पारुल तोमर की कविताएं

  1. देवी नहीं बनना है मुझे

एक आग्रहपूर्ण आमंत्रण

और नौ दिन का उत्सव आंनद

आम्रपत्र, जलकलश

मौली और आलता से सजा

लाल कपड़े से लिपटा नारियल

दसवें दिन भेंट चढ़ जाता है

रीति और परंपराओं के नाम पर

गुलाब की सूखी पँखुरियों से

बिखर जाते हैं सारे स्वप्न और आशाएँ

साकार होने का अर्थ बेमानी रह जाता है

सुनो हे धरती पुत्र

देवी मत बनाओ मुझे

माँ, बेटी, बहन,पत्नी और प्रेयसी रहने दो

देवी पूजन और विसर्जन के लिए होती है

देवी घर में हमेशा कौन रखता है भला ?

  1. उसने कहा

उसने कहा

फूलों सी खिलो

वह हँसी बन खनक गई

खुशबू सी उड़ो

वह कन-कन में महक गई

धूप सी निखरो

वह लच्छी-लच्छी बिखर गई

बदरी सी बरसो

वह तृप्ति बनकर छिड़क गई

गीत-संगीत सी गूँजो

वह वीणा के तारों में सँवर गई

वह कहता रहा

वह हर रूप रंग में ढलती गई

वह तितली, चिड़िया,नदी नहीं थी

वह शायद एक लड़की थी ।

  1. हम साँवली सी लड़कियाँ

धूप हैं छाँव हैं

आँधी और बयार हैं

खुशबुओं का त्योहार हैं

हम साँवली सी लड़कियाँ

शक्ति हैं भक्ति हैं

संस्कृति और संस्कार हैं

वेद ऋचाओं की गुंजार हैं

हम साँवली सी लड़कियाँ

मुखर हैं शाँत हैं

श्रृंगार और संहार हैं

तलवारों की टंकार हैं

हम साँवली सी लड़कियाँ

आदि हैं अंत हैं

सृजक और संहार हैं

जीवन स्तंभ आधार हैं

हम साँवली सी लड़कियाँ

माँ हैं बेटी हैं

वात्सल्य और प्यार हैं

रिश्तों की सूत्रधार हैं

हम साँवली सी लड़कियाँ

हास हैं उल्लास हैं

तकरार हैं मनुहार हैं

श्रद्धा-विश्वास का सार हैं

हम साँवली सी लड़कियाँ

संघर्ष हैं समर्पण हैं

अभिमान हैं अधिकार हैं

ध्वजों की जय-जयकार है

हम साँवली सी लड़कियाँ

  1. पुनर्जन्म

प्रत्येक दिन

उदीषा,जिजीविषा और

अस्मिता के लिए युद्ध करते हुए

विवशताओं के चक्रव्यूहों

से जूझती हूँ मैं

अनचाही मृत्यु से पराजित होकर

लुटाकर अपनी खुशबुएँ और

कोमल पखुंरियाँ

फूल से बीज बनती हूँ मैं

फोड़कर धरती का कठोर आवरण

भूख ,दुख और पराजय को

जीतने का विश्वास मन में लिये

कभी गीतों में , कभी गज़लों में

कभी कोख में, कभी फसलों मैं

नई मधुरता और मृदुलता से

हर रोज पुनर्जन्म लेती हूँ मैं ।

  1. मूक हलधर

नहीं जानती कि

इतिहास के पन्नों में दर्ज

वह पहला किसान कौन था

जिसने मौसम के क्रूर प्रहार

और धारदार सूखे की मार से

अपने बंजर खेत की दरारों में

बीज बो कर,अंकुर उगाने की

नाकाम कोशिश करते हुए

श्यामल एक घटा की चाह में

कर ली थी आत्महत्या…!

लेकिन मैं जानती हूँ

खेतों की विकल गूँजती चीखों

का  वह मूक हलधर दर्शक

अभावों में पलकर

भूख प्यास से जलकर

मेहनत और सब्र के फल को

चखने की आस लिए

असंख्य किरदारों को निभाता हुआ

जरूर किसी न किसी का

पुत्र,भाई,पति,पिता और मित्र रहा होगा।

  1. नदी खुश रहती है

उत्तुंग शिखर से उतरकर

उछलती, कूदती, बलखाती

नदी बहुत चंचल लगती थी

वृक्षों की जड़ों को छूकर

पत्थरों से टकराकर

नन्हीं-नन्हीं बूँदों में

उत्साह से छलकती

अपनी नई-नई राह बनाती

कभी-कभी क्रांतिकारी सी लगती

नदी बहुत खुश रहती थी

एक दिन झरने ने उसे टोका

कि तुम अब बड़ी हो गई हो

बचपना छोड़ दो

नदी थोड़ी सी मायूस हुई और

उसने छोड़ दिया पर्वतों पर उछलना

पत्थरों से अलमस्त टकराना

यूँ ही बेवजह वृक्षों से उलझना

अब तन्वंगी नदी बहने लगी थी

छोड़कर प्रिय स्वाधीन प्रवाह

एक पात्र में बंधे दो किनारों में

अपनी स्वतंत्रता को पहना दिया

दायित्वों का एक दायरा

वह अब भी खुश रहती थी

समर्पण और स्नेह से भरी

दायित्वों को पूरा करते बहती रहती

बर्फ से सागर की लहरों तक

मैदानों में , खेतों में, खलिहानों में

प्रार्थनाओं के अनेक सिक्के गोद में लिए

अपने कल्याणकारी प्रवाह से

हर अतृप्त को तृप्त करती

सृजन की सृजक बनकर

जनमानस का कल्याण करती

नदी अब भी खुश रहती थी

किनारे कभी नहीं समझ पाए

कोई दायरों में और पराधीनता में

कैसे खुश रह सकता है

वे अपने अस्तित्व को लेकर आज भी

अकुलाए हैं स्तब्ध हैं

कि हमारी पहचान नदी से है

या नदी हमसे है

नदी पूर्ण हुई थी किनारों में

स्त्रीत्व की सार्थकता जान

जीवन पा गई थी जन कल्याणों में

नदी अब और भी खुश रहने लगी थी ।

  1. मेरे गाँव में

साँझ ढले

चारा लेकर लौटती

बैलगाड़ी में भरे होते हैं

ढेर सारे मेहनतकशी सपने

जो घटते दिन के साथ

और भी बढ़ जाते हैं

मेरे गाँव में

चुलबुली सुनहरे

बालों वाली हरी पीली

गेंहूँ, धान की अल्हड़ बालियाँ

विश्वप्रेमिका कहलाती हैं

मुरझाये चेहरों की

खुशी बन जाती हैं

मेरे गाँव में।

पगडंडियों पर

सँवर जाते हैं मौसम

पेड़ों की घनी छाँव तले

धूप की भीनी खुशबू में भीगी

दबे पाँव उतरती है

जब स्मृतियाँ

मेरे गाँव में

कच्चे मन की

सोंधी सोंधी मिट्टी में

फूटने लगते हैं अँकुर

बीते समय की थाप से

सुगबुगाने लगते हैं

ठंडे पड़े अलाव

मेरे गाँव में

  1. पंख

लेमनचूस चूसती

छोटी लड़की ने दादी की बांह पर

लटकते हुए पूछा

“दादी बताओ न

ये चिड़िया कैसे उड़ती है”

दादी ने लाड़ से

लड़की का सिर सहलाते हुए कहा

” चिड़ियों के पंख होते हैं न

बेटा”

दादी मुझे भी पंख दो न

मुझे भी उड़ना है

एक ऊँची उड़ान भरकर

आसमान छूना है

अमरूद के पेड़ पर बैठकर

अमरूद कुतरना है.

हवा के साथ गीत गाते हुए

नदी के ऊपर गुजरना है

पहाड़ों की सैर करते

बादलों को छूना है

बाजरे की कलगी से

मीठा दाना लाना है।

लेमनचूस के तरल एहसास में बहती

लड़की ने मचलते हुए

सब कह डाला एक ही साँस में ।

दादी सोच में पड़ गई थी

कैसे बताए नन्हीं सी जान को

लड़की की उन्मुक्त उड़ान

और चिड़िया की उड़ान का अंतर

चिड़िया की दुनिया लड़की की

दुनिया से बिल्कुल अलग जो होती है

चिड़िया जब चाहे, जो चाहे

बेरोक टोक, बेखौफ़

वो सब कर सकती है

जो लड़की करना चाहती है

चिड़िया के पंख

आकाश में लंबी उड़ान भरते हुए

उसके साथ होते हैं।

और लड़की के पंख तो

जन्मते ही कुतर लिए जाते हैं

बड़ी होती लड़की से छिपाकर

मिट्टी में दफना दिए जाते हैं।

सभ्यता का लबादा ओढ़े

रीतियों और बेड़ियों का

जाल बिछाकर बैठे

सफेदपोश समाज के

भूखे,शिकारी गिद्धों के डर से।

  1. स्त्रियाँ

वनपलाश-सी

जंगल और आग का रिश्ता

वे जीती रहती हैं बरसों-बरस

दूब-सी सोख लेती हैं

तपिश धधकते सूरज की,

लावे को हरियाली में

ढालने का हुनर जानती हैं वे

मौन नदी बनकर बहती रहती हैं

लहरों के नाद पर

दहकते तवे-सा सोख कर

खारापन सागर की देह का

समय की पदचाप सुनती

नित नव किरदारों में

ढलती रहती हैं रात-दिन

जीवन में अमरत्व भरती

एकान्त धुनती अपने भीतर

छुपाये रहती हैं न जाने कितने ही

कहानियों के बीज

आती-जाती साँसों के जैसी

बची रहती हैं देह के पोर-पोर में

रीत जाती है काया और बीत जाती हैं वे

प्रकाश की रेख जैसी

तार-इकतार से बजते रहते हैं

कंपन और स्पंदन में

जब वे एक ‘रात’ को

सुलाती हैं थपथपाकर

एक ‘सुबह’ को जगाती हैं

धीमे से सहलाकर

ब्रह्माण्ड-सी होती हैं

ये स्त्रियाँ।

  1. श्रमिक

 

उनकी हथेलियों में

नहीं होती हैं भाग्य-रेखाएँ

फटे हाथों के कोरे सफे पर

बनती बिगड़ती रहती हैं

सीलन भरी दरारें

मस्तक पर दहकता और

देर और दूर तक गूँजता

श्रमजल का नाद

चुप्पी साधे छालों के सन्नाटे

जीवन की जगाते हैं आस

धूप,हवा, पानी जैसे

मौसम-दर-मौसम बदलते रहते हैं

खुदरे रूखापन और नमी लिए

श्रम के सपने

दु:ख के धनत्व से गुजरती

कई बार अर्थ से बचकर रेखाएँ

मात्र चित्र बनकर रह जाती हैं

रात के अंतिम प्रहर में

प्रभात की प्रतीक्षा करते-करते

मीलों उबड़-खाबड़ रास्तों पर

नदी-सी बहती

उम्र के रासायनिक बदलावों से

दरकती रहतीं हैं हथेलियों की रेखाएँ

क्योंकि

कोई भी नहीं लिखता है उनका भाग्य

और वैसे भी भाग्य

कब और कहाँ मिलता है

यूँ ही हर किसी को

इन लकीरों में।

—————

पारुल तोमर

उत्तर प्रदेश के जनपद बिजनौर के ग्राम हिसामपुर में 12 जनवरी 1973 को कृषक परिवार में जन्म। रुहेलखंड विश्वविद्यालय, बरेली से हिन्दी साहित्य में “विद्या वाचस्पति” PhD की उपाधि से सम्मानित। उनकी चित्रकला एवम् साहित्य की खुशबू, गाँव, कस्बों से लेकर शहर की लोक परम्पराओं की याद दिलाती हैं।

सम्प्रति  : स्वतंत्र लेखन साहित्य की अधिकांश विधाओं में  एवम् चित्रकारिता !

प्रकाशन : कादम्बिनी , इन्द्रप्रस्थ भारती, आलोकपर्व ,  जनसत्ता, शब्दिता, वनिता, सागरिका, अनुगूँज, सरिता, युद्धरत आम आदमी समते विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं और चित्र प्रकाशित

कविता संग्रह : संझा-बाती ( 2019)

सम्पर्क सूत्र :parulvineet@gmail.com

34 Responses

  1. करूणा says:

    प्रकृति और मानव-जीवन को साक्षी मानकर रची गयी रचनाओं का अदभुत संग्रह। देवी नहीं बनना मुझे –स्त्री की मनोदशा को दर्शाती है ,वहीं श्रमिक का भाग्य और पुनर्जन्म आदि कम शब्दों में बहुत कुछ वयां करती हैं।

  2. Anamika says:

    नदी का मानकीकरण… बहुत सुन्दर कविता है।
    स्त्रियाँ और सांवली लड़कियाँ आदि सभी कविताएँ बेहद खूबसूरत हैं।
    बधाई और शुभकामनाएं रचनाकार को।

  3. पारुल तोमर says:

    बहुत-बहुत आभार प्रवेश सोनी जी।
    ससम्मान 💐

  4. पारुल तोमर says:

    आभार सर ।

  5. बहुत बढ़िया लिखी कविताएं…. पारुल दी को बधाई

  6. Deepali saxena says:

    बहुत सुंदर रचनायें
    वास्तविकता के करीब
    स्त्री मन के आसपास बुनी हुईं
    सभी शानदार

  7. Geeta Tripathi says:

    ह्रदयस्पर्शी कविताएं👌👌

  8. Geeta Tripathi says:

    हृदयस्पर्शी कविताएं👌👌

  9. Vikas Tomar says:

    Very nice, all poems are near to nature , so meaningful words..

  10. Vikas Tomar says:

    एक से बढ़कर एक रचनायें, यथार्थ के बेहद क़रीब , शब्दों के मोतियों से बनी सुंदर काव्यंजलि ….

  11. लक्ष्मीनारायण पयोधि says:

    बहुत सुंदर और प्रभावी कविताएँ!

  12. Anonymous says:

    बेहद खूबसूरत एवं मनमोहक सृजन।सभी कविताएं एक से बढ़कर एक।

  13. शरदेन्दु शुक्ला 'शरद',पुणे says:

    सभी कविताएं बहुत अच्छी लगी । मूक हलधर, पंख, पुनर्जन्म । प्रत्येक में कोई ना कोई संदेश अवश्य है हार्दिक बधाई आपको । अनेकानेक शुभकामनाएं ।

  14. Very emotional and heart touching words🙏🙏 🌷🌷

  15. Shraddha says:

    So beautifuland heartiest words.. Very emotional

  16. Manjusha says:

    खूबसूरत और मार्मिक कविताएं

  17. Pankaj parki says:

    वैसे तो आप एक कुशल चित्रकार भी है….लेकिन कवित्री के रूप मे आप शब्दों की जो लयबद्ध रेखायें सहज ही खिचती है….और उनमें भावों के अनेक रंग भरती है….सम्पूर्ण दृश्य मानो आँखो के सम्मुख हो…..आपकी रचनाओ मे पारम्परिक सौन्दर्य(folk) की झलक है…नोस्टाल्जिक भी है….आधुनिक सकारात्मक सोच है। ……….आप हमेशा ही सृजनात्मक रहे……आपको बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ!💐🙂

  18. Pravesh Soni says:

    मनमोहक कविताएं है ,प्रकृति चित्रण से लेकर नारी अस्मिता को खूबसूरत बयान है ।
    शब्दों के अनूठे और कसे हुए साज़ की तरह बजती है देर तक पाठक के मन में ,बधाई

    • पारुल तोमर says:

      बहुत-बहुत आभार प्रवेश सोनी जी।
      ससम्मान 💐

  19. Ramesh Pathania says:

    अनूठी ,सुंदर कवितायें ,जिन्हें बार -बार पढ़ने का मन करे .
    बहुत कम होता है जब एक साथ इतनी सुंदर दिल को छू लेने वाली कवितायें पढ़ने को मिलीं …पारूल जी को बहुत बधाई

  20. Vineet kumar says:

    कविताओं की भाषा में बहुत ही खूबसूरत प्रवाह और लय है। कविताओं की भाषा में बहुत ही खूबसूरत प्रवाह और लय है। कम ने कम से कम शब्दों में सारगर्भित बातें कहna पारुल जी की विशेषता है। कविताओं का शिल्प सौंदर्य भी सराहनीय है। 

  21. Akshit says:

    So beautiful and inspiring words.

    Lovely work. You are a role model for Young generation who wants to persue career in hindi literature .

  22. Garima Vineet Ahalawat says:

    Heart melting life realties and real life thoughts…n how beautifully ol expressions are poured into hearts…

  23. बहुत सुंदर और मनमोहक होती है आपकी कविताएँ।

  24. Sonali Tomar says:

    प्रकृति से जुड़ी अद्भुत कविताएँ ….. बहुत सुंदर और मन को छू जाती यादों से भरी …. गांव की गलियों की रौनक, स्त्रियों की मनःस्थिति, उनके भाव और जीवन , अस्तित्व की आध्यात्मिकता सब यूं सहज ही कह गयीं आपकी कविताएँ…

  25. Shanky says:

    Most beautiful…….Thomas Hardy said
    “Poetry is emotion put into measure. The emotion must come by nature, but the measure can be acquired by art.”

  26. Amber Singh says:

    सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर बहुत ही प्रभावी और भावपूर्ण कविताएँ ।

Leave a Reply

Your email address will not be published.