गजेंद्र रावत की कविताएं

  1. लिबरल्स

बेशक से
ये पढ़े हैं
देश-विदेश की बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटियों में
हासिल हैं ऊंची-ऊंची डिग्रियाँ
माहिर हैं जुबान के
बात का लहजा गजब है
उस्ताद हैं अपने फन के
मगर बू नहीं है पसीने की इनके जिस्म में
कृत्रिमगंध है तीखे परफ्यूम की
भीतर से खौफ खाये हैं
बदलती दुनिया देखकर
और रंग
लाल नहीं है
बल्कि उनकी नज़र भर से
कलर ब्लाइंड हो रहा है आदमी
जबर्दस्त हाथ की सफाई है
मानो काला जादू हो
सरेआम धूल झोंक देती है आँखों में
और इनकी इसी बाजीगरी से
खो रहे हैं लोग-बाग
पसीने की गंध
आँखों की चमक
और रंगों की समझ…

       

  1. मुँह और कान

उनकी प्रयोगशालाओं में
चल रहे हैं
डराने, मारने, मुँह बन्द करने
और बलात् सहमति हासिल करने के
नए प्रयोग
और षड्यंत्रों के शोध
हम भी जुटे हैं
जिंदा रहने
बच निकलने
ताकत और ऊर्जा बचाए रखने में
आधुनिक तकनीक से नहीं
बल्कि आपसी कानाफूसी से
एक मुँह से दूसरे कान तक
पहुंचा रहे हैं
नन्ही-नन्ही चिंगारियाँ
और किसी सुनसान में कर रहे हैं
चिल्लाने का अभ्यास
ताकि ऐन वक्त पर पैदा हो सके
एक बृहद कोरस
और जोड़े जा सकें
अधिक से अधिक
मुँह और कान….