कविता में भाषा की खोज

शहंशाह आलम

मेरे मन में अक्सर यह प्रश्न आता.जाता रहा है कि भाषा का काम क्या है? मैं सोचता हूँ (मेरा ऐसा सोचना भाषा के विद्वान अध्येता की दृष्टि में किसी जाहिल, किसी अपढ़, किसी बच्चे का सोचा हुआ कहा जा सकता है, तब भी मैं अपने इस सोचे को एक राह ज़रूर देना चाहूँगा) कि भाषा न समुद्र है, न पहाड़, न जंगल, न पशु, जो मनुष्य के काम आते हैं, फिर भाषा इस समुद्र, इस पहाड़, इस जंगल, इस पशु से भी आगे निकलकर मनुष्य के लिए कैसे सबसे ज़रूरी हो गई। मनुष्य किसी भाषा से इतना सम्बद्ध कैसे हो गया कि इसका काम इसके बिना चल नहीं सकता। लाख टके की बात यह है कि भाषा मनुष्य के पास नहीं होत, तो शायद वह गतिहीन होता या शायद उतना गतिशील नहीं हो पाता, जितना आज है। लाख टके की बात यह भी है कि जैसे मनुष्य स्थिर नहीं ह, वैसे ही भाषा स्थिर नहीं है। एक.दूसरे से जुड़े रहने का माध्यम यह है तो मनुष्य के अपराजेय होने का कारण भी यही है। पराजित मनुष्य के साथ यह इतना ही रहती है, जितना उस पराजित के पास इसे संभाले रखने की ताक़त बची होती है। भाषा का असली साधक मनुष्य है। मेरा अध्ययन यही कहता है। इस भाषा को सभी उच्चारते हैं . आदमी, पशु.पक्षी, समुद्र, वन सभी। तरीक़ा अलग होता है। इसके उच्चारण का सबसे बढ़िया तरीक़ा मनुष्य ने अपने नाम कर रखा है। ध्वनिविज्ञान से यही सिद्ध हुआ है। ध्वनियों के उच्चारण का आरंभ मनुष्य है। मनुष्य इस मामले में भी ऐतिहासिक रहा है कि मनुष्य अपने अलावे दूसरे के कहे को बख़ूबी समझ लेता है। भाषा का कर्ता मनुष्य रहा है। निमित्त बहुत कुछ हो सकता है। कविता भी निमित्त मात्र होती है। सारा काम भाषा ख़ुद कर देती है जिसका कर्ता मनुष्य है। अन्यथा कोई कविता संप्रेषित कैसे हो जाती है बहुतों.बहुतों तक निरन्तर गतिशील एकदम। यह दुनिया त्रासद है, तब भी कविता इसे अच्छा सिद्ध.प्रसिद्ध करने में लगी रहती है। कविता भाषा के माध्यम से ऐसा कर पाती है,चाहे वह कवि द्वारा कही गई है अथवा लिखी गई। कविता की रूप.रेखा का विज्ञान यही कहता है। अपने समय के एक अच्छे कवि हरिनारायण व्यास की एक कविता, जिसका शीर्षक ‘विस्तार’ है, में एक अच्छी भाषा मैंने ढूँढ़ी है। आपको इस कविता की भाषा आप ही की भाषा लगेगी :
मैं अपने को कहाँ-कहाँ खोजूँ/ महँगाई में/मकान में/दफ़्तर में/दुकान में/फूलों में/ चाँदनी में/चिंताओं में/ चिंतन में/ बीवी में/ बच्चों में/ झूठों में सच्चों में/पक्कों में कच्चों में/बोए हुए बीजों में/कटी हुई फसल में/मैं अपने को कहाँ-कहाँ खोजूँ/ मेरा प्रतिबिम्ब/वक़्त की हर एक समस्या की/ आत्मा में है/मेरी यह विभाजन की धुकधुकी/ज़िन्दा रखे है/सृष्टि की रफ़्तार/मैं बिखर कर/सब तरफ़ फैला हूँ/हर भीड़ में मैं ही/अकेला हूँ/भीड़ बँधी है/मेरे बिखराव में।

कविता की भाषा ऐसी होनी चाहिए जिसके पाठ के समय पेड़ भी, पत्थर भी, दरिया भी, दरिया की मछलियाँ भी, घनी रात भी, रात के पक्षी भी और रात के मजूर.किसान भी अपना सिर हिलाने.डुलाने लगे। कविता की भाषा के पक्ष में। कवि का उद्यम यही होना चाहिए। कवि के गर्भ से ऐसा कुछ जन्मे कि कविता सुनने.पढ़ने वाले कविता में डूबते.उतराते किनारे लगें तो उन्हें लगे कि नदी पार कर मोती.सा हासिल हुआ है। वे मालामाल हो गए हैं। सुना आपने, भाषा ऐसी होनी चाहिए। कवि का शब्द और कर्म ऐसा होना चाहिए। सुख अच्छी भाषा की कविता में है। यह तो सभी मानते हैं। यह सुख अपने सुनने.पढ़ने वालों को कितना देते हैं। बस यही सुनना पसंद नहीं करते कवि बन्धु। पूछो तो ग़ुस्सा हो जाते हैं। कहेंगे मुझे जो रचना था रचा। यह कहकर आपका कंधा थपथपा देंगे। जैसे सारा ईश्वरत्व उन्हें प्राप्त है। ऐसा इधर के कवियों में अधिक पाया जाने लगा है। यानी इधर के कवि अपने को ईश्वर का अवतार अधिक समझते हैं। कवि अपने को भाषा शास्त्री कम प्रतिष्ठित कवि कहलाना ज़्यादा पसंद इसीलिए करते हैं। उससे बड़ा कवि शास्त्रज्ञ है तब भी उसकी बला से। वास्तविकता यही है। कवि के ऐसा सोच भर लेने से कविता की स्थिति दयनीय हो जाती है। उस कवि से कुछेक अच्छी कविता मंज़र-ए-आम पर आती। वह तो आने से रह ही जाती है। ऐसा करते हुए हम अतीत देखना छोड़ देते हैं। जिस अतीत में अद्भुत.अनूठा रचा गया है। जो अतीत में नहीं देखेगा वह अपना वर्तमान क्या सँवारेगा। वर्तमान नहीं सँवार पाएगा तो भविष्य को ख़ाक के अलावा और क्या देगा। मैं तो अतीत में ताकता-झाँकता रहता हूँ।
ढाई दशक पहले कविता में भाषा की खोज करते हुए ‘तीसरा सप्तक’ के कवि मदन वात्स्यायन की कविता ‘शिफ़्ट फ़ोरमैन’ पढ़ी थी। कविता को जीते हुए आज भी लगता है कि वैसी एक कविता मेरी झोली में आ जाती तो मैं उस एक कविता से ही अपने को धन्य मान लेता। कविता लम्बी है, तब भी मैं आपको मदन वात्स्यायन जी की यह कविता यहाँ पढ़वाना चाहूँगा। इस कविता को मैं अपने जीवन की आत्मकथा जो मानता हूँ

भोंपा चीख़ उठा, मेरी भोर हो गई, श्रीमती जी, ज़रा एक कप चाय बना दो

सुना है सोने-सा चमकीला गोला एक सूर्य होता है,
जब वह आता है तो, आकाश में अट्टहास कर,
डालियों और पत्तियों के बीच
में अपनी उंगलियाँ फंसा
खिड़कियों और दरवाज़ों में हाथ डाल
सारी दुनिया को जगाने लगता है।
बहुत लोग उठ जाते हैं, कुछ लोग
खिड़की बन्द कर ले, या चादर में मुँह छिपा
सोए रह जाते हैं।

सुना है चाँदी.सा चमकीला गोला एक चाँद होता है,
जब वह आता है तो, मस्जिदों के गोल.गोल गुंबजों पर,
चौड़ी.चौड़ी छतों पर, लम्बी.लम्बी मीनारों पर,
खड़ा हो, मुअज़्ज़िन ख़ुदा के नाम पर,
उसके सारे बन्दों को पुकारने लगता है।
दो जाते हैं, दस घर रहते हैं।

पर यह भोंपा जिन.जिन को पुकारता है, वे,
प्रकाश हो या अँधकार,
आँधी हो या तूफ़ान,
रास्ता हो या बेरास्ता,
साइकिल पर, मोटर.साइकिल पर,
बस पर और पैदल,
आधे घण्टे में फ़ैक्टरी में जा रहेंगे।

क्या कहा, अँधियाली रात है?
पूस का महीना है? पानी भी पड़ रहा है?
हवा ज़ोरों से बह रही है?
मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझा।

भोंपा चीख़ उठा, मेरी भोर हो गई, श्रीमती जी, ज़रा एक कप चाय बना दो।
पुकार आई है, क़दम-बा-क़दम होशियार/साढ़े नौ बज गए! मैं कपड़े पहन रहा हूँ

टनन्.टनन्ए ब्रेक भी ठीक है,
पिछले चक्के में भी हवा है, अगले में भी,
अच्छा, तो अलविदा!

उसने कहा, अँधियाली रात है।
अँधियाली क्या?
कहीं यह काली सड़क तो नहीं,
जो चली जाती है, चली जाती है, चलती ही चली जाती है?
रात से उसका मतलब
शायद सड़कों पर के उन बिजली के बल्वों से था
जो आज फ़ैक्टरी के बिजली.घर में कुछ गड़बड़ी हो जाने से बुझ गए हुए हैं
तो क्या हुआ, हमारी साइकिलों में तो रोशनी है।
उसने कहा, पूस का महीना है।
पूस क्या? महीना क्या?
शायद वह ‘थर्ड शिफ्ट’ कहना चाहती थी,
पर उसे टेकनिकल शब्द नहीं आया।
उसने कहा पानी पड़ रहा है।
कैसा पानी? कहाँ पड़ रहा है?
किधर से पड़ रहा है?
वाटर.कूलिंग.टावर्स में आज फिर कोई गड़बड़ी हुई क्या?

उसने कहा, हवा ज़ोरों से बह रही है।
अरे, ये तो मेरे साथी काम करनेवाले हैं, जो
साइकिलों पर सरसराते,
मोटर.साइकिलों पर हड़बड़ाते,
पाँवों झटकते,
फ़ैक्टरी की ओर उमड़ते चले जा रहे हैं।

भोंपा चीख़ उठा, मेरी भोर हो गई,भाई जग मोहन, ज़रा माचिस तो देना
सब ठीक है? धन्यवाद। अच्छा, अलविदा। अब शिफ़्ट मेरा है।

अब शिफ़्ट मेरा है, यह थर्ड शिफ़्ट है,
इस वक़्त मेरे सिर पर न जेनरल मैनेजर है, न वर्क्स मैनेजर
न प्रोडक्शन सुपरिंटेंडेंट, न प्लांट मैनेजर,
यह थर्ड शिफ़्ट है, और शिफ़्ट मेरा है।

मैं हूँ और मेरा असिस्टैंट फ़ोरमैन,
वह और उसके चार्टमैन लोग,
वे और उनके ऑपरेटर,
ऑपरेटरों के हेल्पर।

विशाल काठ के बक्सों.जैसे ये कूलिंग.टावर्स
पाइपों से खिंच कर आई दामोदर नदी की धारा को
जो अपने सिरों पर वहन करते हैं,
और जहाँ से भीमकाय स्रोतों में वह धारा अनवरत झड़ती है,
मानो कनखल में गंगा पत्थरों को फोड़कर निकल पड़ी हो,
डेढ़ अरब पानी रोज़।

यह दैत्य वैगन.टिप्लर!
दोनों हाथों से वैगन के वैगन,
भारी.भारी उजले पत्थरों से भरे,
गोवर्द्धन की तरह उठा कर,
पत्थरों को झकझोर कर
फ़ैक्टरी की ओर लुढ़का देता है।
पच्चास हज़ार मन पत्थर रोज़!

नवरत्न जैसे ये नौ इभैपोरेटर्स!
जिनके पाँव ज़मीन पर हैं तो सिर पचास फ़ीट ऊपर आसमान में,
मिनट.मिनट पर बीस.बीस मन की घूँट लगाते हैं,
मानो समुद्र ही सोख डालेंगे!

ये बीसों स्वतः नियन्त्रित यन्त्र!
इधर दबाव (प्रेशर) आध सेर बढ़ा
कि उसने लपक कर भाप की गर्दन ही दबा दी,
उधर तापमान एक डिग्री घटा
कि यह झट से उठा और पाइप का मुँह पूरा खोल डाला।
फ़ौज़ी कवायद से फ़िट ये फ़रिश्ते!

फ़ैक्टरी की चारों ओर फैला यह दुर्ग प्राचीर,
यहाँ और वहाँ प्लांटों के ये विशाल राज-प्रसाद,
हज़ारों हज़ार वाट के बल्वों की दीवाली का समाँ,
और कामधेनु-सा हमारा प्लान्ट,
यह हमारा साम्राज्य है!
मैं और मेरे साथी,
और यह हमारा थर्ड शिफ़्ट!

भोंपा चीख़ उठा, मेरी भोर हो गई, रामशरण ज़रा टॉर्च तो देना।
मैं गृहस्थ हूँ, यह मेरी गऊ है, इसका मुलाहजा तो कर लूँ।

यह रहा क्रशर, इसके आगे वाले दाँत, जिससे यह पचास हज़ार मन चारा रोज़
काटती है,
ये हैं ग्राइंडिंग मिल्स, इसके चौह, जिससे यह चबाती है,
यह कार्बोनेशन सेक्शन है जहाँ से खाना पचाने के लिए पित्त का बाइल ऐसिड
उतरता है,
और ये है रिऐक्शन भेसेल्स, अरे पेट, जहाँ खाना पचता है इसका,
फिर फ़िल्टर्स, यानी अंतड़ियों, में छनता है वह,
सिट्ठी, इसका गोबर, चौक, जिससे सीमेण्ट बनेगा, हमारे घरों को लीपने के लिए,
रस बढ़ा और डिकॉम्पोज़ीशन सेक्शन, मूत्राशय में आया,
और वहीं ज़हर छोड़ आगे बढ़ा।
अहा, ये आ गए इभैपोरेटर्स, इसके दूध बनाने वाले स्तन
जहाँ इसका रस मथा जाता है, गाढ़ा किया जाता है,
और, ड्रायर्स और कूलर्स के रास्ते, उजली धारा में झड़ निकलता है।
अमोनियम सल्फ़ेट! हमारे भोजन का भोजन! खेतों की खाद!

मेरे बिहार में आजकल अकाल है,
दस प्रतिशत अनाज की कमी है,
तो बढ़ा दूँ दस प्रतिशत खाद का उत्पादन,
दस प्रतिशत ज़्यादा खेतों में खाद गिरेगी,
दस प्रतिशत ज़्यादा धान और गेहूँ के पौधे उगेंगे,
दस प्रतिशत ज़्यादा हमारा भारतवर्ष स्वाधीन होगा,
तो माँग लूँ अपनी कामधेनु से दस प्रतिशत ज़्यादा दूध,
हाँ, क्यों नहीं,
वह मेरी गऊ है और मैं इसका गृहस्थ हूँ,
यह थर्ड शिफ़्ट है और मैं हूँ इस शिफ़्ट का फ़ोरमैन!

ड्रायर्स, मैं लोड बढ़ा रहा हूँ, अपने भाल्भ का मुँह दस प्रतिशत बढ़ा दो,
क्रशर, ग्राइंडर्स, खली और भूसा दस प्रतिशत और डालो।
मैंने कामधेनु के थन सहलाए,
तैयार हो, माँ?
वह कुछ न बोली,
पर वह मेरी गऊ है, और मैं उसका गृहस्थ हूँ,
उसके रोम-रोम ने मुझसे कहा ‘तैयार हूँ बेटा।’
मैंने एक छोटा.सा चक्र पकड़ा
और बाएँ हाथ से उसे आधा चक्कर घुमा दिया,
मानो बछड़े ने माँ के थन में हुदक्का मार दिया हो।
कूलिंग टावर्स पर जल प्रपात दस प्रतिशत और हरहरा उठा।

सुदूर पूर्व देश में,
कल सुबह,
एक नदी के किनारे बैठी एक देहाती किशोरी,
रवि ठाकुर की भाषा में अपने प्रियतम से कहेगी,
प्रिय, आज नदी का पानी दो अंगुल घटा हुआ लगता है।

वैगन.टिप्लर दस प्रतिशत और ज़ोरों से खड़खड़ा उठा।
सुदूर पश्चिम देश में,
एक हफ़्ते बाद,
मरुभूमि की उदास एकरसता में,
जँभाई लेता, एक ठीकेदार,
अपने आदमियों से बोलेगा .
भाइयो, ज़रा आज फावड़ा कुछ तेज़ चलाना तो,
‘ओभर-टाइम’ की फ़िक्र न करनाए थैली हाज़िर है।

दूध की धार दस प्रतिशत मोटी हो गई।
सुदूर दक्षिण देश में,
महीने.भर बाद,
एक दिन शाम को एक किसान का बेटा,
शहर से लौटकर अपने बाप को ख़ुशख़बरी सुनाएगा,
बापू, उतने ही पैसे में खाद भी हो गई,
और चार आने का तंबाकू भी।

एलार्म चीख़ उठा, अरे, मैं बिजली.घर को तो भूल ही गया, मोहन, ज़रा वहाँ
कोयला तो बढ़वा देना।
युग.युग से मेरे देश की भूमि मेरे पुरखों को पालती.पोसती आई है, अपनी
बूढ़ी दादी को मैं आज खाना दूँगा।

पूरब में मेरी साँझ उग आई,
पहले रुपहली, फिर सुनहली,
उषा.सी सुन्दर,
उषा.सी प्रसन्न,
उषा.सी आशामयी।
मैं कामधेनु के दिमाग़, अपने ऑफ़िस से निकलकर
उसकी सींग पर, इस छत पर खड़ा हूँ।
सामने दूर-दूर तक धान के खेतों में,
धान के पौधों की शाखाओं पर,
मेरी आँखों का सुनहला प्रकाश चमक रहा है।
मैं ठठा.ठठा कर हँस रहा हूँ।

मेरा कन्धा पकड़ कर असिस्टैंट फ़ोरमैन कह रहा है,
भई, छह बज गए, लौगबुक पर दस्तख़त कर दो, हम लोग चलें।
मेरी केहुनी पकड़कर एक चार्जमैन कह रहा है,
भाई, दस्तख़त कर दीजिए, दस मिनट ज़्यादा हो गए।
फ़र्स्ट शिफ़्ट का फ़ोरमैन सीढ़ियों पर से आधी देह निकाल कर,
बिगड़ रहा है, भई दस्तख़त क्यों नहीं कर देते?
उस सीढ़ी की जड़ में जड़ में खड़ा उसका चार्जमैन झुँझला रहा है।
इन लोगों ने हम लोगों का भी कुछ सामान ख़त्म कर दिया, कहिए, जल्दी जाएँ,
हम लोग अपनी कमी की फ़िक्र करें।

नीचे सड़कों पर, आने वाले कमकर.
चिल्ला रहे हैं, ज़बर्दस्ती दस्तख़त करवा लो, अब शिफ़्ट हमारा है।
और मैं खड़ा सोच रहा हूँ कि अहा,
सामने उस टावर के ऊपर एक बड़ा बिजली का पंखा होगा,
हज़ार हॉर्स पावर की मोटर से चलता,
एक तूफ़ान उठाता,
जिसमें मेरे बाल इठलाते,
मेरी क़मीज़ के कॉलर फ़हराते,
जो मेरे पाँवों की ताक़त से लड़ता!

भोंपा चीख़ उठा, मेरी साँझ हो गई, लो भाई, यह है मेरा दस्तख़त, तुम्हारा
हक़ क्यों छीनूँ?
मेरे चार्जमैन चल पड़े, मेरे ऑपरेटर और हेल्पर चल पड़े, मैं कामधेनु की एक
टाँग से जा लिपटा!

ग़ौर करें, तो हर भाषा जिस तरह नई खोज है, नई ईजाद है, वैसे ही हर कविता नई खोज और नई ईजाद होती है। भाषा के जानकार और कवि इसी तरह भाषा का और कविता का आविष्कार करते रहे हैं। यह भी कि जिस तरह ब्रह्मांड विज्ञान से जुड़े वैज्ञानिक नए ब्रह्मांड की तलाश में टेलिस्कोप यानी दूरबीन लगाए ब्रह्मांड की ओर देखते हैंए वैसे ही भाषा केए कविता के कुशल कारीगर एक नायाब भाषाए एक नायाब कविता की खोज करते रहते आए हैं। ऐसा इसलिए कि भाषा और कविताए दोनों की संरचना इस मायने में एक है कि दोनों का अभी बहुत सारा रहस्य प्रकट होना बाक़ी है। और कोई भी भाषाकार, कोई भी कवि हमेशा दूरदर्शक बना रहता है। यह भी कि भाषा जिस तरह एक अच्छी कविता तलाशती है, कविता एक अच्छी भाषा तलाशती है। दोनों एक.दूसरे के लिए है। हमारे पास भाषा को बरतने की समझ नहीं होती, तो कविता की खदान से कोई कालजयी, कोई प्रतिनिधि कविता हम कहाँ से ढूँढ़ते या कविता की खदान से खोदकर निकालते। उसी तरह, जैसे मंगलग्रह पर जीवन की खोज में हम लगे होते हैं। कविता में भाषा की खोज का अर्थ भी यही है, जो अर्थ जीवन को खोजने का होता है। किसी कविता को लम्बे अरसे तक ज़िंदा रखने का यह तरीक़ा बेहद कारगर है। ऐसे ही प्रयास से कविता का एक युग बनता है और कवि का भी। कवितायुग को पहचाने जाने के लिए यह सब बेहद ज़रूरी है। तब सवाल यह उठता है कि सारे कवि कविता में भाषा की खोज के लिए अथवा भाषा में कविता की पड़ताल के लिए क्या दिल से गंभीर रहकर, सचेत रहकर ऐसा कर रहे हैं, जैसा स्वर यहाँ मैं विकसित करना चाहता हूँ। ज़ाहिर है, इसका उत्तर खंडित जनादेश जैसा मेरे भी दिमाग़ में आ रहा है… आपके दिमाग़ मेँ ऐसा-वैसा ही कुछ आ रहा होगा। आना भी चाहिए। यह समय ही जब खंडित है, तो फिर हमारे विचार खंडित क्यों नहीं होंगे। लाख टके की बात यही है कि जब कवि का समय खंडित है, ऐसे में वह बिना खंडित रहे कैसे रह सकता है। तब भी सवा लाख टके की बात यह है कि इस खंडित समय के प्रभाव में कवि आ जाएगा, तो उसकी भाषा भी खंडित होगी, कविता भी और उस कवि का विचार भी। यहाँ मैं किसी एजेंडे की बात नहीं कर रहा। अब अपने समय के एजेंडे को लेकर कौन कवि है, जो चल रहा है। मैं भी कहाँ चल पा रहा हूँ, अपने उन एजेंडों परए जिन्हें मैंने कविता में घुसते हुए तय किए थे। मेरा एजेंडा तो यही था कि वामयुग को पकड़े रहना है। लेकिन ऐसा हुआ कहाँ। इसके लिए दोष जितना मेरा है, उससे कहीं ज़्यादा उनका भी है, जो वामयुग को पकड़े रहते हुए जनता विरोधी धारा के संग.साथ अपना छप्पन ईंच का सीना लिए वामयुग को ध्वस्त करने के एजेंडे पर काम कर रहे हैं। इस तरह से देखिए तो आपका, मेरा और कविता का, यानी तीनों का ध्वंस वे कवि कर रहे हैं, जिनकी कविताएँ वाम विचारधारा के पत्र और पत्रिकाओं में छप ज़रूर रही हैं, परंतु वे कवि वोट देते समय उन पार्टियों का समर्थन करते हैं, जो पार्टियाँ मनुष्य विरोधी हैं, भाषा विरोधी हैं, कविता विरोधी हैं। यह एक नई ख़तरनाक स्थिति पैदा होते हुए मैं देश में देख रहा हूँ। जो यह कहते हैंए ‘कि कोई आपके एक को मारता है, तो आप उनके सौ को मारिए’ जो यह कहते हैं, ‘कि कोई आपकी एक लड़की उठाए, तो आप उनकी सौ लड़कियाँ उठा लाओ’ और उनके कहे पर पढ़ा-लिखा, विचारों से भरा हुआ आदमी, ऐसे कहे पर तालियाँ बजाकर उनके कहे का समर्थन करे, ऐसी स्थिति को क्या कहेंगे, मेरी पराजय या आपकी जय? ऐसा होते हुए देखना तब और बुरा लगता है, जब वे ऐसा अकेले नहीं, अपने बीवी.बच्चों समेत कर रहे हैं। सवाल यह भी उठता है कि क्या कबीर . ब्रेख़्त . अहमद फ़राज़ किसी भाषा के लिए किसी कविता के लिए यही चाहते थे या शमेशर बहादुर सिंह . केदारनाथ अग्रवाल . नागार्जुन यही चाहते थे और जाबिर हुसेन . राजेश जोशी . अरुण कमल भी? नहीं नए तब फिर इन कवियों के विचारों पर चलने से हम क्यों मुकर रहे हैं? यह सवाल एक लम्बे समय तक ज़िंदा रहने वाला है और यह सच है। इसलिए कि अपने देश के पहरेदार ही जब हम हत्यारों, बलात्कारियों और गुंडों को बनाने में भिड़े हैं, तो कोई मुझ जैसा बेचारा आदमी क्या करे ! यहाँ ऐसा लिखकर मैं भाषा का, कविता का कोई भदेस प्रदेश नहीं गढ़ना चाहता। लेकिन सच यही है, जो सच्चा मनुष्य, सच्चा कवि है, सच्चा सिद्धांतकार है, वह ऐसी विकट परिस्थिति से आहत होगा ही होगा। इसलिए कि सब कोई एक.दूसरे को भिड़ाने में प्रवृत्त थोड़े ही होता है। बाज़ी जिनको जैसे मारना है, मारे लेकिन कवियों की दुनिया को उर्वर रहने दे। हमारे समय के बेहद महत्वपूर्ण कवि अरुण कमल की कविता ‘उर्वर प्रदेश’ जैसा प्रदेश भाषा को चाहिए, कविता को भी और मुझे भी-

मैं जब लौटा तो देखा
पोटली में बंधे हुए बूटों ने
फेंके हैं अंकुर
दो दिनों के बाद आज लौटा हूँ वापस
अजीब गंध है घर में
किताबों, कपड़ों और निर्जन हवा की
फेंटी हुई गंध

पड़ी है चारों ओर धूल की एक पर्त
और जकड़ा है जल में बासी जल

जीवन की कितनी यात्राएँ करता रहा यह निर्जन मकान
मेरे साथ

तट की तरह स्थिरए गतियों से भरा
सहता जल का समस्त कोलाहल .
सूख गए हैँ नीम के दातौन
और पोटली में बंधे हुए बूटों ने फेंके हैं अंकुर
निर्जन घर में जीवन की जड़ों को
पोसते रहे हैं ये अंकुर

खोलता हूँ खिड़कियाँ
और चारों ओर से दौड़ती है हवा
मानो इसी इंतज़ार में खड़ी थी पल्लों से सट के
पूरे घर को जल.भरी तसली.सा हिलाती

मुझसे बाहर
मुझसे अनजान जारी है जीवन की यात्रा अनवरत
बदल रहा है सारा संसार

आज मैं लौटा हूँ अपने घर
दो दिनों के बाद आज घूमती पृथ्वी के अक्ष पर
फैला है सामने निर्जन प्रान्त का उर्वर प्रदेश
सामने है पोखर अपनी छाती पर
जलकुम्भियों का घना संसार भरे।

अच्छी भाषा, अच्छी कविता उस अच्छी स्त्री के जैसी है, जिसे देखकर कोई बेहद उत्सुक हो उठे। यहाँ यह ख़्याल रखा जाना ज़रूरी है कि मैंने ‘स्त्री’ शब्द का इस्तेमाल ‘उत्सुक’ होने के अर्थ में किया है, ‘उत्तेजित’ होने के अर्थ में नहीं। मेरा मानना है कि एक स्त्री से मिलकर जिस तरह हम उस स्त्री की आत्मा के अंदर एक बेचैन कर देनेवाले संगीत की तह तक पहुँचते हैं और एक बार फिर से मिलने की चाहत पालने लगते हैं, वैसे ही किसी कविता की भाषा हमें इतनी आकर्षित और प्रभावित करती है कि उस कविता से हम पुनः मिलने के प्रयास में ‘उत्सुक’ रहते हैं। इस तरह कविता का नया अर्थ खुलता है। निरर्थक भाषा, निरर्थक कविता ऐसा कर भी नहीं पाएगी। एक अच्छी कविता की पहचान भी यही है कि वह एक अच्छी भाषा से लैस होती है। भाषा अच्छी होगी, तो शैली और अनुभव ख़ुद-ब-ख़ुद अच्छा होता चला जाएगा। जिस तरह भाषा जीवन के निकट रहकर अपने को ताज़ा रखती है, कविता भी जीवन के निकट रहेगी, तभी ताज़ादम लगेगी। कवि के तजुर्बे का भी इससे पता लगता है कि कोई कवि भाषा में कितने गहरे पैठकर अपने समय को रच पाता है। कोई कवि, ख़ासकर इस सदी का कवि, गहरे नहीं उतरेगा, तो वैसे ही मर जाएगा। यह सदी अब के कवियों के लिए आसान रह नहीं गई है। कवि को ज़िंदा रहना है, तो भाषा को अपनी पहचान की तरह संभालना होगा ताकि कविता उस कवि का अपना बयान लगे। उस कवि का अपना जीवन, अपना समय, अपनी सच्चाई कुछ इस तरह कविता की भाषा में प्रकट हो कि कविता हवा के ताज़े झोंके.सी आए और आदमी के भीतर छिपकर बैठी उमस छू हो जाए। इसलिए कि कविता रहस्य है, तो भाषा भी किसी रहस्य जैसी ही होती है। रहस्य को उतना ही खोलना चाहिए जितने से काम चल जाए। सारा खोल देने का ख़तरा यह होता है कि कविता उदास होने लगती है, इसलिए कि भाषा का रहस्य कविता खो चुकी होती है। अच्छी कविता एक रोटी के पकने तक पक जाती है। हम ज़्यादा देर तक जिस तरह रोटी को तवे पर नहीं रख सकते, वैसे ही कविता को ज़्यादा देर अपने में छिपाकर नहीं रख सकते। ऐसा करने से रोटी और कविताएं दोनों जल जाती है। नष्ट हो जाती है। पानी और नमक को मिलाकर हम समुंदर के पानी का मज़ा ले सकते हैं और कविता में भाषा का मिलन कराकर हम कविता और भाषा, दोनों को एक नए काव्य-अनुभव से भर सकते हैं। आज की कविता का नया स्वर हम इसी विधि से पा सकेंगे। बस इस विधि की आग हर कवि के सीने में जलती रहनी चाहिए

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1 Response

  1. कविता के बरक्स भाषा की रचनात्मक भूमिका की अच्छी पड़ताल। बधाई शहंशाह को…

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