नताशा की कविताएं

  1. अव्यक्त

मेरे आस-पास प्रेम पड़ा था

रस में

गन्ध में

छाया में 

मेरे पकड़ने की चाह में

जिह्वा बेस्वाद रही

श्वास बेपरवाह

धूप में सारे पेड़ 

अन्त: झुलस गये !

  1. छाया

मेरा पता पूछती वह 

थक सी गई है 

साथ चलते-चलते 

धूप के अन्तिम ठिकाने पर 

हेरती है मचान 

मुझसे अलग होने के दुख में 

उसका सुख शामिल  है।

छाया समस्त भारों से मुक्त होते हुए भी 

कर्ज के बोझ से दबी सहयात्री है 

  1. प्लेटफार्म पर रात

एक ट्रेन छूटती है 

और छोड़ जाती है कई सवाल 

प्लेटफार्म  पर 

यह समय सवालों के बोझ से दबा जा रहा 

जवाबों की नींद बहुत लंबी है

इस बीच 

खोमचे वाला चुन लेता है 

बिखरी हुई मूंगफलियां 

कुछ साए सहेज लेते हैं अपने लिबास

प्लेटफार्म की रात को  

जल्दी नहीं होती बीतने की

रौशनी बहुत है

पर अंधेरा कम नहीं होता

हर सीटी खत्म करती है 

एक इंतजार 

धीरे-धीरे ऊंघने  लगते हैं 

सभी सवाल निरूत्तर से !!!

  1. शुभअशुभ

गर्म तवे पर पानी के छींटे मत डालना

बहुत अशुभ होता है

बेटी ध्यान रखना

मत झुलाना पैरों को 

ड्योढ़ी पर मत बैठना

अपशकुन होता है

कनिष्ठ अंगुली को निवाले से बाहर मत रखना

चढ़ी आंच पर नमक ,चीनी का अंदाज़ ना लेना 

उन खास दिनों में मत छूना अंचार के कनस्तर

देवता -पित्तर भी मत करना

लहरों की मौज का वो अल्हड़पन 

बचपन बीतने से पहले बीत गया

जवानी माथे पर खींचती रही लकीर 

ताउम्र इन निर्देशों की 

सीने पर दुपट्टे संभालने से पहले सीख गई वो बेटियाँ 

शुभ-अशुभ के सारे संकेत!

सरापती आ रहीं यमराज को ,जीभ में काँटे गड़ा

कि चौड़ी रहे छाती घर के पुरुषों की

 इन्हीं दिनों मजबूत हुई घर की दीवारें

जिसके उस पार हरी घास का खुला मैदान था

बरसों बाद मिलीं ये बेटियाँ छुट्टियों में 

जो अशुभ परछाइयों की दिशाएं बदलती रहीं 

वही दाग दी गई दुर्भाग्य की टेमी से

चौके की मिट्टी कुरेदती दिन बिता रहीं ।

 कितनी कुलच्छनी थीं वे बेटियाँ 

जिन्होंने फांग ली शुभ -अशुभ की दीवारें 

 हरी घास पर लोटती ,नदियाँ, पहाड़ लांघती

अब हंस रही हैं अशुभ के कैनवस पर

 शुभ की कूचियाँ फिरातीं

रच रहीं नया दृश्य – परिदृश्य !

  1. हूँ कि नहीं?

खुले आसमान के नीचे भी यूँ लगा

कि कैद हूँ देह की चौखट में 

जैसे  ‘जू’ का सबसे छोटा पिंजरा

और सामने

 पैने दांतों वाले बाघ की दहाड़ 

‘ जिराफ  ’ की तनी  गर्दन 

‘हाथियों के लंबे  सूंढ़ –

ये सब चंपक के  साथी 

कब बदले 

मेरी स्मृति के सबसे पूर्ववर्ती अध्याय हैं ।

कभी यूँ भी  लगता है

किसी श्मशान की आती–जाती सांस 

भर गई है मेरे सीने में 

हज़ारो मुर्दों  के बीच गूंगी- सी पुकार

 दिशाओं में गूँज जाती है

मेरी चेतना में अचानक

हो उठते हैं जीवित हजारों देवी -देवता

जिनके मंत्रों में मेरी कामनाओं के कोई बीज नहीं थे।

हर चौखट से लौटती है स्त्री अपने भीतर

रचती हुई अपनी अलग दुनिया 

देवता -पित्तर, काल -मुहूर्त से बाहर कर दी गई 

पवित्र-अपवित्र की परिभाषा के शुद्धिकरण से

 पिंजर में देह

 सांसें  श्मशान में 

इनमें से किसका   होना

अस्तित्व  है?

इन दोनों को जोड़ने में 

मै रोज़ होती हूँ विभाजित 

अधिक  !

  1. दक्षिण दिशा

जिस दिशा में गमन करती हैं आत्माएँ 

 श्वास के आरोह-अवरोह से खलल पड़ती उनकी निद्रा में

तीनों दिशाओं ने मंत्रणा कर

जात बाहर कर दिया इस दिशा को 

हमारी पुरखिनें

जो झेलती रही ताउम्र लांछन, उपेक्षा 

उन्हें भी दया नहीं आई

दक्षिण दिशा पर 

कभी नहीं दिया अर्घ्य उस ओर

नहीं उठे प्रार्थना के कोई हाथ !

आजी अपनी कहानियों में 

भयभीत रहती थी उन स्त्रियों से

और हमें आँचल में छिपा कर हिदायत देती

-“उस दिशा की ओर मुख कर खाने वाली

डायनें हुआ करती हैं ।”

मैंने ताउम्र अंधेरे का सूत्र पकड़

उस स्त्री को तलाशा

जिसकी छाती भी कभी दूध से भींगी होगी !

मैं सबसे छिपकर सोऊंगी एक रात इस दिशा में 

मरकर नहीं, जीते जी !

शायद एक इंच भर भी 

हटा सकूँ अपने हृदय पर पड़े सवाल के पत्थर को

कई सदियों का बोझ है इसकी छाती पर

इस दिशा की तमाम गलियां 

 मृतकों की देह से भर गई है

कोई सांस भर फूंक दें

कि जी उठे दक्षिण दिशा!

  1. देर रात

अनमने दिन की पीठ पर चलते हुए 

लौटते हो थककर छाँव की तलाश लिए

तब भी कागज पर घिसा हुआ सा मेरा कुछ 

तुम्हारी कान की ओर अपलक निहारता है

-“देखना तो, कैसा लिखा है?”

घडी की सूई भी जब हो रही हैं एकमेक

तब भी अपने वितान में उलझा मेरा मन

गर्दन के स्पर्श को झटक देता है

कमरे के उजास में बेआवाज़ बिखर जाते तरंगित स्पर्श 

सर्द से जड़ हो जाते कामनाओं के दूत

मेरे व्यस्ततम क्षणों में उबासी के लिए जगह है 

थकान और नींद के लिए भी

अपराध -बोध का यह बोझ

दिन – ब – दिन मेरे कंधे के दर्द को बढ़ाता है

जब तुम याद दिलाते हो

कि मैं भूल गई हूँ प्रेम करना शायद !

मैंने कई रोज़ से झाँका नहीं आँखों की खिड़की से

भरा नहीं हथेलियों में तुम्हारा चेहरा

इतनी बार तो प्रेमी भी रास्ता बदल लेते हैं 

प्रेमिका की चौखट से लौटकर 

हृदय के सांकल में उलझी ऊँगलियां

देर तक रहती प्रतीक्षारत उधेड़बुन में 

इसलिए कि देह की उपस्थिति 

हाथ बढाने की दूरी भर है

और प्यास के बहुत करीब है सोते का मीठा जल

कोई जल्दी नहीं रहती प्रेमालापों की 

इस आश्वस्ति में महीनों बीत जाते हैं

नहीं लिखती स्त्रियाँ पतियों पर कविताएँ 

इस बात को याद रखकर भी मैं लिख रही

कि उनके नायक सदैव प्रेमी ही रहे 

प्रेम – कहानियों से गुमशुदा होते ये पात्र

ताउम्र खलनायक होते रहे दर्ज़ 

फिर भी !

  1. छूटी हुई चीजें

प्रसव वेदना में जननी का सुख दीप्त है

रुदन में आदि मनुष्य का हास्य

एक स्वर 

जो क्षितिज के पार हो मद्धम स्वर में 

गाने लगते जीवन के गीत

साँझ की नर्तकियां 

दिया – बाती का मेल कराती ओठों से बुदबुदाती हैं मंत्र 

मन के सूने प्रकोष्ठों में 

अपरिचित – सी आहट से कांपती  है देह

खोल देती है वर्षो से बंधी गाँठ को

आओ प्रेयस! 

कि गुलाल का कोई मौसम लाने से आता है

कि दीप जलाने से ही दीवाली आती है ।

        

  1. खोया हुआ प्रेम

गोधूली बेला की चादर तले 

छत की वो मुंडेर 

जिसपर दो किशोरों के श्वास अब भी उलझे हुए हैं 

प्रेमी चले गये ,छोड़ गए प्रेम 

राग -विराग के अनचीन्हे क्षण 

देह स्मृतियों का स्मारक है 

जिनमें प्रेम की आवाजाही प्राण फूंकती है

किसी यात्रा के, किसी मोड़ पर 

भटके हुए यात्री-सा

यदि तुम प्रेम की पीठ पर स्पष्टीकरण लिख रहे हो 

तो बंद कर देना पिछला दरवाज़ा 

 चुंबन धरते आँखें नहीं मुंदी बेपरवाह 

तो कलपने दो होठों के उतप्त गुप्तचरों को

 क्षितिज के छोर पर नृत्य करती चाहनाएं

संभाले रखती हैं सिर पर अधूरी इच्छाओं का कलश

ताउम्र!

  1. अंधेरा समय

 

दृश्य के अदृश्य होने के लिए

अंधेरे का होना ज़रूरी नहीं 

कहीं भी कभी भी आपकी आखों के सामने अंधेरा छा सकता है।

हो सकता है आप कोई स्वपन देख रहे हों 

या सुख की इबारत लिख रहे हों 

तभी किसी अनचाहे अतिथि की तरह 

आ जाएगी ऐसी खबर

कि आपके सीने की चाप तीव्र हो जाएगी

नसों का खून ठंडा हो जाएगा

और आप यकीन नहीं कर पाएंगे

कि मनुष्य प्रजाति की पैदाइश हैं आप

जिसे पशुओं से केवल इसलिए अलग माना गया

कि आपके पास शब्दों की भाषा है

आपकी आखों के सामने अंधेरा छाएगा इसलिए 

कि आपकी भाषा वाली जुबान 

किसी मनुष्य ने ही काट दी है

तमाम आदर्शों से कूच कर जाएँगे देवता

कि देवी की प्रतिमा पूजी जाएगी

और स्त्री की तोड़ दी जाएगी

सुबह की उजास किरणों के पीछे का छिपा हुआ सच

अंधेरे के आवरण में लिपटा 

आप पर पूरी तरह छा जाएगा

और आप रात-दिन उस अंधेरे में ढूंढते रहेंगे

अपना अस्तित्व 

दिल्ली,  हाथरस, बलरामपुर ,गया  गिनते रहेंगे

 ऊँगलियों पर

आकड़ों की लम्बी लिस्ट अंधेरे में गुम होती जाएगी।

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नताशा 

जन्म –  22 जुलाई , सुपौल बिहार

शिक्षा – एम. ए .हिन्दी साहित्य, (पटना वि.वि.)

             बी.एड. (राँची कॉलेज, राँची), पत्रकारिता, (एन.ओ.यू), संगीत शिक्षण।

कविता संग्रह– ‘बचा रहे सब’ (2020)

पटना से निकलने वाली लघु पत्रिका  ‘चेतांशी’ तथा ‘वातायन प्रभात’ में क्रमशः रिपोर्टर और समन्वय संपादक के कार्य का अनुभव । पटना दूरदर्शन में  ‘साहित्यिकी’ कार्यक्रम का संचालन । 2013 से बिहार सरकार के अन्तर्गत विद्यालय में अध्यापन एवं स्वतंत्र लेखन ।

प्रकाशन – प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में कविताएं, आलेख,समीक्षाएं प्रकाशित  कई पत्रिका विशेषांकों में कविताएँ संकलित ।

दूरदर्शन तथा आकाशवाणी से निरंतर रचनाएं प्रसारित              

पुरस्कार एवं सम्मान – भारतीय भाषा परिषद् युवा कविता पुरस्कार (कोलकाता) फणीश्वर नाथ रेणु पुरस्कार (पटना विवि) वुमन एचीवर्स अवार्ड्स 2018 साहित्य में ।

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1 Response

  1. Devesh says:

    बहुत ही सुंदर कविताएं है। बधाई स्वीकार करें।

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