अनामिका अनु की 10 कविताएं

1. तथाकथित प्रेम

अलाप्पुझा रेलवे स्टेशन पर,

ईएसआई अस्पताल के पीछे जो मंदिर है

वहाँ मिलते हैं,

फिर रेल पर चढ़कर दरवाजे पर खड़े होकर,

हाथों में हाथ डालकर बस एक बार जोर से हँसेंगे,

बस इतने से ही

बहती हरियाली में बने ईंट और फूस के घरों से झाँकती

हर पत्थर आँखों में एक संशय दरक उठेगा,

डिब्बे में बैठे हर सीट पर लिपटी फटी आँखों में

मेरा सूना गला और तुम्हारी उम्र चोट करेगी,

मेरा यौवन मेरे साधारण चेहरे पर भारी,

तेरी उम्र तेरी छवि को लुढ़काकर भीड़ के दिमाग में

ढनमना उठेगी,

चरित्र में दोष ढूँढते चश्मों में बल्ब जल उठेंगे,

हमारी आँखों की भगजोगनी भुक-भुक

उनकी आँखों के टार्च भक से,

हम पलकें झुकाएंगे और भीड़ हमें दिनदहाड़े

या मध्यरात्रि में मौत की सेंक देगी,

तथाकथित प्रेम ,मिट्टी से रिस-रिस कर

उस नदी में मिल जाएगा

जिसे लोग  पेरियार कहते हैं।

2. टिकुला

एक जोड़े में दो टिकुला,

झरोखे के पास ,पेड़ से लटका।

मंजर,मिठास, भँवरे मिले,फल लगा ,टिकुला हरा।

मन में खिजां रस,

नज़र बचाकर झुरमुट बीच बढ़ा ,

अप्रैल की आँधी झुरमुट को सरका गयी,

जोड़ा दिखने लगा सभी को।

लोगों की आँखों को हरा लगा,

मारा झुटका गिरा दिया,

टहनी से बूँद-बूँद दूध टपक रहा,

पत्थर से फोड़ा,चाटा- चटकारा,

आवाज़ दे किसी ने फटकारा ,

सरपट भागे लोगों की चप्पलें वहीं पड़ी हैं।

क्षत-विक्षत मरा, टिकुला हरा  है।

पकने से पहले टपक चुका,

समाज की लपलपाती जीभ,चटोर मुख और स्वाद की खातिर खप चुका ,

ज़ख्मी बीज, माटी में गड़ा पड़ा,

एक जोड़े में दो टिकुला  मरा है।

अखबार टीवी देख रहे लोगों से नन्ही बेटी पूछ रही-

टिकुला किसने तोड़ा,कहाँ गया टिकुला  हरा?

*टिकुला- टिकोरा ,कैरी,आम का कच्चा छोटा फल

3. कविता से लड़ सकोगे?

इस मौसम में मिज़ाज बदल लो

लड़ा बहुत धर्म, ईमान और सम्मान के लिए

इस बार मेरी कविता के शब्दों से राड़ ठानो

ये औजार और मजदूर बनकर उठ

खड़े होंगे

और कस देंगे तुम्हारे हर ढीले कल पुर्जे को

चल पड़ेंगे वे बंद कारखाने

जहां इंसान बनना कब से बंद था।

क्या खोद  रहे हो

गड़े मुर्दे काले अतीत के

मेरी कविता पर फावड़ा चलाओ

इसमें  दबा है

जीर्ण कहानियों के अस्थिकलश में

खनकता अतीत

क्या चाहिए ?

बहुत तपा कार्बन अपररूप!

मेरी कविता से झांक रही है

आग की उम्मीद

वह कोयला

जो तुम्हारे

चूल्हे को गर्म रखेगा

जहर निगलकर मरना है?

तो चुन लो हीरा…

मेरी कविता को ऐसे हिलाना

कि फूट पड़े उससे ज्वालामुखी

किस क्रोध में तुम इतना आग उगलते हो

जल गये घर, छत, लोग, दुकानें

और बेज़ान बसों के साथ रोजी कितनों की

इस बार जलाना मेरी कविता को

ताकि उस पर सेंक सके भूखे नंगे प्यासे बच्चे

की माएं रोटी।

ऐसी रोटी

जिससे खून और किरासन की बू नहीं आती हो!

4. अनपढ़

वह पति है मेरा –

पढ़ा पंडित

मैं अनपढ़ गँवार

वह एक तकिये दूर है ,

सर्दी जुकाम सब पट जाती है

साथ रहने से

पर ज्ञान नहीं पटी संसर्ग में उनके

काश तुम स्याही होते ,

तो मैं रुई बन सोख लेती

सारे ज्ञान तेरे

पर न तुम तरल थे ,

न मैं अवशोषक

तेरा मुझ से तन-मन का रिश्ता था ,

अगर अक्षरों वाला होता ,

तो मैं भी लिख पाती नाम तुम्हारी पाती पर

उँगलियों से तुम्हारी छाती पर

वह मुझे सगे-संबंधी सब से मिलाता है

पर अक्षरों से कभी नहीं मिलाया उसने

उसके हाथ में कलम देख ललचती रही

वह टेबुल कुर्सी पर बैठ लिखता , पढता , बढ़ता रहा

मैं चूल्हे में पकती पकाती ,

करची हाथों से हिलाती ,

पूरी पक गयी हूँ

बहुत थक गयी हूँ

5.. जरा सा खूँट बाँध लूँ

जरा-सी खुंट बाँध लूँ फिर चलती हूँ ,

दिन भर की थकान और वो – पूरी धूप I

चौथाई भर रागी की रोटी , मत कह इसको ,

चौथाई चाँद है –

जठर ताप को ठंडा करती I

पाँच कूरी मूंग कमाया ,एक ही कूरी पाया I

जो पाप का करना लेखा जोखा –

पाँच को गिनना एक गोसाईं I

सौ रूपये की दाल गोसाईं I

दो सौ रूपये मिले मिठाई I

पीला पड़ा पति पियक्कड़ ,

पाँच सौ में हुई दवाई I

खुंट में बाँध रही क्या ? पूछे मुझसे बूढ़ी तरुणाई I

एसनो पाउडर लगी मेम नहीं , न मैं घर बैठी ठकुराइन I

मैं हूँ हड्डी वाली पटरी , उस पर नित्य निज

सूखी माँस की रेल चलाती I

रेल भी मैं पटरी भी मैं I

वेग भी मैं विराम भी मैं I

तथ्य और प्रमाण भी मैं I

विपन्न , व्यवधान , विवश व्यथा का अविचल विधान हूँ मैं I

6. उपला

छत्तीस साल शादी के,

इश्क़ तो नहीं था।

जरूरत

जो थोपी गयी,

जैसे उपला दीवार पर।

7. झाँकना

काश कि वह झाँकता

इस तरह मेरे भीतर

कि खुल जाती उम्र की वह स्वेटर

जो वक्त के कांटे पर बुनी गयी थी

बिना मेरी इजाज़त के।

8. मैं मारी जाऊँगी

मैं  उस भीड़ के द्वारा मारी जाऊँगी

जिससे भिन्न सोचती हूँ।

भीड़ सा नहीं सोचना

भीड़ के विरूद्ध होना नहीं होता है।

ज्यादातर  भीड़ के भले के लिए होता है

ताकि भीड़ को भेड़ की तरह

नहीं हाँका जा सके।

यह दर्ज़ फिर भी हो

कि

भिन्न को प्रायः भीड़ ही मारती है।

9. लीची शहर की सूनी छत

लीची शहर में अब हम नहीं  रहते

यादें रहती हैं  हमारी

बहुत उदास होगी

लीची शहर की वह छत

जहाँ धूप में  मसनद लगा क्वांटम फ़िज़िक्स

की किताबें पढ़ते थे पापा

माँ ने कितनी बार छत पर परोसा था गर्म खाना

आज छत की सारी रस्सियाँ सूनी हैं

उन पर कभी लटकते थे रंगीन स्वेटर और कपड़े

जिनके टपकते पानी से तब कितना भींगती थी वह छत

गुड़िया सी ढुलमुलाती माँ छत पर आ भी गयी होगी शायद,

पर बहुत ऊपर चले गये पापा

माँ को मिले नहीं होंगे

बहुत दूर चले गये बच्चों को तलशती माँ की आँखें

तब खिड़कियाँ और तन मकान हो गया होगा ।

10. उस शाम

उस शाम जब लाल केसरिया वह सेब डूब गया

खारे शरबत में

मैं उखड़ी दलान की सीढ़ियों पर बैठी काट रही थी

कोहरे से धुंधले दिन को।

पांव तले तब कितनी नदियां गुजर गयी

कितने पर्वत खड़े हो गये आजू -बाजू

रागी-सी मेरी आंखों में मक्के की लाखों बालियां

उमड़ उमड़़ कर खड़ी हो गयी।

मेरे पांवों के नीचे नदी जुठाई चिकनी मिट्टी

तन पर पर्वत आलिंगन के श्वेत तूहीन चिन्ह

आंखों में डूबे हरे मखमल से झांक रहे

उजले मोती।

उस शाम चंद चवन्नी विमुद्रित

खुल गयी नीली साड़ी की खुंट से

झुककर नहीं समेटा हाथों ने

पहली बार नयन ने किया मूल्यांकन

खोटे सिक्कों का

पहली बार कमर नहीं झुकी

मूल्यहीन गिन्नियों की खातिर

पहली बार वह खुंट खुली

और फिर नहीं बंधी

अर्थ,परंपरा,खूंटे और रिक्त से।

—–

अनामिका अनु

प्रकाशन: हंस, कादंबिनी, नया ज्ञानोदय, समकालीन भारतीय साहित्य, वागार्थ, आजकल, बया, मधुमती, परिकथा, माटी, दोआब, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर,दैनिक जागरण,  प्रभात खबर, राजस्थान पत्रिका, जानकीपुल, समालोचन, अनुनाद, शब्दांकन,पोषम पा, हिंदीनामा, हिन्दगी में रचनाएं प्रकाशित।

शिक्षा: एम एस सी (विश्वविद्यालय स्वर्ण पदक) , पी एच डी (  इंस्पायर अवार्ड, DST)

संपर्क :

Anamika Villa

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अनामिका अनु

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