पंखुरी सिन्हा की 4 कविताएं

पंखुरी सिन्हा

शिक्षा —एम ए, इतिहास, सनी बफैलो, 2008

           पी जी डिप्लोमा, पत्रकारिता, S.I.J.C. पुणे, 1998

            बी ए, ऑनर्स, इतिहास, इन्द्रप्रस्थ कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, 1996

अध्यवसाय—-BITV, और ‘The Pioneer’ में इंटर्नशिप, 1997-98

        —- FTII में समाचार वाचन की ट्रेनिंग, 1997-98

        —– राष्ट्रीय सहारा टीवी में पत्रकारिता, 1998—2000

 

प्रकाशन———हंस, वागर्थ, पहल, नया ज्ञानोदय, कथादेश, कथाक्रम, वसुधा, साक्षात्कार, बया, मंतव्य, आउटलुक, अकार, अभिव्यक्ति, मंतव्य  आदि पत्र पत्रिकाओं में, रचनायें प्रकाशित, दैनिक भास्कर पटना में कवितायेँ एवं निबंध, हिंदुस्तान पटना में कविता एवं निबंध,

किताबें —– ‘कोई भी दिन’ , कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, 2006

                  ‘क़िस्सा-ए-कोहिनूर’, कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, 2008

                   ‘प्रिजन टॉकीज़’, अंग्रेज़ी में पहला कविता संग्रह, एक्सिलीब्रीस, इंडियाना, 2013

‘डिअर सुज़ाना’ अंग्रेज़ी में दूसरा कविता संग्रह, एक्सिलीब्रीस, इंडियाना, 2014

 पवन जैन द्वारा सम्पादित शीघ्र प्रकाश्य काव्य संग्रह ‘काव्य शाला’ में कवितायेँ सम्मिलित

 हिमांशु जोशी द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘प्रतिनिधि आप्रवासी कहानियाँ’, संकलन में कहानी सम्मिलित

 विजेंद्र द्वारा सम्पादित और बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कविता संग्रह ‘शतदल’ में कवितायेँ शामिल 

रवींद्र प्रताप सिंह द्वारा सम्पादित कविता संग्रह ‘समंदर में सूरज’ में कवितायेँ शामिल

गीता श्री द्वारा सम्पादित कहानी संग्रह ‘कथा रंग पूरबी’ में कहानी शामिल

‘रक्तिम सन्धियां’, साहित्य भंडार इलाहाबाद से पहला कविता संग्रह, 2015

पुस्तक मेले २०१७ में बोधि प्रकाशन से दूसरा कविता संग्रह, ‘बहस पार की लंबी धूप’, प्रकाशित

पुरस्कार— 

कविता के लिए राजस्थान पत्रिका का २०१७ का पहला पुरस्कार

 राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड 2013

पहले कहानी संग्रह, ‘कोई भी दिन’ , को 2007 का चित्रा कुमार शैलेश मटियानी सम्मान

             ————‘कोबरा: गॉड ऐट मर्सी’, डाक्यूमेंट्री का स्क्रिप्ट लेखन, जिसे 1998-99 के यू जी सी, फिल्म महोत्सव में, सर्व श्रेष्ठ फिल्म का खिताब मिला

————-‘एक नया मौन, एक नया उद्घोष’, कविता पर,1995 का गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार,

————-1993 में, CBSE बोर्ड, कक्षा बारहवीं में, हिंदी में सर्वोच्च अंक पाने के लिए, भारत गौरव सम्मान

 

अनुवाद—-कवितायेँ मराठी, बांग्ला, पंजाबी, स्पेनिश  में अनूदित,

          कहानी संग्रह के मराठी अनुवाद का कार्य आरम्भ,

उदयन वाजपेयी द्वारा रतन थियम के साक्षात्कार का अनुवाद,

रमणिका गुप्ता की कहानियों का हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद

 

सम्प्रति—-

पत्रकारिता सम्बन्धी कई किताबों पर काम, माइग्रेशन और स्टूडेंट पॉलिटिक्स को लेकर, ‘ऑन एस्पियोनाज़’,

एक किताब एक लाटरी स्कैम को लेकर, कैनाडा में स्पेनिश नाइजीरियन लाटरी स्कैम,

और एक किताब एकेडेमिया की इमीग्रेशन राजनीती को लेकर, ‘एकेडेमियाज़ वार ऑफ़ इमीग्रेशन’,

साथ में, हिंदी और अंग्रेजी में कविता लेखन, सन स्टार एवम दैनिक भास्कर में नियमित स्तम्भ एवम साक्षात्कार

 

संपर्क—-A-204, Prakriti Apartments, Sector 6, Plot no 26, Dwarka, New Delhi 110075

ईमेल—-nilirag18@gmail.com

9968186375——सेल फ़ोन

 

कविता का नक्शा

कविता का अपना एक रूमान तो होता ही है

अपना एक नक्शा भी होता है

वह जाने किन पहाड़ों, पठारों से होती हुई

लांघती सारी राजनैतिक सीमाएं

अक्सर किसी नदी नहीं तो सूख रहे

या भर दिए जा रहे

जलाशय पर आ टिकती है

नदियों के तलछट का भी अपना एक रोना है

उसमे नदियों का होना तो है

पर बहुत कुछ का खोना भी

और इस रुदन में अपना एक कम्पन होता है

कारण और वजूद भी

और इस तरह

एक पूरा नक्शा होता है कविता का

और अचानक तात्कालिक शहर के नक़्शे के उसपर

उतारे जाने से

रूठकर जंगलों में चली जाती है कविता……….

वास्तु— १

वास्तु लिखा देखा दुकान का नाम

तो मन उदास हुआ

जैसे उस लड़की के कहने पर कि

मछलियाँ अच्छी होती हैं

वास्तु की दृष्टि से

घर के भीतर

जबकि घुटन तो उन्हें भी होती होगी

छोटे से शीशे के मर्तबान में

खैर ऐसा कोई मर्तबान नहीं था मेरे घर में

बस उन्होंने घुटन भर दी थी बहुत

जो मैं निकाल नहीं पायी

वो आदमी भी नहीं निकाल पाया

जो केवल यह कहने आया था

कि वास्तु के हिसाब से

अगस्त तक रुक जाएँ

घर को बाज़ार में डालने से

उसने अगर वास्तु न कह

सिर्फ ये कहा होता

कि रुक जाएँ अगस्त तक

ये नहीं कि रुक ही जाएँ

लेकिन सिर्फ अगस्त तक

एक अद्भुत महीना है अगस्त

वास्तु की दृष्टि से

वैसे किसी ने नहीं कहा कि कितना सुन्दर है साथ हमारा

वो तमाम लोग जो यही कहते थे

हममें से कौन बेहतर आज या ज़्यादातर

पर बातें बेहतरी की थीं

और चुप्पी इस पर कि कितना सुन्दर था साथ हमारा

अगस्त के बाद शायद और सुन्दर हो जाएगा

कहते तो शायद हम बने रह जाते

अपनी जगह

कई बार केवल अपनी जगह बने रह जाना

ज़िन्दगी में सबसे ज़रूरी बात होती है………………..

और  वास्तु भी

भक्ति और श्रद्धा के सब उपकरणों की तरह

इस हद तक

खरीदी और बेची जाने वाली चीज़ थी

बहुत उदास करने वाली बात थी………………

अनुवाद

 वहां की सारी बातों के

यहाँ लाये जाने के क्रम में

जैसे कि वो शाम थी

उस अजनबी ही रहे आये

विदेशी शहर में

लगता था ज़िन्दगी की आखिरी शाम थी

इतने ज़्यादा बनवाने होते हैं कागज़ अब

यातायात के साथ साथ

इमिग्रेशन भी एक इतना बड़ा व्यापार है

कि लगता था वाक़ई उस शहर में

आखिरी ही शाम थी

अजब किलेबंदी का शहर रहा वह

घेरे बंदी का भी

हर दरवाज़े के खुलने पर

पहरे की इत्तला का

आखिरी दिनों में

ट्रेन तक को छोड़कर

पैदल दूरियाँ तय करने का शहर

फिर भी

आखिरी शाम तक

नितांत अपरिचित

रहा आया

नए चौक चौराहों वाला

हर कदम पर एक नए मोड़ वाला शहर

लाने में उसकी सारी बातें यहाँ

बिखरता है जादू

आखिरी महफ़िल का

शीशे के गिलास में कांपती मोमबत्ती का

माइक पर झुकी हज़ारो मुद्राओं का

बातों का भी

बिखरता है जादू

अनुवाद और यातायात में………………

 

और नया ज़मींदार

अब मेरी बारी थी

काफी देर तक ये कहने की

कि जो एक हल्का सा उच्छ्वास निकल गया था

हल्की सी उफ़ या चक मेरे मुंह से

उसके सन्देश के आते वक़्त

काफी देर इंतज़ार करने के बाद

सन्देश का उसके

वो दरअसल सामने खुले पन्ने की लिखाई पर थी

मेरी अपनी लिखावट

बातों पर

सवाल ये था

कि उफ़ यहाँ निकली थी

सन्देश फ़ोन पर थे

फ़ोन मेरे हाथों में

मेरे चेहरे के आगे

पर ये उफ़ वाली बात कहता कौन?

तत्क्षण ही आया था उसका जवाब

वह बाधा दे रहा था

मेरी सुबह की दिनचर्या में

और ये कैसे कहा जाता

कि वही था दिनचर्या

वही दिन भी

और जेठ की धूप से कड़ी थी

उसकी निगरानी

पर ये उफ़ वाली बात

हम दोनों में से

कहता कौन?…………………

You may also like...

1 Response

  1. Sharat says:

    I can’t decide whether the author is a poetess or philosopher. Evidently she is both. But again i am in dilemma, as to who is greater of the two ! I find both are best, yet better than each other. Please accept my 1000+ salutes. ?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *