पीयूष कुमार द्विवेदी के 10 दोहे

भीषण सूखा है कहीं, और कहीं सैलाब ।
हमने जो दोहन किया, देती प्रकृति जवाब ।।१।।

नीम कटी जो द्वार की, तरसे मेरे कान ।
सुनने को मिलता नहीं, मधुर कोकिला गान ।।२।।

धरती छाती चीरकर, लेते जल हम खींच ।
लेकिन लौटते नहीं, कितनी हरकत नीच ।।३।।

गंगा बस सरिता नहीं, गंग हिंद की शान ।
इसको मैली क्यों करे, समझ ज़रा इंसान ।।४।।

चिड़िया के बच्चे कहें, दे माँ ध्यान जरूर ।
इंसानों के बीच से, ले चल हमको दूर ।।५।।

खुदगर्जी में जी रहें, होकर ऐसे मस्त ।
काटें तरुवर जो हरे, होगा जीवन अस्त ।।६।।

बादल आते हैं मगर, डालें एक न बूँद ।
फिर भी हम अनजान हैं, जीते आँखें मूँद ।।७।।

खेती योग्य जमीन पर, करते खड़ा मकान ।
फूट-फूट रोने लगे, गेहूँ-अरहर-धान ।।८।।

कई साल के बाद जो, पहुँचे अपने गाँव ।
पगडण्डी पक्की दिखी, गायब पीपल छाँव ।।९।।

आँगन मेरा हो गया, आज बड़ा गुलजार ।
चिड़िया रोशनदान में, करे नीड़ विस्तार ।।१०।।

——

पीयूष कुमार द्विवेदी ‘पूतू’

ग्राम-टीसी, पोस्ट-हसवा, जिला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)-212645

मो.-8604112963

1 Response

  1. Satyendra Kumar Yadav says:

    बहुत ही ही सार्थक दोहे

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