परितोष कुमार पीयूष की तीन कविताएं

मत आना प्रिय तुम!

सुनो प्रिय
मत आना तुम मुझसे मिलने
ठीक नहीं है मौसम मेरे शहर का
यहाँ शहर की नालियों में
लाशें ही लाशें हैं
सड़कों पर धर्म और राजनीति के
साँप फुफकार रहे हैं
यहाँ की गलियों में
खूनी फब्बारों का आनंद लेने आती है
प्रशासनिक गाड़ियां हर शाम
इंसान अब यहाँ इंसान नहीं है
बल्कि हिन्दू और मुसलमान है
यहाँ आदमी बम है
आदमी पिस्तौल है
आदमी आतंक है
आदमी गुलाम है
आदमी ही सामंत है
मत आना प्रिय तुम मुझसे मिलने
यहाँ की हवाएं
तुम्हें साँस नहीं लेने देंगी
श्मशानी सड़कों पर
तुम्हारे कदम नहीं बढ़ेंगे
तुम्हारे ही शक्ल के लोग
हिन्दू या मुसलमान करार दे
तुम्हें मार डालेंगे
मेरी आखिरी इच्छा है
मैं रहूँ ना रहूँ
मत आना तुम मुझसे मिलने
भिंगो लेना अपने सूखे होठों को
खारे जल से
मगर मत आना प्रिय तुम
मेरे शहर

मुझे किसने लूटा!

कैसे कहूँ
मुझे किस-किस ने लूटा
मुझे तो अपने ही घर ने लूटा
शर्म आती है मुझे कहने में
कहाँ से शुरू करूँ
कब से शुरू करुँ
पिता से शुरू करुँ या पति से
बचपन से शुरू करुँ या जवानी से
मुझे तो पहले सभी अपनों ने लूटा
फिर कभी अँधेरी गलियों ने
तो कभी सूनसानों ने लूटा
सुबह मंदिर ने लूटा
शाम मीडिया ने लूटा
नुक्कड़ की आँखों ने लूटा
चौराहे की मुस्कानों ने लूटा
खेतों ने लूटा, खिड़कियों ने लूटा
वर्दी ने लूटा
फिर लबादों ने लूटा
चली तो सफर ने लूटा
सोयी तो सपनों ने लूटा
मत पूछो किस-किस ने लूटा
मुझे तो धरने में
अपने ही कॉमरेडों ने लूटा
किस-किस का नाम लूँ मैं
मुझे तो अवसरों ने लूटा०

सभ्यता का विकास!

मानव सभ्यता के
विकास में
हम मानव से
पशु
कब बन गये
पता ही ना चला
सभ्यता के उदय में
समस्त मानवीय मूल्यों का
पतन हो गया
संसाधनों की खोज
और विकास में
हमारी सारी संवेदनाएँ
विस्मृत होती गयीं
पनपते बाज़ार में
कराहते/टूटते
रिश्तों ने
घर में ही
घर बना डाला
सभ्यता विकास के
इस दौर में
पशुता में
तब्दील हो चुकी
आदमियत ने
अपना ही
विनाश कर डाला
यही
हमारी सभ्यता का
चमकता विकास है
कि आज
आदमी ही
आदमी के खिलाफ
खड़ा है
——-
नाम- परितोष कुमार ‘पीयूष’
जन्म- 28/10/1995
क्षा- बी०एससी० (फिजिक्स)
रचनाएं- विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं, साझा काव्य संकलनों एवं वेब पत्रिकाओं
में कविताएँ प्रकाशित।
कार्य-अध्ययन एवं स्वतंत्र लेखन।
मो०- 7310941575, 7870786842

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