हताश लोगों के साथ खड़ा कवि विमलेश त्रिपाठी

शहंशाह आलम

कवि परिचय

विमलेश त्रिपाठी

परिचय : विमलेश त्रिपाठी

बक्सर, बिहार के एक गाँव हरनाथपुर में जन्म। प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही। प्रेसिडेंसी कॉलेज से स्नातकोत्तर, बीएड। कलकत्ता विश्वविद्यालय से केदारनाथ सिंह की कविताओं पर पी-एच.डी। देश की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, समीक्षा, लेख आदि का प्रकाशन। कविता और कहानी का अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद। तीन अख़बारों में ‘गुमनाम लेखक की डायरी’, ‘बात बोलेगी’ और ‘बक़लम ख़ुद’ नाम से नियमित स्तंभ-लेखन। साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था 'नीलांबर कोलकाता' के वर्तमान अध्यक्ष। पिछले आठ-नौ वर्षों से 'अनहद कोलकाता' ब्लॉग का संचालन एवं संपादन।

पुस्तकें

  • हम बचे रहेंगे, कविता-संग्रह, नयी किताब
  • एक देश और मरे हुए लोग, कविता-संग्रह, बोधि प्रकाशन
  • उजली मुस्कुराहटों के बीच, प्रेम कविताएँ, ज्योतिपर्व प्रकाशन
  • कन्धे पर कविता, कविता-संग्रह, वाणी प्रकाशन
  • अधूरे अंत की शुरुआत, कहानी-संग्रह, भारतीय ज्ञानपीठ
  • कैनवास पर प्रेम, उपन्यास, भारतीय ज्ञानपीठ
  • आमरा बेचे थाकबो, कविताओं का बंग्ला अनुवाद, छोंआ प्रकाशन
  • वी विल विद्स्टैंड, कविताओं का अंग्रेज़ी अनुवाद, अथरप्रेस
  • यह मेरा दूसरा जन्म है, शीघ्र प्रकाश्य कविता-संग्रह
  • हमन हैं इश्क मस्ताना, शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास

सम्मान

भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार, 2010

ठाकुर पूरण सिंह स्मृति सूत्र सम्मान, 2011

भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार, 2014

राजीव गांधी एक्सिलेंट अवार्ड, 2011

2004-5 के 'वागर्थ' पत्रिका के नवलेखन अंक की कहानियां राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित।

चर्चित कहानी 'अधूरे अंत की शुरुआत' पर 'पंडित प्रभुनाथ' के नाम से लघु फ़िल्म का निर्माण।

उपन्यास 'कैनवास पर प्रेम' चीन के गुआंगडॉंग यूनिवर्सिटी के स्नातकोत्तर के पाठ्यक्रम में शामिल।

गुआंगडॉंग यूनिवर्सिटी, चीन में ही 'बहनें' कविता स्नातक के पाठ्यक्रम में शामिल।

देश के विभिन्न शहरों  में कहानी एवं कविता-पाठ।

कोलकाता में रहनवारी।

परमाणु ऊर्जा विभाग की एक यूनिट में  कार्यरत।

संपर्क : साहा इंस्टिट्यूट ऑफ़ न्यूक्लियर फ़िजिक्स,

1/ए.एफ़., विधान नगर, कोलकाता-700 064

ब्लॉग : http://anahadkolkata. blogspot.com

ईमेल : starbhojpuribimlesh@ gmail.com

मोबाइल : 09088751215

          शब्दों से मसले हल करने वाले बहरूपिए समय में

          मैं तुम्हें शब्दों में प्यार नहीं करूँगा

          नीम अँधेरे में डूबे कमरे के रोशन छिद्र से

          नहीं भेजूँगा वह ख़त

          जिस पर अंकित होगा पान के आकार का एक दिल

          और एक वाक्य में

          समाए होंगे सभ्यता के तमाम फ़लसफ़े

          कि मैं तुम्हें प्यार करता हूँ

          मैं खड़ा रहूँगा अनंत प्रकाशवर्षों की यात्रा में

          वहीं उसी खिड़की के समीप

          जहाँ से तुम्हारी स्याह ज़ुल्फ़ों के मेघ दिखते हैं

          हवा के साथ तैरते-चलते

          चुप और बेआवाज़

          नहीं भेजूँगा हवा में लहराता कोई चुंबन

          किसी अकेले पेड़ से

          पालतू ख़रगोश के नरम रोओं से

          या आईने से भी नहीं कहूँगा

          कि कर रहा हूँ मैं सभ्यता का सबसे पवित्र

          और सबसे ख़तरनाक कर्म। 

                                               - विमलेश त्रिपाठी

आज अपने आसपास देखते हैं तो यही महसूस होता है कि ज़्यादातर लोगों का जीवन हमें कितना निराश करता है। यह निराशा आ कहाँ से रही है? क्या जो जीवन से निराश दिखाई देते हैं, वे सचमुच अपने जीवन से निराश होते हैं, बड़ा सवाल यही है। इस बड़े सवाल का जवाब यह है कि नहीं, एक निराश आदमी अपने जीवन से दरअसल निराश नहीं रहता बल्कि एक निराश आदमी अपनी असुरक्षा, अपने निहत्थेपन, अपनी रोज़मर्रा की चिंता से निराश रहता है। जीवन तो सबको प्रिय है। जीवन से निराश आदमी को भी अपना जीवन उतना ही प्रिय है जितना कि आपको। तब एक बड़ा सवाल यह भी आकार लेता है कि जब आदमी जीवन से इतना प्यार करता है तो एक आदमी उसी जीवन से निराश क्यों हो जाता है? इस निराशा के पीछे कौन-सी बुरी शक्ति काम करती है? मेरे ख़्याल से इसका जवाब यही है कि यह बुरी शक्ति और कोई नहीं, हमारी असुरक्षा, हमारा निहत्थापन, हमारी चिंता है। और यह कितना घिनौना है कि हम अपने पूरे जीवन से निराश होकर अपने जीवन पर हिंसा करने लगते हैं। वह भी हिंसा ऐसी कि हम अपना जीवन तक समाप्त करने का फ़ैसला तक ले लेते हैं। इसीलिए तो हमारे आजू-बाजू से आत्महत्याओं की ख़बरें अकसर आती रहती हैं। आजू-बाजू से आपसी तनाव की ख़बरें आती रहती हैं। भाई भाई को पीट डालता है। और भी ना जाने कितनी अप्रिय ख़बरें रोज़ आती हैं। ऐसी व्यथा, ऐसी उदासी, ऐसी हिंसा के लिए दोषी कौन है? ज़ाहिर है, एक निराश व्यक्ति इसके लिए दोषी सिद्ध नहीं होता। ऐसा होने के पीछे दोषी आज की घिनौनी राजनीति है। राजनीति की ऊँची कुर्सी पर जो लदा है, वो अपने जीवन के किसी हिस्से-क़िस्से से निराश क्या दिखाई देता है? कोई दिखाई नहीं देता। क्या सत्ता के बड़े पद पर बैठा कोई सत्ताधीश आपको अपने जीवन के साथ हिंसा करता पाया गया है तो इसका जवाब भी ना में है। इसलिए कि आम जनता को निराशा में धकेलकर वे ख़ुश रहना सीख गए हैं। इसलिए कि राजनीति का कोई व्यक्ति किसी कांड में जेल जाता है तो वह ख़ुद के जेल जाने को उत्सव की तरह घोषित करता है। जेल से बाहर आ रहा होता है तो उत्सव मना रहा होता है। जो सत्ता में है, वह अपने को सारे ऐश्वर्य का मालिक घोषित किए बैठा है। ठाठ वाली ज़िंदगी जी रहा है। सत्ता में रह रहा हर ईश्वर हमारे देश की हर चीज़ मुफ़्त में पा रहा है, खाने-पीने, कपड़े-लत्ते, सैर-सपाटे से लेकर सारी अय्याशियाँ तक। निराश हमीं हैं इसलिए कि हम जनता जो ठहरे, वह भी निहत्थी, असुरक्षित और वंचित। लेकिन इस देश में एक ऐसा आदमी भी है, जो अपनी निराशा को छोड़कर आदमियों के जीवन में ख़ुशियाँ लाना चाहता है। ज़ाहिर है, वह आदमी और कोई नहीं एक कवि ही है। मेरे ख़्याल से विमलेश त्रिपाठी उन कवियों की ज़ात और जमात के हैं, जो निराश व्यक्तियों के साथ खड़े दिखाई देते हैं :

          उदास मत हो मेरे भाई

          तुम्हारी उदासी मेरी कविता की पराजय है

          नहीं है मेरे पास तुम्हारे लिए ज़मीन का कोई टुकड़ा

          जहाँ उग सकें तुम्हारे मासूम सपने

          ना कोई आकाश

          जहाँ रोटी की नई और निजी परिभाषा तुम लिख सको

          अब वह समय भी नहीं

          कि दुनियादारी से दूर हम निकल जायें

          ख़रगोशों का पीछा करते गंगा की कछार तक

          लौटें तो माँ के आँचल में ढेर हो जाएँ

          क्या तुम्हें उन शब्दों की स्मृति कचोटती है

          जिसे बोया था हमने घर की खोंड़ में

          हफ़्तों की थी रखवाली

          किया था टोना-टोटका उसे बचाने को बुरी नज़रों से

          यह जो उठ जाते हो

          आधी-आधी रात किसी दुःस्वप्न की छाया से

          पसीने-पसीने होकर

          क्या तुम्हें बहुत याद आता है पिता का वह कवच

          जिसमें हमारा साथ सुरक्षित था

          तुम्हें कैसे समझाऊँ मेरे सहोदर

          कि मेरी उदासियों में

          कितने धीमे-धीमे शामिल हो रहे हो तुम

          यह तुम्हारी नहीं मेरे भाई

          यह मेरी कविता में चलते-फिरते

          सदियों के एक आदमी की उदासी है

          उदास मत हो मेरे अनुज

          मेरे फटे झोले में बचे हैं आज भी कुछ शब्द

          जो इस निर्मम समय में

          तुम्हारे हाथ थामने को तैयार हैं

          और कुछ तो नहीं

          जो मैं दे सकता हूँ

          बस मैं तुम्हें दे रहा हूँ एक शब्द

          एक आख़िरी उम्मीद की तरह।

     यह एक कठोर सच्चाई है कि आज़ादी की हीरक-जयंती की ओर बढ़ रहे अपने देश की जनता आज भी दक्ष और निपुण नहीं हो पाई है। तभी विमलेश को यह कहना पड़ता है, 'लिखता जो शब्द, वही मेरे चेहरे पर एक दाग़ की तरह बैठ जाता।' क्या कवि बुड़बक क़िस्म का जीव हुआ करता है कि कवि को ऐसा बयान देना होता है। नहीं मेरे भाई, आज हर सच्चे आदमी की और हर सच्चे कवि की हालत ऐसी ही है। वह बुराई के ख़िलाफ़, वह झूठ के ख़िलाफ़, वह सत्ता के प्रपंच के ख़िलाफ़ सच कहता है, सच लिखता है और माँ-बहन की गालियाँ सुनता है। और सच्चे आदमी, सच्चे कवि को गालियाँ दे कौन रहा है, कोई ऐरा-गैरा आदमी नहीं बल्कि सत्ता की सोने-चाँदी वाली दीवारों से चिपका और सोने-चाँदी की ही थालियों में रोज़ छप्पनभोग लगवा-लगवाकर खा रहा व्यक्ति गालियाँ दे रहा है कि जो कोई इस भारत महादेश का प्रगतिशील-जनवादी, मार्क्सवादी-वामपंथी आदमी है, वह अपनी माँ अथवा अपने बाप को नहीं पहचानता। क्या इस तरह का बयान एक ज़िंदा देश की पहचान है? मैं यहाँ ऐसा लिखकर यह कहने की ज़ुर्रत क़तई नहीं कर सकता कि मेरा देश मर रहा है। मैं यह ज़रूर कहने की ज़ुर्रत करना चाहूँगा कि मेरे देश की राजनीति ज़रूर मर गई है। तभी विमलेश यह भी कहने को विवश होते हैं, 'इस कठिन समय में, बोलना और लिखना, सबसे दुष्कर होता जाता है मेरे लिए।' यह मरे हुए लोगों का देश है। मगर इन मरे हुओं में मुझे सिर्फ़ आज की राजनीति से जुड़े लोग दिखाई देते हैं। पक्ष कोई हो… सत्ता पक्ष अथवा विपक्ष, सब अपनी रोटी सेकने में भिड़े हैं। और हमको एक-दूसरे से भिड़ाने में। यह रोटी पक भी रही है ज़ोरदार तरीक़े से। तभी विमलेश यह भी कहने का दुस्साहस कर पाते हैं, 'एक शब्द साझा करने में, करनी पड़तीं सदियों की यात्राएँ।' सच्चाई यही है कि अब बोलना, लिखना, माटी से जुड़ना कितना दुष्कर होता जा रहा है। कोई सच कहेगा, वह मारा जाएगा। कोई प्रेम करेगा, वह मारा जाएगा। कोई पड़ोसी की मदद करेगा, वह मारा जाएगा। यह मारे जाने का खेल देश का मदारी कितनी कुशलता से हमें दिखा रहा और डरा भी रहा। देश के मदारी की छाती सबसे चौड़ी होती जा रही है और हमारी डर से, भय से, ख़ौफ़ से कितनी चपटी। यह विमलेश भी समझते हैं, 'हे भंते, मैं पूरे होशो-हवास में, और ख़ुशी-ख़ुशी, मूर्खता का वरण कर रहा हूँ।' विमलेश जो लिखते हैं, सुध-बुध से लिखते हैं। कवि को मालूम है, अपनी सुध-बुध एक कवि जिस दिन खो गया तो समझो सच की मृत्यु हो गई, 'तुमने ही जना, और तुम्हारे भीतर ही ढूँढ़ता मैं जवाब, उन प्रश्नों के, जिन्हें हज़ारों वर्ष की सभ्यता ने, लाद दिया है मेरी पीठ पर।'

     विमलेश अपनी हर कविता में वहाँ तक अपने शब्दों के माध्यम से पहुँचना चाहते हैं, जहाँ तक बहुत सारे कवि पहुँच नहीं पाते यानी थककर बैठ जाते हैं। ऊँघ जो उन्हें घेर लेती है। उन कवियों की थकान उनकी देह वाली थकान नहीं होती, भाषा वाली थकान होती है। विमलेश त्रिपाठी का कमाल यही है कि वे अपनी भाषा को थकने नहीं देते। डा. नामवर सिंह भी विमलेश को लेकर स्वीकारते हैं, 'यह बहुत जागरूक और प्रबुद्ध कवि हैं। भाषा को लेकर अतिरिक्त सजगता है इस कवि में और यह सत्य है कि सबसे पहली लड़ाई एक कवि को अपनी भाषा से ही करनी होती है। यह कवि अपनी भाषिक सरोकार के ज़रिए अच्छी कविताएँ लिखने में सफल हुआ है।' मैं भी इस बात का समर्थन करता हूँ कि विमलेश के पास अच्छी भाषा है, तभी वे अपने शब्दों को मोमबत्ती और मशाल और आग बनाते रहते हैं, करोड़ों लोगों की असहाय चीख़ों को संबल देने के लिए, 'पागल आदमी की चिट्ठी में, देश की जनता की जगह भेड़, और सरकार की जगह गड़ेरिया लिखा होता है।' हालाँकि इस कविता को मैं लिखता तो 'गड़ेरिया' की जगह 'भेड़िया' लिखता। विमलेश ने 'गड़ेरिया' लिखा, तब भी भाव स्पष्ट है। अब जिस देश की जनता भेड़ बन जाए तो आप अंदाज़ा लगाइए कि इस जनता रूपी भेड़ को हाँकने वाला गड़ेरिया रूपी देश का प्रधान कितना ख़तरनाक होगा। यह सही है, तभी देश की जनता रोटी पाने के लिए घिघया रही है और देश का प्रधान है कि अपने हर भाषण में बकता चला आ रहा है कि मैं तुमको रोटी नहीं, एक भव्य प्रार्थना-स्थल छीनकर दूँगा। मैं तुमको रोटी नहीं, तुम्हारे पड़ोसी की बोटी दूँगा। अब इस छीना-झपटी में मज़ा आप सबको भी ख़ूब आने लगा है और असँख्य सभ्य कहलाने वाले आप अपने प्रधान के कहे पर रोटी-रोज़ी की माँग छोड़कर अपने पड़ोसी की बोटी तक नोच दे रहे हैं। काहे भय्या, हमसे ऐसी घृणा काहे। उससे घृणा काहे नहीं, जो दो सौ गायों को गौशाला में मौत के हवाले कर देता है। ऐसी घटना पर आप लिहाफ़ में दुबक जाते हैं और भय्या, कोई जब पाव भर गोश्त ले जाता पकड़ा जाता है, तो आप लिहाफ़ से झट बाहर निकल आते हैं उस पकड़ लिए गए की हत्या का वीडियो बनाने। भय्या, सच यही है कि उस मारे गए की औक़ात पाव भर गोश्त ख़रीदने से ज़्यादा की हो कहाँ पाई कभी। और आपकी भी औक़ात किसी को भी पकड़कर मार देने से ज़्यादा की कहाँ हो पाई इस बेहद आधुनिक समय में। विमलेश यही तो समझाना-सीखाना चाहते हैं कि हमारा तो जनम-मरण का साथ है। शासक का क्या है, उसका तो आना-जाना लगा रहता है। हम शासकों के कहने से अपनी एका काहे भुलाए जाते हैं। मगर कवि की बिरादरी एक ज़िद्दी बिरादरी होती है, इस एका को बचाने की ज़िद से बाज़ नहीं आती। अपने विमलेश यही करते हैं, शासक के नफ़रत फैलाने वाले उसके चम्मचों से बिना ख़ौफ़ खाए कह डालते हैं, 'तुम सबको ईद मुबारक मेरे दोस्तो, छूट गए एक समय में, तुमने मुझे कभी अकेला नहीं होने दिया, तुम्हें भी अली शेर, तुम्हें भी जेशोफ़, और तुम्हें भी नैमुद्दीन।'

     विमलेश हमारे कविता-समय के ऐसे कवियों में मेरे ख़्याल से हैं, जो अपनी कविता में ऐसी तासीर छोड़ देते हैं कि आप उनकी कविता से मुँह फेरकर निकल जा नहीं सकते। विमलेश जितने सहज, सरल, मिलनसार हैं, उनकी कविता भी उतनी ही और उसी ख़ुलूस से हमको गले लगाती है। इस तरह की कविता हमेशा कविता की दुनिया में इज़्ज़त पाती है। यह इज़हार मैं खुलकर करना चाहूँगा कि समकालीन हिंदी कविता को विमलेश जैसे कवियों की सख़्त ज़रूरत है। विमलेश जैसे कवि शासन और शासक की चतुराई को सार्वजनिक करने में हिचकते नहीं। ऐसा करना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि देश और दुनिया की आम जनता हमेशा शासन और शासक की उपेक्षा भी, दमन भी, शोषण भी अपनी पूरी देह पर झेलती आई है। ऐसे शासन और शासक के ख़िलाफ़ मुद्दतों से चली आ रही लड़ाई के लड़ाकों में विमलेश भी शामिल हैं :

          नहीं

          कविता नहीं

          दुःख लिखूँगा

          प्यार नहीं

          बिछोह लिखूँगा

         

          सुबह नहीं

          रात लिखूँगा

          दोस्त नहीं

          मुद्दई लिखूँगा

          लिख लूँगा यह सब

          तो बहुत साफ़-साफ़

          ख़ूब हरा और लहलह करता

          गिरवी पड़ा

          गैंडा खेत लिखूँगा

          और

          सबसे

          अंत में

          लिखूँगा सरकार

          और लिखकर

          उस पर कालिख पोत दूँगा

          फिर शांति नहीं

          युद्ध लिखूँगा

          और

          अपनी क़लम की नोक

          तोड़ दूँगा

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