पंकज शर्मा की तीन कविताएं

1.

मुकम्मल वक्त बता देती हैं.
मुझे मंदिर की घंटियाँ
ये जरूरी नहीं कि जगाने
के लिए भगवान ही आएं

दिख जाता है सत्य मजलूम
की आँखों में भी
ये जरूरी नहीं कि
इसके लिए श्मशान ही जायें

मेरे घर के कबाड़ में पड़े हैं
कई टूटे फूटे खिलौने….
माँ से फिर माँग लू
एक खिलौना ….
एसे अरमान कहाँ से लायें…..

2.

साल दर साल मुझे बड़ा होने को
कहते रहे लोग…
साल दर साल बारिश आती रही
और..हारते रहे लोग।

मैं अकिंचन,मुझको बड़ा घर
दिखाते रहे लोग..
मैं बारिश में मस्त,मुफलिसी में व्यस्त
मिट्टी था, मिट्टी का घर बनाता रहा
और..लोग जलते रहे।

3.

ये बारिश बहुत काम आती थी…
दोस्तों को आजमाने में
और बिना छाता लिये घर से
निकल जाते थे हम..सोचते थे

कोई तो होगा जो हम पर
आसमान के नीचे आसमां रख देगा…
सचमुच सच्चे दोस्त होते थे…

ये बारिश बहुत काम आती ..

जब खुद के लिये नहीं..

किसी और के लिए छाता ले जाते थे…

सोचते थे..सच्चे साथी यूं ही नहीं मिलते…

और..आज भी ये बारिश बहुत काम आती है…
भीगी पलकों को साथ लेकर चलने में..
और कोई जान भी नहीं पाता कि
मैं भीगा हूं या भीगी हैं आँखें..
रिश्तों के,दोस्तों के,जमाने के पल में बदलने से…

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