प्रमोद बेड़िया की कविता ‘आदतों के साथ’

आदतों के साथ

पुराने घर में कई आदतें पड़ी हैं
जिन्हें जगह की जगह पड़े
रहने नहीं दिया वहाँ के लोगों ने
जब मैं नहा कर बाहर लगे
आईने के फ़्रेम पर रखी
कंघी टटोल रहा था तो
ख़ाली जगह हाथ आई
उसे लेकर मैं क्या करता
मेरी आदतों से इसे हठाने
के षड़यंत्र में कौन- कौन
शामिल थे !

एक पुरानी किताब पड़ी थी
बिस्तर के बग़ल वाली टेबल पर
पता नहीं क्या था उसमें सालों से
पढ़ी भी थी कभी या नहीं
लेकिन जब कभी भी उलटता था
तो लगता था कि इसमें से
कारू का ख़ज़ाना निकल आएगा
वह पड़ी थी उपेक्षित- सी एक
ख़ाली गिलास के बग़ल में
जैसे वह किताब नहीं कोई प्लेट है
जिस पर ये लोग नाश्ता करते रहें हों
मुझे फिर लगा जैसे ये मेरी
आदतों से परेशान हैं
उसे फेंक देना चाहतें हैं
किसी पुरानी रुमाल – सा
फिर मुझे षड़यंत्र की बू आने लगी !

अब देखिए न ,उसी किताब के आसपास
एक तिनका था ,जो इमर्जेंसी एम्बुलेंस की
तरह था कि दाँत में कुछ फँसा  रह ही जाए
लेकिन वह भी और आदतों की तरह ही
फेंक दिया गया था ,एक नक़ली घोंसला था
जिसमें दो नक़ली चिड़िया थी
वे तो लगा जैसे घोंसले के साथ ही
उड़ गई हो मेरी आदतों की तरह !

जगहों के अनुपात बदल गए थे
जैसे जहाँ रुकना होता वहाँ मुड़ जाता था
जहाँ मुड़ना होता था ,वहाँ चल पड़ता
जहाँ चलना था वहाँ बैठने लगता ,कई बार
ठोकर लगते हुए बची ,लेकिन घुटनों में दर्द बढ़ गया
लगा और भी कहीं दर्द बढ़ गया था
मृत्यु के पूर्व यह जानना कि मृत्यु के बाद
क्या होगा , वेदनादायक तो होता ही है ।

मैं जानता था कि कोई भी भीमसेन जोशी
को पसंद नहीं करते थे ,न ही मेंहंदी हसन को
लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं
कि उनकी सारी सीडियां गर्द की भेंट कर दी
जाए यह कह कर कि अब कोई
सीडी में सुनता है क्या इतनी सुविधाओं
के होते हुए ,मेरी इच्छा हुई कि सर के बाल
नोंच लूँ मैं  ,कहीं चला जाऊँ ,कहीं भी
जहाँ मैं अपनी आदतों के साथ जी सकूँ !

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