राज्यवर्द्धन की प्रेम कविताएं

  1. प्रेमपत्र

दुनिया की सबसे उत्कृष्ट रचना  है-

प्रेमपत्र!

धरती पर सबसे ज्यादा जीवंत रचना है-

प्रेम पत्र !

जब कोई प्रेम-पत्र रचता है

जब कोई प्रेम-पत्र पढ़ता है

लिखते -पढ़ते वक्त

तन-मन  में

अदृश्य

परमाणु महाविस्फोट सा

बहुत कुछ घटित होता है

कान सुर्ख हो जाते हैं

पार्श्व में राग बसंत बजने लगता है

मन पक्षियों की तरह मुक्त हो

धीमी-धीमी उड़ान भरने लगता है

कभी-कभी तो आंखें सजल हो जाती हैं

कबीर का पाणि भीग जाता है

प्रेम पत्र  बचा रहेगा

तो प्रेम भी बचा रहेगा

प्रेम बचा रहेगा तो

दुनिया भी बची रहेगी

दुनिया की नज़र से बचाकर

बचा रखे हैं मैंने

प्रेम -पत्र

प्रेम -पत्र दुनिया की सर्वोत्तम धरोहर है

जो  चिर युवा बनाये रखता है

क्या आपके पास भी कोई प्रेम पत्र है

  1. वसंत में तुम जब आओगी

एक चेहरा रख आया था

पार्क की बेंच पर

सोचा था-

वसंत में तुम जब आओगी

तो जी भर बतियाएंगे

चिड़ियों से कहेंगे-

संगीत सुनाने को

एवज में उसे

कोदो के कुछ दाने दे देंगे

फूलों से कहेंगे-

खिलने  को

ताकि  खुशबू की मादकता में

सराबोर हो हम नाच सके

बदले में गोबर के जैविक खाद  को

बिखेर देंगे उनकी जड़ों में

सूरज को कहेंगे-

स्फटिक सा चमके

ताकि गुनगुने मौसम का

हम ले सके जी भर आनन्द

बदले में देंगे  उसे

अंजुरी भर- भर अरघ

महुआ से कहेंगे-

टपकने को

धरती पर टपके

अमृत फल चखेंगे

बदले  में उसे

पीने को देंगे

उनके ही फलों से बने आसव को

ताकि मादकता को

और बिखेर सके

माघ के चाँद से कहेंगे

चांदनी बरसाने को

ताकि तुम्हारे जूड़े को

रात रानी के फूलों से सजा  सकूँ

बदले में भर देंगे

चाँद के दामन को भी सितारों से

जानता हूँ-

तुम जब वसन्त में आओगी

तो इंद्रधनुष उतर आयेगा  धरती पर

तुम्हारी गोद में

मेरा सिर होगा

तब स्वर्ग के लिए

कोई क्यों मरेगा!

  1. सिसकियाँ

सुन रहा हूँ

सिसकियाँ

हजार प्रकाश वर्ष दूर

अतीत की उन गलियों  से

जिस पथ

वसन्त में दो कदम

हम संग-संग चले थे

इस प्रदूषित समय में

रात-दिन कोलाहल में

अपने आकाशगंगा के

सैकड़ों  क्षुद्र ग्रहों से

नित्य टकराता हूँ

रोज खुद भी

धीरे -धीरे

रेडियोएक्टिव पदार्थ सा

न्यून होते जा रहा हूँ

ओ प्रिये!

आधी रात को जब भी सुनता हूँ

सिसकियाँ

मैं देव पुरुष होने को

बेचैन हो जाता हूँ।

  1. पता दूधिया हँसी का

नीले शहर में

बस खानाबदोश बने

तुम्हें ढूंढता रहा

मेरे पास पता था तुम्हारा

सिर्फ दूधिया हँसी  का

शहर चाँद तारे

सबसे पूछा

तुम्हारे बारे में

पर किसी ने जहमत नहीं की

बताने की

गली कूचे बाजार

सभी जगह ढूंढा

कई कई बार

पर खोज नहीं पाया तुम्हें

बैठा हूँ चौराहे पर

थक हार कि

कभी तो नज़र पड़ेगी

तुम्हारी या मेरी

पर नसीब में बदा है

इंतजार

और इंतजार

चाँद तारे शहर

सभी पुनर्नवा हो जी रहे हैं

अपने अपने अपने वर्तमान  के संग

सभी ने कहा –

हो सके तो ढूंढ लो चेहरा

नहीं तो लौट जाओ

कुछ समय गुजार कर

स्मृतियाँ  के खंडहर में

पर ध्यान रहे-

नदी का जल

कभी लौटता नहीँ वापस

अपने उद्गम में

पीछे मुड़कर देखना चाहा

उद्गम को

नहीं दिखा

क्योंकि कई -कई मोड़ मुड़ गयी थी

जिंदगी

फिर भी मैं दूधिया हँसी का पता लिए

नीले शहर में

खानाबदोश हो तुम्हें

ढूंढ  रहा था कि

शायद मिल जाओ

देखना चाहता था जो तुम्हें

जी भर कर एक बार

हो सकता है कि

तुम मिली  भी हो

उदासी की चादर ओढ़े

और मैं तुम्हें नहीं पहचान पाया

क्योंकि मेरे पास तो पता था तुम्हारी

सिर्फ दूधिया हंसी का।

  1. जीवन ज्यामिति

दो बिंदुओं के बीच है

एक रेखा

जो देखने में

सरल प्रतीत होती है

दो सरल रेखाओं के बीच

नजदीकियाँ  हैं

पर वे समानांतर हैं

तीन तिर्यक रेखाएं

आपस में

एक-दूसरे से

मिलती प्रतीत होती है

पर अनमनी सी हैं

नहीं बना पा रहे हैं

मिलकर  त्रिकोण

त्रिभुज

न तो समकोण का बना

न अधिक कोण का

न विषमकोण का

सही माप और सटीक कोण

दृष्टि का

जरुरी है

जीवन की ज्यामिति के लिए।

  1. स्मृतियां

तुम्हारे

खतों को जलाकर

भले ही

विसर्जित कर दिया हो गंगा में

स्मृतियाँ

अस्थि फूल सी

फिर भी बची रह गई

टांग दिया

जीवन से बाहर

पीपल के पेड़ पर

एक दिन मैं भी

अंतिम चिता में जलकर

अस्थि फूल बन जाऊँगा प्रिये!

——-

राज्यवर्द्धन

जन्म-30 जून 1960(जमालपुर,बिहार)

प्रकाशन

हिंदुस्तान के चर्चित पत्र पत्रिकाओं में फीचर्स,लेख,अग्रलेख,रिपोतार्ज,  समीक्षाएं व कविताएं प्रकाशित।

सम्पादन-1..’स्वर-एकादश’

(समकालीन ग्यारह कवियों के कविताओं का संग्रह) का संपादन, बोधि- प्रकाशन,जयपुर से 2013 में प्रकाशित, कविता संग्रह-कबीर अब रात में नहीं रोता ( शीघ्र प्रकाश्य)

संपर्क– एकता हाईट्स,ब्लॉक-2/11ई,56-राजा एस.सी.मल्लिक रोड,कोलकाता-700032

e-mail:rajyabardhan123@gmail.com

Mobile no. 8777806852,

8 Responses

  1. Awadhesh Prasad Singh says:

    बहुत ही मोहक कविताएं। प्रेम के कितने रंग एक साथ प्रस्फुटित हो उसे। पाठक क्षण भर के लिए विदेह हो उठता है। बड़ी प्राणवत्ता है इन कविताओं में।
    राज्यवर्धन जी को बहुत बहुत बधाई, चिरंतन प्रेम की धारा में अवगाहन करा कर मानस को पुण्य प्रसून सा खिला देने के लिए, क्योंकि प्रेम पवित्र करता है।

  2. धन्यवाद@💐

  3. राज्यवर्द्धन says:

    धन्यवाद

  4. Anonymous says:

    वाह भई वाह!

  5. Anonymous says:

    वाह भई वाह!

  6. उमर चंद जायसवाल। says:

    बहुत सुंदर। बहुत बहुत बधाई।

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