पंकज चौधरी की चार कविताएं

दिल्ली

दिल्ली में समाज नहीं है
दिल्ली में व्यक्ति ही व्यक्ति है

दिल्ली में राम का नाम नहीं है
दिल्ली में सुबह और शाम काम ही काम है

दिल्ली में श्रम का दाम नहीं है
दिल्ली में श्रम ही श्रम है

दिल्ली में प्यार नहीं है
दिल्ली में तिज़ारत ही तिज़ारत है

दिल्ली में नीति नहीं है
दिल्ली में राज ही राज है

दिल्ली में दिल नहीं है
दिल्ली मैं बेदिल ही बेदिल है

दिल्ली में कला नहीं है
दिल्ली में खरीदार ही खरीदार है

दिल्ली में मुक्तिबोध नहीं है
दिल्ली में क्रीतदास ही क्रीतदास है

दिल्ली में वाम नहीं है
दिल्ली में दक्षिण ही दक्षिण है

दिल्ली में आराम नहीं है
दिल्ली में आपाधापी ही आपाधापी है

दिल्ली में लोकतंत्र नहीं है
दिल्ली में धनतंत्र ही धनतंत्र है

दिल्ली में धर्म नहीं है
दिल्ली में शंकराचार्य ही शंकराचार्य है

दिल्ली में मां-बाप कुछ नहीं है
दिल्ली में आश्रम ही आश्रम है

दिल्ली में लोक-लाज कुछ नहीं है
दिल्ली में थेथरई ही थेथरई है

दिल्ली में दाता नहीं है
दिल्ली में लूटेरा ही लूटेरा है

दिल्ली में कोई आज़ाद नहीं है
दिल्ली में गुलाम ही गुलाम है

दिल्ली में कोई रक्षक नहीं है
दिल्ली में शिकारी ही शिकारी है

दिल्ली में प्रतियोगिता नहीं है
दिल्ली में ताबड़तोड़ तेल मालिश है

दिल्ली में शूद्र नहीं है
दिल्ली में द्विज ही द्विज है

दिल्ली में रहम नहीं है
दिल्ली में बेरहम ही बेरहम है

दिल्ली में अनाड़ी नहीं है
दिल्ली में खिलाड़ी ही खिलाड़ी है

बाकी
दिल्ली में पैंट उतार दो
दिल्ली में पैसा ही पैसा है !

 

त्रासदी : एक महान संकट

जो खुद दुनिया को खिलाता रहा
वही भूखा रह गया

जो खुद संसार में उजाला फैलाता रहा
वही अंधेरा में रह गया

जो खुद दुनिया को हरा-भरा करता रहा
उसी के मन में सूखा रह गया

जो खुद दुनिया को हंसाता रहा
उसी के अंतस में अंधेरा रह गया

जो खुद दुनिया के लिए घर-बार बनाता रहा
वही बेघर रह गया

जो खुद दुनिया के लिए शुभ-लाभ रहा
वही अशुभ रह गया

जो खुद दुनिया भर में प्यार बांटता रहा
वही प्यार के लिए तरसता रहा

जो खुद दुनिया को अहिंसा का सन्देश देता रहा
वही हिंसा का शिकार हो गया

जो खुद दुनिया के लिए महला-दोमहला बनाता रहा
वही जंगलों में रह गया

जो खुद दुनिया को स्पृश्य बनाता रहा
वही अस्पृश्य बना रह गया

जो खुद ईश्वरों का आविष्कार करता रहा
वही कुम्हार बना रह गया

जो खुद दुनिया का तन ढंकता रहा
वही जुलाहा बना रह गया

जो खुद दुनिया को कांटों से बचाता रहा
वही चमार बनकर रह गया

जो खुद दुनिया को अपने कन्धों पर ढोता रहा
वही कहार बनकर रह गया

जो खुद दुनिया को अमृत पिलाता रहा
वही ग्वाला बनकर रह गया

जो खुद दुनिया को दर्शनीय बनाता रहा
वही हज़्ज़ाम बनकर रह गया

जो खुद दुनिया को जन्नत की सैर करता रहा
वही कलबार बनकर रह गया

जो खुद दुनिया को चमन बनाता रहा
वही मेहतर बनकर रह गया

और जो परजीवी बनता चला आ रहा है
वही राजा बनता चला जा रहा है!

मां

मां और बच्चा के बीच में
यह खेल
बहुत देर से चल रहा है

मां बार-बार अपनी ओढ़नी को
छाती पर संभालती है
लेकिन बच्चा है कि हरेक बार
ओढ़नी को छाती पर से गिरा देता है
और लगता है वह खिल-खिलाकर हंसने
मां बस बच्चा को
आंख भर दिखा देती है

बच्चा कई शरारतों के बीच
एक शरारत और कर बैठता है
इस बार वह
अपनी मां के बाल को
जोर से तिर देता है
मां थोड़ा-सा चिंघाड़ उठती है
और हल्की-सी चपत
अपने लाडले को लगा देती है
बच्चा रोने का नाटक शुरू करता है
अपने लाडले को रोता देख
मां की आंखों में आंसू छलछला आते हैं
और लगती है वह
अपने लाडले को ताबड़तोड़ चूमने

विकास

अन्न क्या है
यह खुद भूखे रहकर देखो

जल क्या है
यह खुद प्यासे रहकर देखो

वस्त्र क्या है
यह खुद बस्ती में नंगे रहकर देखो

और घर क्या है
यह खुद बेघर रहकर देखो

फिर भी आतताइयों, जुल्मियों
तुम तरस नहीं खाते
गरीबों के घर उजाड़ने में
उनका वज़ूद मिटाने में/

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परिचय :-

जन्म : सितंबर, 1976

जन्म स्थान : कर्णपुर, सुपौल (बिहार)

शिक्षा :एमए (हिंदी)

प्रकाशन : *उस देश की कथा* कविता संग्रह प्रकाशित। 2 सम्पादित किताबें *पिछड़ा वर्ग* और *आंबेडकर का न्याय दर्शन* प्रकाशित और चर्चित।

सम्मान :  कई सम्मानों से सम्मानित।

सम्प्रति : कार्यकारी संपादक, युद्धरत आम आदमी

पता : 348/4, गोविंदपुरी, कालकाजी, नई दिल्ली-110019

मोबाइल नंबर : 09910744984

1 Response

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