परितोष कुमार ‘पीयूष’ की दो कविताएं

इंसानी शक्ल वाले गिद्ध

नन्हें कदमों से
परचून की दूकान जाते वक्त
जब वो खींच ली गई होगी
सड़क किनारे से
खर-पतवारों के बीच
सूनसान जंगली खेतों में
कितनी छटपटाई होगी
कितनी मिन्नतें माँगी होगी

कैसा लगा होगा उसे
जब उसका सुनने वाला
कोई नहीं होगा
उसकी अपनी ही आवाज
डरावनी चीखों में
तब्दील होकर लौटती होगी कानों में

उसके हर विरोध पर हावी हो गया होगा
इंसानी शक्ल वाले गिद्धों का झुंड

उसके सारे सपने/
सारी आकांक्षाओं ने
दम तोड़ दिया होगा
और वह ढीली,निढाल
पर गयी होगी
गिद्धों की पकड़ में
जिस्म पर बचे, कपड़ों के
चंद फटे टुकड़ों के साथ
उसकी खुली आँखों के सामने
हो रहा था, उसके
अंगों का बँटवारा
गिद्धों के बीच
शायद, उसे पता चल चुका था
परसों रात भी
यही हुआ होगा
नीम के पेड़ से लटकी
रज्जो की लाश के साथ
जिसे आत्महत्या
साबित कर दिया था
समाज के
कद्दावर लोगों ने
पंचायत की चौकी पर……..

कटोरे में कैद बचपन

रुकती है ट्रेन, जब
छोटे-बड़े स्टेशनों पर
देखता हूँ
ट्रेन की खिड़कियों से

कुछ नंग-धड़ंग
चिथरों से ढके
कंकाली बच्चों को
प्लेटफॉर्मों पर

जो ट्रेन के रुकते ही
दौड़े चले आते हैं
खिड़कियों और दरवाजों की ओर
मन में बहुत सी
आशंकाएं और संभावनाएं लिए
और बढ़ा देते हैं
अपनी नन्ही हथेलियाँ
और उनपर रखी
एल्युमीनियम की
पिचकी हुई कटोरियां
उम्मीद भरी नजरों के साथ
हमारी ओर

खिलौने की उम्र में
कटोरे लिए बच्चों को देख
कचोटता है मन

कि यह आखिर
कैसा विकास है
कैसी व्यवस्था है
और प्रगति के नाम पर
यह कैसा विरोधाभास है

एक ओर जहाँ
बाल-क्रीड़ा कैद है
एल्युमीनियम के पिचके कटोरों में
और बचपन
होम हो रहा
भूखे पेट के
धधकते हवनकुंड में

वहीं दूसरी ओर
प्रतिदिन दिया जाता है
विकास का हवाला
ऊँचे-ऊँचे मंचों से
चिल्ला-चिल्लाकर

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