परितोष कुमार ‘पीयूष’ की दो कविताएं

शहरीकरण

जब हो रहा था
गावों का शहरीकरण
बिछाए जा रहे थे
कंक्रीट
मुनाफों के गोदाम से
ला-लाकर
जब झोपड़ियों को
उजाड़-उजाड़ कर
बन रहे थे
जानलेवा फ्लाईओवर
दी जा रही थी
आहुति प्रकृति की
परियोजनाओं के
धधकते हवनकुंड में,
आधुनिकता के नाम पर

उस समय
फटेहाली का
मारा एक गरीब
चीख-चीख कर
बता रहा था
आने वाले कल/
वर्तमान आज के बारे में
कि किस प्रकार
एक दिन हो जायेगा
समस्त
मानवीय मूल्यों का ह्रास,
टूटेंगे रिश्ते,
मरेगी संवेदनाएं
सिकुड़ती दुनिया के
साथ-साथ
रो-रोकर
कह रहा था
कि कैसे जनता
दफन कर दी जायेगी/हो जायेगी
बाजारवाद की
अमरलता में
शायद उस वक्त
कर दिया था उसे
पागल साबित
हमलोगों ने ही
और कर दिया था
जारी, एक प्रमाणपत्र
उसके नाम
पागलपन का
शहरीकरण के चकाचौंध
और बाजारवाद के
मायाजाल में

 

बस्ती के चौराहे पर

कब तक
खाती रहोगी-
लाठियों की चोट,
झेलती रहोगी-
प्रताड़नाएँ, और
बिकती रहोगी-
सगे-संबंधियों के बीच

अगर आज फिर,
चुपचाप, पूर्ववत
सहती रहोगी जुल्म,
बंधन टूटने के डर से
तो फिर कल,
तुम्हारे साथ
ठीक वैसा ही होगा,
जैसा होता आया है

चुप्पी तोड़ो,
बुलंद करो अपनी आवाज
उठा लो लाठियां,
तुम भी

और जवाब दो
तुम्हारे साथ हुए/हो रहे
सारे अन्यायों/जुल्मों का,
लाठियों की, हर एक चोट का
खूनी पंजों से पनपे घावों का,
शरीर पर फाड़े गये-
अपने वस्त्रों का,
और सूजी हुई-
अपनी आँखों का

वरना,
बेच दी जाओगी, एकदिन
अपनों के हाथों
बस्ती के चौराहे पर-
मानवी गिद्धों के बीच।
या फिर,
कर दी जाओगी
तब्दील-
राख की ढेर में……!

4 comments

  1. सुन्दर, विचारोत्तेजक कविताएँ. युवा और संभावनाशील कवि परितोष पीयूष को बधाई.

  2. एक दिन हो जायेगा
    समस्त
    मानवीय मूल्यों का ह्रास,
    टूटेंगे रिश्ते,
    मरेगी संवेदनाएं
    सिकुड़ती दुनिया के
    साथ-साथ
    रो-रोकर
    कह रहा था
    कि कैसे जनता
    दफन कर दी जायेगी/हो जाये…..अच्छी कविता की शानदार पंक्तियाँ . भाई पीयूष जी को बधाई !

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