पवन कुमार मौर्य की 5 कविताएं

पवन कुमार मौर्य
जन्मतिथि- 01 जून, 1993
शिक्षा– स्नातक भूगोल (ऑनर्स) (बीएचयू, बनारस) एमए (जनसंचार) एमसीयू, भोपाल.
 
प्रकाशन-
जनसत्ता, दैनिक जागरण, अमर उजाला, सुबह सवेरे सहित कई प्रमुख समाचार पत्रों में समसामयिक मसले पर सैकड़ों आलेख, टिप्पणी और पत्र प्रकाशित। डिजिटल साहित्यिक मंच- प्रतिलीपी, हिंदी डाकिया, कंटेंट मोहल्ला सहित कई मंचों पर कविता, कहानियां, यात्रा-वृतांत आदि प्रकाशित. 
पेशा- दिल्ली में पत्रकारिता
 
पता – 
वर्तमान
फ्लैट नं.-677, वैशाली, सेक्टर-2
गाजियाबाद
 
स्थाई पता-
जन्म- बनारस, अब जिला- चंदौली
मानिकपुर, पोस्ट- नौबतपुर, थाना-सैयदराजा
पिन- 232110
सम्पर्क सूत्र- 9667927643
1. मां गूलर की दूध
 
मां गूलर की दूध
मां ओस की बूंद
निमिया की डाल,
नदिया की धार
मां फसलों की नमी
पीपल की गहरी छांव।
 
मां संघर्षों की वटवृक्ष
उत्साह और आनंद की खान
मां चंद्रमा की ठंडक
सूरज की ताप
मां जीवन और प्रकृति की संधि
देह और आत्मा का विन्यास
मां घर की सौंदर्य
दहलीज पार की अकूत संभावना।
खुरदरी हथेली पर सुनहरी रेखाएं
मां कि हल्की मुस्कान
खोल देती है बेशकीमती खजाने के द्वार
माँ, की आंचल में समाए हैं
जीवन के कई अनोखे रंग
मां कही-अनकही अबूझ है.
 
मां गूलर की दूध
निमिया की डाल
मां…..
 
2. संघर्ष के खींचते दोपहर में
 
कविता एक रुमाल की तरह है
इस तरह की एक कविता
हमने भी लिखनी चाही थी
जिसमें,
गम में भींगे आँखों का जिक्र हो
ख़ुशी से चमकती किसी सूरत का जिक्र हो
शोख़ी में इतराने का जिक्र हो
तन्हाई में स्याह भंवर का जिक्र हो,
 
रुमाल के एक एक रेशे में
प्रेमिका के वजूद की आहट तलाशना
कितना अच्छा लगता होगा
संघर्ष के खींचते दोपहर में
एक ठंडी छाँव लेकर आती है
कविता एक रुमाल की तरह
सफर में चलते-चलते
रिश्तों की रेशमी डोर
चिट- चिट कर चिटकने
लगती है,
 
कभी कभी लगता है
खंजर से भी तेज धागों को संभालने में
मेरी मांसपेशियां
लहू-मज्जा सहित उखड़ कर
शरीर से अलग हो जाएंगी
सोचा था कभी मैंने
इनको संभाल कर
झूमर बनाऊंगा
जिन्हे ख्वाबों के महल में
रेशम की एक डोर से टांक दूंगा
 
सुनो,
तुम्हे भी याद करनी चाहिए की
रुमाल रेशे से बुनी है
जिसमें अबतक के मेरे संसार का
एक-एक परिवार उसमें बसा है
मुझे उम्मीद है
अब तुम भी याद रखोगे
एक खोई कविता की तरह मुझे
जिसके एहसास तो हैं पर कोई शब्द नहीं
सीने के उस कोने में जहां
यादों और स्नेह का पानी
मीठी झील की भांति
हिलोरे लेते रहता है
अनवरत साँस लेती मछली
तैरती रहती है
और मैं रुमाल को आसमान के सरकते सीने
में खोंस कर ,
तुमसे कहना चाहता हूँ
हम मिलेंगे एक दिन…..
 
3. छत की मुंडेरों तक
 
बर्फ के फाहे गिरते हैं जब,
थोड़ा चित्त ठहरता है 
थोड़ा सा मन मचलता है
जैसे कि, सूरज शाम में
अपने दोस्तों को 
चाय की चुस्की के साथ
बड़े ही बेफिक्री से विदा करता है।
 
सुबह से गिर रही बर्फ 
शाम तक एकदम ताजी बनी रहती है
तुम्हारे इंतजार में 
कि तुम दिनभर की 
व्यस्तताओं को परे रखकर आओ।
 
जैसे चांदनी सर्द रात में 
छत की मुंडेरों तक 
आहिस्ता-आहिस्ता गिरती रहती है
हल्की नीली श्वेत बर्फ की फाहे,
 
तुम्हारा होना इनको इतना सुहाता है 
कि इनकी तासिर गुलाबी हो जाती है
रूप में, रंग में और इश्क में ।
 
4. पसीने के दो तीन मोती
 
अलसाई सुबह में
तुम्हे पता है
चादरों की सिलवटों
बड़ी ही नरमी से
बिहलाता हूं
खिड़कियों से देर तक
झांकता हूं
लगता है तुम मुझे
छू रही हो,
बड़ी नजाकत से
बिना कुछ कहे
वक्त का रेत
दिमाग से झरता है
रहता हैं…
 
अचानक धप्प..
अचानक धुप्प..
फिर चहरे पर
आधी इंच मुस्कान
करीने से
सूखे होठों पर उभरती है
दरवाजे के रास्ते
ढेर सारी
ठंडी मद्धिम हवा
सांसों से लिपटकर
कहती है
 
बाहर,
फूलों के गमले पर
तेज धूप पड़ने लगी है
उसमें पानी डालो
बालकनी में ले जाओ…
 
जब मैं जाता हूँ तो,
हल्की गर्म धूप
चहरे पर उतरती है
पसीने के दो तीन मोती
छलछला जाती है
माथे पर
मुझे लगता है
इनका स्वाद मीठा और
ख़ूबसूरत होगा.
 
अब रात हो गई है
दूर तक नदी से लेकर
पूरा शहर,
चांदनी में नहाया हुआ है
मेरी यादों में
चाँद की दुधिया रौशनी
ऐसे ठहरी हुई है
जैसे सुबह-सुबह
दूब पर ओस .
गमले के फूल की पत्तियां
ठंडी हैं
रौशनी में
हिल-डूल कर
हरियर चमचमा रही हैं
कुछ कहती हुई..
पूरा एक इंच मुस्कराती हैं.
 
 
 

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