सुशांत सुप्रिय की तीन कविताएं

सुशांत सुप्रिय

इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं
देह में फाँस-सा यह समय है
जब अपनी परछाईं भी संदिग्ध है
‘ हमें बचाओ , हम त्रस्त हैं ‘ —
घबराए हुए लोग चिल्ला रहे हैं
किंतु दूसरी ओर केवल एक
रेकॉर्डेड आवाज़ उपलब्ध है —
‘ इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं ‘

न कोई खिड़की , न दरवाज़ा , न रोशनदान है
काल-कोठरी-सा भयावह वर्तमान है
‘ हमें बचाओ , हम त्रस्त हैं ‘ —
डरे हुए लोग छटपटा रहे हैं
किंतु दूसरी ओर केवल एक
रेकॉर्डेड आवाज़ उपलब्ध  है —
‘ इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं ‘

बच्चे गा रहे वयस्कों के गीत हैं
इस वनैले-तंत्र में मासूमियत अतीत है
बुद्ध बामियान की हिंसा से व्यथित हैं
राम छद्म-भक्तों से त्रस्त हैं
समकालीन अँधेरे में
प्रार्थनाएँ भी अशक्त हैं …
इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं

कठिन समय में
बिजली के नंगे तार को छूने पर
मुझे झटका लगा
क्योंकि तार में बिजली नहीं थी

मुझे झटका लगा इस बात से भी कि
जब रोना चाहा मैंने तो आ गई हँसी
पर जब हँसना चाहा तो आ गई रुलाई

बम-विस्फोट के मृतकों की सूची में
अपना नाम देखकर फिर से झटका लगा मुझे :
इतनी आसानी से कैसे मर सकता था मैं

इस भीषण दुर्व्यवस्था में
इस नहीं-बराबर जगह में
अभी होने को अभिशप्त था मैं …
जब मदद करना चाहता था दूसरों की
लोग आशंकित होते थे यह जानकर
संदिग्ध निगाहों से देखते थे मेरी मदद को
गोया मैं उनकी मदद नहीं
उनकी हत्या करने जा रहा था

बिना किसी स्वार्थ के मैं किसी की मदद
कैसे और क्यों कर रहा था
यह सवाल उनके लिए मदद से भी बड़ा था

ग़लत जगह पर सही काम करने की ज़िद लिए
मैं किसी प्रहसन में विदूषक-सा खड़ा था

जो नहीं दिखता दिल्ली से
बहुत कुछ है जो
नहीं दिखता दिल्ली से

आकाश को नीलाभ कर रहे पक्षी और
पानी को नम बना रही मछलियाँ
नहीं दिखती हैं दिल्ली से

विलुप्त हो रहे विश्वास
चेहरों से मिटती मुस्कानें
दुखों के सैलाब और
उम्मीदों की टूटती उल्काएँ
नहीं दिखती हैं दिल्ली से

राष्ट्रपति-भवन के प्रांगण
संसद-भवन के गलियारों और
मंत्रालयों की खिड़कियों से
कहाँ दिखता है सारा देश

मज़दूरों-किसानों के
भीतर भरा कोयला और
माचिस की तीली से
जीवन बुझाते उनके हाथ
नहीं दिखते हैं दिल्ली से

मगरमच्छ के आँसू ज़रूर हैं यहाँ
किंतु लुटियन का टीला
ओझल कर देता है आँखों से
श्रम का ख़ून-पसीना और
वास्तविक ग़रीबों का मरना-जीना

चीख़ती हुई चिड़ियाँ
नुचे हुए पंख
टूटी हुई चूड़ियाँ और
काँपता हुआ अँधेरा
नहीं दिंखते हैं दिल्ली से

दिल्ली से दिखने के लिए
या तो मुँह में जयजयकार होनी चाहिए
या फिर आत्मा में धार होनी चाहिए

———–
सुशांत सुप्रिय
प्रकाशित कृतियाँ :# हत्यारे , हे राम , दलदल ( तीन कथा – संग्रह ) ।
# अयोध्या से गुजरात तक , इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं
( दो काव्य-संग्रह ) ।
सम्मान : भाषा विभाग ( पंजाब ) तथा प्रकाशन विभाग ( भारत सरकार ) द्वारा रचनाएँ
पुरस्कृत । कमलेश्वर-कथाबिंब कहानी प्रतियोगिता ( मुंबई ) में लगातार दो
वर्ष  प्रथम पुरस्कार ।
अन्य प्राप्तियाँ :# कई कहानियाँ व कविताएँ अंग्रेज़ी , उर्दू , पंजाबी, उड़िया, मराठी,
असमिया , कन्नड़ , तेलुगु व मलयालम आदि भाषाओं में अनूदित                                      ,                              व प्रकाशित । कहानियाँ कुछ राज्यों के कक्षा सात व नौ के हिंदी
पाठ्यक्रम में शामिल । कविताएँ पुणे वि. वि. के बी. ए.( द्वितीय
वर्ष ) के पाठ्य-क्रम में शामिल । कहानियों पर आगरा वि. वि. ,
कुरुक्षेत्र वि. वि. , व गुरु नानक देव वि. वि. , अमृतसर के हिंदी
विभागों में शोधार्थियों द्वारा शोध-कार्य ।
# अंग्रेज़ी व पंजाबी में भी लेखन व प्रकाशन । अंग्रेज़ी में काव्य-संग्रह
‘ इन गाँधीज़ कंट्री ‘ प्रकाशित । अंग्रेज़ी कथा-संग्रह ‘ द फ़िफ़्थ
डायरेक्शन ‘ और अनुवाद की पुस्तक ‘विश्व की श्रेष्ठ कहानियाँ’
प्रकाशनाधीन ।
ई-मेल : sushant1968@gmail.com

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3 Responses

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