अरुण सिंह की कविताएं

  1. उत्तराधिकार

उस दिन बनती हुई इमारत से
मज़दूर नहीं गिरा था,
गिरी थी मजबूरी।

तब मज़दूर की कमर टूटी थी,
छितरा गया था वह जामुन की तरह
ज़मीन पर पच्च् से;
लेकिन मजबूरी का कुछ
नहीं बिगड़ा तब भी,
जिस दिन गिरा था वह
उसी के अगले दिन से
उसी ऊँचाई पर
खड़ा हो गया था
उसका उत्तराधिकारी
अगली बार जामुन बनने के लिए…

  1. श्याम

तुम्हारी वापसी
केवल तुम्हारी वापसी भर नहीं है।
यह वापसी है धीरे-धीरे भर रहे घावों की,
छालों के फूटकर बहने की।
यह वापसी है
हमारी विफलताओं के पुनर्व्याख्याओं की;
मनुष्य को मनुष्य समझे जाने की भी।
मंगल और चाँद की यात्राओं से नहीं,
यह है अपने ही शहर से गाँव की अवांछित वापसी।

जीवन भर की कमाई ढोते
कोसों पैदल चलते
झोलों में भरे जीवन भर की आकांक्षाएँ
सिलवटों वाले पेट के भीतर उदास हैं आँतें
कन्नी, बसुली, आरी, छेनी, कील-पत्थरों को
ठोंकने-तोड़ने वाली हथौड़ियाँ हैं गमगीन,
सब मिलकर बातें करती चली जा रही हैं
नि:शब्द स्याह सड़कों पर।

संशयग्रस्त हूँ गौरव और ग्लानि से
कि यह वापसी है
वनवास से या घर से पुन: वनवास की ओर
यह वापसी है कटिया-हँसिया और हल की ओर या
लोक का लोक में ?
यह किसी बनी-बनाई छवि का विरूपण है या कुछ और…!

  1. श्वेत

वह नन्हीं-सी चिड़िया बता रही थी,
देखो! घड़ी की सुई भी वापस हो गई है
बीसों साल पहले के समय में।
नदियों का जल-वेग बढ़ा हुआ है बहुत बरसों पहले जैसा;
लुब्धक* तारा
मुस्काता है मृदुल गगन से।
अभी कल ही तो;
नहाई-सी कुछ पत्तियाँ बातें करती हुई कैसे इतरा रही थीं !
और वह देखो,
उसके पोर पर कैसे छलक उठे हैं ख़ुशी के आँसू !

शहरों के सभ्य घरों में ठनक रहे हैं सिलबट्टे,
महकने लगी है हाथ की बनी अमिया और पुदीने की चटनी।
घरघरा रही हैं जाँतें और मिट्टी की हाँड़ी में खदबदा रही है
अरहर की कराई वाली दाल।
यह वापसी है जीवन की श्वेत-श्याम तस्वीरों की,
सुख और संताप के आँसुओं की।

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*लुब्धक (सिरिअस):

एक तारा जो आकाश में सबसे चमकदार दिखने वाला है।यह सूर्य के सबसे क़रीब के तारों में से एक है जो सूर्य की तुलना में दोगुना भारी है.


अरुण सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं। वो लखनऊ में रहते हैं और ‘इंडिया इनसाइड’ पत्रिका का संपादन करते हैं।

4 Responses

  1. Devesh says:

    बहुत अच्छा लिखा है अरुण जी ने। ढेर सारी शुभकामनाएं

  2. Prem Sahil says:

    आज सुबह चार बजे इन कविताओं ने हिलाके रख दिया

  3. शैलेन्द्र श्री वास्तव says:

    सम सामायिक यथार्थ को शब्द देतीं कविताएं।बधाई अरुण ..

  4. Anonymous says:

    सत्येन्द्र जी आभार।

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