पल्लवी मुखर्जी की कविताएं

  1. प्रेम

उसने सिर्फ़

उसकी आँखों को देखा था

जिसमें वह

हँसती हुई

दूर तक नदी बनती जा रही थी

वह

लौटना नहीं चाहती थी

जैसे लौट जाता है बादल

बिना बरसे

वह 

बहना चाहती थी

बहते-बहते

किसी तट पर

रुकने की मंशा नहीं थी उसकी

वह

बन रही थी तितली धीरे-धीरे

चिड़िया भी

उसने सीखा उड़ना और

पूरे आकाश को नापना

उसने देखा

चाँद को

उसके पूरे वजूद में

उसने देखा

चाँदनी में झिलमिलाते पत्तों को

उसने देखा

झील में नाचते चाँद को

जिसकी थिरकन से वह

डोलती जा रही थी

पर इन दिनों

बेजार  हो रही थी वह

पता नहीं 

उन आँखों में

कहाँ से

उग आये थे

कई तरह के शैवाल

जिन्हें काटने का औजार

नहीं था उसके पास

  1. प्रेम करते हो मुझसे

तुमने

लोहे को पढ़ा

और मैंने

अमलतास को

देखती हूँ

कितनी आसानी से

लोहा तुम्हें

और तुम,

लोहे की भाषा

पढ़ लेते हो

जबकि मैं

अबूझ

अपढ़ होती हूँ

इस मामले में

तुम्हारे हाथ में

कभी छैनी

कभी हथौड़ा

कभी कोई कील

दीवार पर ठुकने को

तैयार होती हैं

तुम्हारे बक्से में

इन सब औजारों का

एक जखीरा है

किंतु प्रेम पत्र के लिए

कोई जगह नहीं है

पर एक छोटी सुई भी

मिल सकती है

सुई बहुत ज़रूरी होती है न

जीवन के लिए

ताज्जुब है

लोहे से कितना

प्रेम है तुम्हें

आकाश से क्यूं नहीं?

फिर भी तुम

प्रेम करते हो मुझसे

बहुत प्रेम

  1. तुम्हारे आँखों की नदी

इन दिनों स्त्री

प्रेम में है

जब वह

पास बहती नदी को

छूना चाहती है

अंजुरी से

पानी लेकर

उछाल देना चाहती है

ऊपर

बहुत ऊपर

कुछ बूंदें

उसके चेहरे को

भिगो देंगी 

ज़ाहिर है

न्यूटन ने भी

यही कहा था

यही तो

चाहती है स्त्री

पर तुमने

थमा दिया 

उसके हाथों

एक औजार 

सदियों से

ताकि तुम साँस ले सको

ले सको

अपने हिस्से की नींद

स्त्री के

शरीर से

जब पसीना फूंटता है

तब तुम

बेवजह उलझे रहते हो

ताज्जुब है

स्त्री जब

हो जाती है 

दूर तुमसे

तुम्हारी आँखों में

एक नदी क्यों होती है?

  1. स्त्री और मन

एक स्त्री के भीतर

एक मन होता है

हरियर सा

सुग्गे की तरह

जिसे तुम

खरोंचते रहते हो

हरा रंग

धीरे-धीरे

बदल जाता है पीले रंग में

किसी पत्ते की तरह

पत्ता टूटकर

शाख से कब अलग हो जाता है

स्त्री नहीं जान पाती

स्त्री की आंखों में

कुछ अधपके से

बाल उलझ जाते है

स्त्री सुलझाती हैं उन बालों को

अंत तक

  1. वजूद

इन दिनों

अंधेरों ने भी

सीख लिया है देखना

अपने भीतर की

आँखों से

वह उन

तमाम पगडंडियों से

गुजरना जानता है

जिनसे गुजरकर

सूरज की एक किरण

उस तक पहुंचती है

वह अपने भीतर की

सभी खिड़कियों को

खोल देना चाहता है

ताकि सूरज

फैल सके

अपने पूरे वजूद में

———–

पल्लवी मुखर्जी

जन्म-रामानुजगंज अंबिकापुर(सरगुजा)

शिक्षा-स्नातक

प्रकाशन-कई पत्रिकाओं, वेब मैगजीन में रचनाएं प्रकाशित

संपर्क

मकान नंबर 88

जे.पी विहार

मंगला बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

495002

मो.न.-9131139652

4 Responses

  1. वेद प्रकाश says:

    अच्छी कविता के लिए बधाई, प्रेम एक शाश्वत एवं जादू की तरह असर करता है, लेकिन जब हम प्रेम के व्यवहार में होते हैं, तब हम दुनियावी नहीं रह जाते ,हम यह खुले मन से कही सकते हैं कि हम हवा में ओस के जैसे हैं भी और नहीं भी, शेष बाद में

  2. Prashant says:

    नारी मन को प्रतिबिंबित करती मार्मिक और शक्त कविताएँ … व्यंजना में अनूठी भी …🌿🍀🌷

  3. Anonymous says:

    बहुत सुन्दर

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