वर्षों से पहचानना शुरू कर दिया है। वैसे मेरे बारे में मेरी मां का ओपिनियन सबसे प्रामाणिक है। वह कहती थीं मैं निहायत उत्पाती आदमी हूं। अगर मैंने धरती पर कदम मुंबई में रखा तो होश संभाला अल्मोड़ा में। यह वह शहर है जहां मैंने अपने पिता की आलीशान लाइब्रेरी देखी। उतना ही आलीशान उनका वह दफ्तर जहां पहली बार महसूस की छपाई की स्याही की रासायनिक नशीली गंध और सफेद कागज को काले जादुई अक्षरों से पाटती ट्रेडिल मशीनों की अनथक आवाज कहीं गहरे मेरे मन मस्तिष्क में संगीत की किसी धुन की तरह बैठ गई थी। इसलिए मैं जो भी हूं, अकस्मात नहीं हूं, ये मेरी चुनी हुई नियति है।” दूसरा राजकमल चौधरी स्मृति सम्मान ग्रहण करते हुए प्रतिष्ठित कथाकार-उपन्यासकार पंकज बिष्ट ने ये बात कही

पंकज जी ने अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए प्रारंभ में राजकमल चौधरी की रचना ’इस अकाल बेला’ की स्मृति दिलाई। उन्होंने कहा कि हमारा हर शब्द हमारी पक्षधरता को बतलाता है। बिना समाज को समझे, बिना जाने, बिना विवेक का इस्तेमाल किए आप उपन्यास लेखन नहीं कर सकते। मैंने अक्सर जीवन को समझने के लिए मत्यु को माध्यम बनाया है। अंत में उन्होंने राजकमल चौधरी की रचना ’मुक्तिप्रसंग’ की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत करते हुए कहा-

’सुरक्षा के मोह में ही

सबसे पहले मरता है आदमी….’

प्रारंभ में मित्र निधि के अध्यक्ष महेश दर्पण ने बताया कि यह ट्रस्ट साहित्य, कला और संस्कृति के अलावा जीवन के जरूरी प्रश्नों से भी सीधा सरोकार रखता है। यह इसके संरक्षक सदस्य कवि कथाकार विष्णुचंद्र शर्मा की प्रेणा और परिकल्पना का फल है। उन्होंने बताया कि आगामी सम्मान के लिए किसी कवि का चयन करेंगे आलोचक आनंद प्रकाश और यह सन 2021 में प्रदान किया जाएगा।

राजकमल चौधरी साहित्य के अध्येता देवशंकर नवीन ने बताया कि जब उन्होंने राजकमल की रचनाओं की खोज शुरू की थी, तब उनकी रचनाएं आज की तरह आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती थीं। उनके जीवन को लेकर जिस तरह की धारणाएं प्रसारित की गईं, उनसे असहमति जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि वह एक जिम्मेदार गृहस्थ, जिम्मेदार नागरिक और एक जिम्मेदार रचनाकार थे। उन्होंने 15 बरसों में ही करीब 4000 पृष्ठों का लेखन किया। नागरिक जीवन से संसद तक आने की सुरंगों का खुलासा करने वाले राजकमल चौधरी की पहचान की जानी जरूरी है। वह विरोध के अंत तक खरे होने की क्षमता रखते थे। राजकमल चौधरी के सुपुत्र नीलमाधव चौधरी का कहना था कि वैसे तो राजकमल चौधरी के साहित्य पर काफी कुछ लिखा पढ़ा गया है,  किंतु मुझे उनके आलोचनात्मक निबंध बहुत अच्छे लगते हैं। उन्होंने इसे राजकमल के सद्कर्मों का फल बताया कि आज उनकी संतति उच्च आदर्शों का पालन करते हुए जीवन की कठिनाइयों का सफलतापूर्वक सामना कर रही है। उन्होंने राजकमल की अनेक कहानियों का जिक्र किया और अंत में उनकी एक कविता के माध्यम से अपना मंतव्य सामने रखा।

इस बार के निर्णायक और सुपरिचित आलोचक जानकी प्रसाद शर्मा का कहना था कि यह अकेले पंकज बिष्ट का सम्मान नहीं है। यह उनके दौर की समूची पीढ़ी की रचनात्मकता का सम्मान है। विभ्रम के दौर में पतनशील संस्कृति जन्म लेती है। उसके बीच अपनी जिम्मेदारी का एहसास करने वालों में पंकज बिष्ट भी एक महत्वपूर्ण रचनाकार हैं।  1967 में प्रकाशित ’सूली पर चढ़ा एक और मसीहा’ शीर्षक उनकी पहली कहानी का जिक्र करते हुए जानकी जी ने ’लेकिन दरवाजा’ और पंकजजी की अन्य रचनाओं के महत्व पर प्रकाश डाला। उनका कहना था कि लेकिन दरवाजा के मुख्य किरदार की बेचैनी पूरे राजनीतिक परिदृश्य से जुड़ती व्यंजना है। उन्होंने पंकज को असहमति का विवेक लेकर चलने वाला रचनाकार बताया और कहा कि संयत स्वर में प्रतिरोध उनका मिजाज है।

इसके बाद वरिष्ठ रचनाकारों विश्वनाथ त्रिपाठी, विष्णुचंद्र शर्मा और अजय सिंह के साथ मंचस्थ विद्वानों ने सम्मानित रचनाकार पंकज बिष्ट को दूसरे राजकमल चौधरी सम्मान से सम्मानित किया। सम्मान स्वरूप शॉल, प्रतीक चिह्न और 21 हजार की सम्मान राशि का चेक तथा डॉ. रत्नेश गुप्ता द्वारा बनाया गया पंकजजी का पोर्ट्रेट भेंट किया गया। समारोह का विशेष आकर्षण डॉ. ज्योत्सना का वक्तव्य रहा, जिसमें उन्होंने अपने सम्मानित पति पंकज बिष्ट के बारे में खुल कर बातें कहीं। 42 बरस से अपने अनुभवों का साझा करते हुए उन्होंने कहा कि पिछड़े और दलितों के प्रति उनमें गहन सहानुभूति का भाव है। ‘समयांतर’ में वह इस बात का खास ख्याल रखते हैं। स्वभाव से वह कुछ गुस्सैल हैं। अपनी चीजें इधर उधर हो जाने पर नाराज हो जाते हैं। लेकिन अंदर से वह नम्र और दयावान व्यक्ति हैं। मेरी कामना है कि उनकी लगन और ‘समयांतर’ ख्याति प्राप्त करती रहे।

वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी ने कहा: लगा जैसे यह सम्मान उन्हें ही मिला है। 67 से हमारी दोस्ती है। इस दौरान हमारे देश और जीवन में बहुत कुछ बदला है। देश को लेकर हमने जो सपना देखा , वह दूसरा ही हो गया। मैंने पहले पंकज को एक सहपाठी के रूप में देखा, फिर ‘आजकल’ के संपादक के रूप में, और फिर ‘समयांतर’ के संपादक के रूप में। मैं उनसे सर्वाधिक जुड़ा ‘समयांतर’ के काल में। यह सबसे महत्वपूर्ण भूमिका पंकज निभा रहे हैं। पिछले 20 बरसों में इसका एक भी अंक मिस नहीं हुआ है। अकेले अपने दम पर वह इसे निकाल रहे हैं। अनवरत। लघु पत्रिकाओं के इतिहास में यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। मूलत:  यह पत्रिका सामाजिक, सास्कृतिक, आर्थिक व राजनैतिक विमर्श को जन्म देती है। हिंदी के इतिहास में यह एक चुनौतीपूर्ण काम है। यह ईपीडब्लू है हिंदी की। सीधा समाज से जुड़ते हुए यह पंकज का एक व्यक्ति से संस्था में रूपांतरित होना है। अहिंदी   क्षेत्रों में भी इस पत्रिका की बहुत चर्चा रहती है।

वरिष्ठ कवि और पहले राजकमल स्मृति सम्मान से सम्मानित रचनाकार इब्बार रब्बी ने कहा कि हमारा मित्र पंकज बिष्ट प्रारंभ से ही जिम्मेदार है। उसमें एक नैतिक आग्रह और दायित्व बोध बराबर बना रहा। इसने बचपन से ही संघर्ष किया। प्रारंभ में जो चिंता इनके भीतर घर की रहती थी, अब तो पूरा देश ही इनका परिवार हो गया है। अच्छी बात यह है कि इनके द्वारा संपादित ‘समयांतर’ कोई लक्षण ग्रंथ नहीं है। हिंदी की पुरानी बीमारी इस पत्रिका में नहीं है। यह दिनमान और रविवार की तरह है। यह नई दिशा की खोज करती है। ऐसी पत्रिका जैसे तिलक, गांधी या विद्यार्थी निकालते थे। हमलोगों ने मिलकर सहयोगी प्रकाशन की योजना कभी बनाई थी, लेकिन वह असफल रही क्योंकि पुस्तक व्यवसाय में धांधली बड़ी रहती थी। बाद में इतने लेखक संगठन बने किंतु किसी ने यह काम नहीं किया। पंकज ने पिता की स्मृति बनाए रखने के लिए ‘समयांतर’ निकाली और आज वह इसे एक जिम्मेदार संपादक की तरह निकाल रहे हैं। उन्होंने पंकज बिष्ट और मित्रों द्वारा किए गए उल्लेखनीय कार्यों की याद भी दिलाई। अपने दीर्घ वक्तव्य में रब्बीजी ने ‘समयांतर’ में प्रकाशित जरूरी सामग्री का उल्लेख भी किया।

समारोह के अध्यक्ष और आगामी सम्मान के निर्णायक वरिष्ठ आलोचक आनंद प्रकाश ने राजकमल चौधरी से जुड़ा सुरेंद्र चौधरी का एक संस्मरण सुनाकर अपनी बात प्रारंभ की और कहा कि राजकमल का व्यक्तित्व ही ऐसे थे कि उनकी संवेदना की छवियां हमारे सामने साकार होने लगती हैं। पंकज बिष्ट को एक महत्वपूर्ण रचनाकार बताते हुए आनंदजी ने कहा :ज्योत्सना जी जानती हैं कि एक लेखक की पत्नी होना क्या होता है ! रामशरण जोशी ने एक पत्रकार के रूप में और इब्बार रब्बी ने एक विचारक के रूप में उन्हें याद किया है। पंकज के कई पहलू हैं।मैं उनका साक्षी रहा हूं।  70 के दशक से मेरा उनसे परिचय है। मैं खुद कई चीजें उन्हीं के कारण लिख सका। संपादक के रूप में उन्होंने लेखक बनाए भी हैं। वह एक चिंतक भी हैं। यह देखना दिलचस्प है कि एक लेखक अपने संपादक के साथ पटरी कैसे बिठाता है। वह वामपंथी विचारक और लेखक हैं। उनमें साहस है और गलत प्रवृत्तियों पर अटैक जरूर करते हैं। मुझे इनकी रचनाओं के शीर्षक बड़े अटपटे लगते हैं। ’लेकिन दरवाजा’ में ’वेटिंग फॉर गोड’ जैसा है। दरवाजा कहीं नहीं। वह प्रयोग शील रचनाकार हैं। विष्णु प्रभाकर के बाद कॉफी हाउस को पंकज बिष्ट ने संभाला है। सबसे बड़ा उनका कंट्रीब्यूशन है आग से खेलने वाली योजनाएं बनाना।

इस आयोजन में अशोक भौमिक, महावीर सरवर, विभूति नारायण राय, अशोक कुमार, ज्योतिष जोषी, खालिद अशरफ, नरेश नदीम, उपेंद्र कुमार, रणजीत साहा, ब्रजेंद्र त्रिपाठी, राम कुमार कृषक, भारत भारद्वाज, गंगेश गुंजन, गौरीनाथ, चंचल चौहान, राजेंद्र उपध्याय, ज्ञानेंद्र पांडे, कमल कुमार, अमरेंद्र मिश्र, शंकर,  कुमार अनुपम, अंजलि देशपांडे, हरियश राय, योगेंद्र दत्त शर्मा, सुभाष सेतिया, अरविंद कुमार सिंह, राकेश रेणु, शोभा सिंह, राधेश्याम मंगोलपुरी,ज्ञान पाठक,भाषा सिंह, संजय जोशी और निर्दोष त्यागी सहित अनेक रचनाकार, संपादक और युवा साहित्य प्रेमी भी उपस्थित थे।

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