स्मिता सिन्हा की कविताएं

  1. आत्महंता

वे बड़े पारंगत थे 

बोलने में  

चुप रहने में  

हँसने में 

रोने में 

उन्होंने हमेशा 

अपने हिस्से का 

आधा सच ही कहा 

और अभ्यस्त बने रहे 

एक पूरा झूठ रचने में 

अपनी इसी तल्लीनता में 

वे अंत तक 

इस सत्य से अनजान रहे की 

उन्हीं के प्रहारों से 

धीरे धीरे टूट रहा था 

उनका दूर्भेद्य दुर्ग ॥ 

  1. वज़ह

मैंने देखा है कि 

स्वप्न की परिधि से बाहर 

अक्सर त्याज्य मानी जाती हैं 

सारी मूर्त अमूर्त वेदनाएं

उनके होने की आश्वस्ति 

और हम अपनी ही परछाइयों की पीठ पर 

ताउम्र ढूंढ़ते रह जाते हैं 

अपने जीवन का विकल्प 

यही वज़ह है कि 

मुझे कभी भी 

ज़रुरी नहीं लगा कि तुम्हें दूं 

अपने चल चुके क़दमों का हिसाब 

जो कभी समझ पाओ तो समझना कि 

क्यों लौट आती हूँ मैं तुम्हारे पास 

हमेशा खाली हाथ 

उस उदास नदी के किनारे 

अपनी हँसी को रखकर………….

  1. मुक्त

उस निर्वात में 

व्योम को 

नींद को 

सपनों को 

मुक्त रहना चाहिए 

और ऐसा अक्सर ही होता है कि 

रात को सोते समय 

मैं अपने बँधे केश 

खोल देती हूँ ……

  1. प्रेम में

हम प्रेम में होना जानते थे 

रंग बिरंगे परिंदों को 

आसमान में उड़ते देख 

देर तक हँसते थे हम 

और बेवजह किसी बात पर

महीनों लड़ भी लिया करते 

संजीदगी ऐसी कि 

बात बेबात फ़रीदा ख़ानम गुनगुना उठती थीं 

हमारी सबसे पसंदीदा नज़्म 

” आज जाने कि जिद न करो …..” 

और रह जाते कभी

आगे के सफर पर

एक-दूसरे के लिये 

अधूरे प्रेम से जीवन-प्राण लेकर

आज भी

मैं देख पा रही हूँ 

उस फूल, स्पर्श और एकांत से परे 

एक प्रेमी के सीने में धँसा हुआ एक चेहरा 

जहाँ बची है थोड़ी-सी नींद 

थोड़े से ख़्वाब 

और ढेर सारा सुकून 

मैं देख पाती हूँ

उस प्रेम को,

बेपरवाह से कहकहों में 

सुधा-चन्दर और गौरा-भुवन की बातों में 

एक-दूसरे की आदतों में 

हँसने में, रोने में 

लंबी सुनसान सड़क पर चलते हुए

पूनम की रात में

मैं देख पा रही हूँ कि 

आज एक लड़की बड़ी ख़ामोशी से पढ़ रही है 

केदारनाथ सिंह को कि 

” जीना होगा 

जैसे पानी जीता है 

जैसे पत्थर जीता है 

जीना होगा …”

  1. लो तुम्हारे मुज़रिम हाज़िर हैं…

वो जो टीस बनकर 

धँसती चली जाती हैं 

सीने के भीतर 

वो जो फांस बनकर 

अटकती चली जाती हैं 

कंठ में कहीं 

वो जो गुम होती चली जाती हैं 

महीने दस दिनों में आकर एकाएक 

कभी किसी भीड़ में तो 

कभी कहीं किसी खेत की मुंडेर पर 

कठुआ, उन्नाव, हाथरस की वो लड़कियाँ 

जो कभी हँसते हँसते दोहरी हुई जाती थीं 

आज थक चुकी हैं रोते रोते 

हो सके तो उन्हें हँसा दो जरा 

उनकी जुबान कट चुकी है 

नहीं तो वो बताती कि 

जिस भाई के साथ भरी दुपहरी में

बाग़ में आम तोड़ते थकती नहीं थी वो 

उस रोज जब होली में उसने उसकी छातियों पर हाथ मारा 

उसी पल भर में थक गयी थी वो

कैसे कहें  

होली के रंग अब तक चादरों से नहीं छूटे भैया 

उसकी टाँगे टूट चुकी 

कि कैसे जाए वो उस मंदिर तक 

जिसकी सीढ़ियों पर 

घंटों खेलती थी 

बैजू चाचा के साथ उनकी गोद में बैठकर 

एक शाम उसी चाचा ने मंदिर के पीछे वाले कमरे में

उसे जबरदस्ती धकेल चढ़ा दी थीं छिटकनी 

कैसे बताये 

कमरे के अँधेरे से अब तक डरती हूँ चाचा 

उनका दिमाग़ कुंद हो चुका अब 

कि वे कैसे समझाये आपको

कि नहीं होती हमारी कोई जात 

नहीं होता हमारा कोई देश 

हमारे देह पर होते हैं तो 

सिर्फ़ विमर्श के चोंचले 

और राजनीति का आडंबर 

कैसे समझायें आपको 

कि हमें खूब पता है 

कि हम सामाजिक इकाई की वो अस्पृश्य जमीन हैं 

जिसपर चाहे जब मर्जी हल चलाओ 

जिसे चाहे जब मर्जी बंजर कर जाओ 

कि हमें खूब पता है 

कि हम जन्म से ही अन्त्यज होती हैं 

कि वे अब तक मुँह बाये देख रहीं 

हमको तुमको 

सुन रहीं अपने होने नहीं होने का, 

अपने जीने अपने मरने का हिसाब 

कि वे अब तक सहेज रहीं 

कालखंड के मोड़ों पर बिखरे 

अपने तमाम असबाबों को 

अपनी टूटी गर्दन और पैरों को 

अपनी खींची गयी जुबानों को 

अपनी मसली गयी छातियों को 

अपनी क्षत विक्षत योनियों को 

वे अब तक कर रहीं इंतज़ार

कि जाने कब आ जाये उनके पक्ष में आवाज़ 

कि लो तुम्हारे मुज़रिम हाज़िर हैं !!  

——–

स्मिता सिन्हा

विभिन्न मीडिया हाउस के साथ 15 से ज्यादा वर्षों का कार्यानुभव ,

एम बी ए फेकल्टी के तौर पर विश्वविद्यालय स्तर पर कार्यानुभव ,

‘नया ज्ञानोदय ‘, ‘ पूर्वग्रह ‘, ‘कथादेश ‘, वागर्थ , ‘इन्द्रप्रस्थ भारती ‘,पाखी , ‘ कथाक्रम , जनपथ ,  ‘ मुक्तांचल ‘,’लोकोदय ‘ ,बनास जन ‘ इत्यादि पत्रिकाओं में प्रकाशित 

कविता कोष पर भी रचनायें उपलब्ध 

जानकीपुल ,शब्दांकन जैसे तमाम प्रतिष्ठित ब्लॉग पर भी कवितायें आ चुकी हैं ।

Mail id – smitaminni3012@gmail.com

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