प्रमोद बेड़िया की कहानी ‘किनारे-किनारे दरिया, किश्ती बांधो जी**’

मैंने उससे कहा – ये तुम्हारा नाम आर्या नहीं भी तो हो सकता था ।
साथ चलते- चलते वह रुक गई । रूकी हुई वह ज़्यादा ख़ूबसूरत लग रही । मैंने सोचा उससे यह बात पूछूँ कि हर लड़की ही क्या रुकने पर ज़्यादा ख़ूबसूरत लगती है ” फिर सोचा एक सवाल ही ठीक है ।
वह बोली – तो क्या हो सकता था !
इसके लिए मैं तैयार नहीं था ,मुझे तो बस लगा कि आर्या नाम ज़्यादा कुलीन वग़ैरह लगता है तो कह दिया ,यों मुझे कुछ कहने को सूझ भी नहीं रहा था ,लड़कियों से कैसे बात करनी चाहिए ये पता नहीं था । बोला – नहीं जरा सरल क़िस्म का ,जैसे राधा ,सीता वैगरह ।
वह बोली – तुम जैसा चाहो बुला लो !
लगा वह प्रेम करने लगी है मुझे । अभी कल ही तो मिली थी । हमारे रास्ते आने- जाने के एक ही थे सो ऐसे ही थोड़ी- सी हँसी ,फिर एकाध बातें और आज साथ- साथ चल रहे थे ।
 मैंने कहा – हमलोग कुछ देर पार्क में बैठें ?
हम पार्क के बग़ल से गुजर रहे थे ,वह बिना कुछ कहे उस तरफ घूम गई ,तो मैंने सोचा कई काम बिना कुछ कहे भी हो सकते हैं । पार्क में कम लोग थे ,हमलोग एक पेड़ के नीचे गोल चक्कर पर बैठ गए ।
मैंने बैठने के बाद ग़ौर किया कि उसकी उम्र भी पार- सी हो रही है ,जैसे मेरी । उसकी एक हथेली उल्टी चबूतरे पर पड़ी थी ,वह उम्र के लिहाज़ से जवान थी । मेरी इच्छा हो रही थी कि उसे जरा- सा ही सही छू लूँ ,यह भी लगता था कि उसने इसलिए ही रखा है ऐसे ।
फिर तुरंत ही अपने ख़्याल पर हँसी आई ,कि पूछा तो है नही कुछ ,जाना तो है नहीं कुछ ,लेकिन लगता था कि ज़रूरत नहीं है जानने ,पूछने की । उसे भी ऐसा ही लगता है क्या ! लगता ही होगा ,वरना नज़रों के सभ्य इशारों और एक रास्ते ही तो कारण थे न ,यहाँ तक पहुँचने के ।
तुम कुछ कहते क्यों नहीं – वह बोली
कह रहा हूँ न – मैं बोला
कहाँ !- वह बोली
सोचा कैसे, क्या कहूँ !
मैंने कहा – तुम भी तो कह सकती हो !
वह- मैं ही तो कह रही हूँ !
यह भी ठीक कह रही है ,कह तो यही रह रही है ।
वह- अच्छा चलो मैं ही कहती हूँ । देखो मैं शादीशुदा हूँ ,पति छोटी- सी नौकरी करते हैं ,,दो बच्चे हैं , बस !
मैंने सोचा मैं भी बता दूँ ,कि वह बोली – और तुम !
मैं भी शादीशुदा ही हूँ ,बच्चे नहीं है ,मतलब पैदा नहीं किए – लगा यहाँ तक नहीं पहुँचना चाहिए था ।
वह बोली – ठीक किए ,आजकल चला पाना मुश्किल  होता है !
लगा मुझे कुछ ज्यादा कहना चाहिए , सो बोला – हाँ यह बात भी है ,वैसे तुम और क्या करती हो ,जैसे नौकरी ,रसोई वग़ैरह के अलावा !
तुम्हारे साथ बैठना और कुछ नहीं है क्या !- वह हँसी ।
बहुत ही ख़ूबसूरत थी ,उसकी हँसी ,जैसे पूरी झड़ पड़ेगी ,मैंने अपनी हथेली सामने कर दी ।
यह क्या कर रहे हो – वह कुछ घबड़ा कर बोली !
नहीं , मैंने सोचा हाथ में जमा कर लूँ  !
क्या ! – वह बोली
तुम्हारी हँसी ,बोलना चाहता था ,लेकिन कहा नहीं ! वह सहम- सी गई ,तो मैंने कहा – इतनी खूबसूरत हँसी भी होती है क्या !
धत्त- वह बोली – तो भी क्या कर  रहे  थे !
जमा करना चाहता था !
क्या ?
तुम्हारी हँसी !
वह खड़ी होने लगी ,तो मैं बोला- क्या हुआ ,अभी तो बैठे ही थे ।
टेढ़े में ही वह बोली- तो काम नहीं है क्या !
मुझे लगा कि हँसी जमा करने की बात पर या तो वह घबरा गई है ,या उसे पसंद नहीं आई , तो कहा- ठीक है नहीं बोलूँगा !
वह बैठती हुई बोली- नहीं बोलने में क्या है बोल लो ,लगा कि बोलने से ही खुश रहेगी ,क्योंकि उसकी हँसी और भी खूबसूरत लगने लगी ।मैं चाह रहा था वह कह नहीं पा रहा था ,मुझे लगा कि एक दिन में यह ठीक नहीं होगा !
कर ली जमा !- वह बोली
क्या !
तुम कह रहे थे न हँसी !
मैं मुस्कुराया तो उसने अपनी नरम गुदाज गोरी हथेली मेरे सामने कर दी ,बोली- मैं भी जमा कर लूँ !
हम दोनों हँसें तो लगा इस दृश्य का अंत इससे अच्छा नहीं हो सकता है ! अचानक- से हम साथ- साथ उठे और जैसे अपने को समेटने लगे !
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संध्या जब बग़ल में लेटी तो वह मुझे उतनी ही अच्छी लग रही थी ,लगा अगर यह भी आर्या की तरह किसी दूसरे मर्द से बात करे तो वह भी उसकी हँसी जमा करने लगेगा !मैंने से कहा- एकबार हँसो न !
धत्त- उसने आर्या की तरह कहा ,हँसी भी तो लगा कि और भी खूबसूरत हँसी है उसकी ! मैंने  उसे अपनी और खींचा तो वह नदी- सी चली आई और मुझमें मिलने लगी ! वह इतनी तल्लीनता से प्यार करती थी कि डूबना लाज़िमी था !
 वह खुद भी भूल जाती थी और मुझे भी भुला देती थी ,वह सिर्फ देह नहीं होता – जैसे पूरा संसार होता ,जैसे –  भूल जाता हूँ मैं दुनिया जहाँ के अफ़साने !
सुबह वह मेरे पास बैठी थी ,नाश्ते की टेबल पर ,उसकी हथेली ,उलटी पड़ी थी ,ठीक आर्या की तरह ,मैं देख रहा था ,उसने ग़ौर किया ,बोली- ये क्या देखे जा रहे हो !
तुम्हारी हथेली !
पहले देखी नहीं क्या !
नहीं, उसके ही जैसी लगती है – यह मुँह से निकलने ही वाला था कि बात बदल दी। कहा – नहीं आज ,यूं ही इच्छा हो गई !
उसने अपनी हथेली मेरी तरफ बढ़ाई ,तो मैंने उसे चूम लिया !
यह भी अजीब- सी बात है कि एक दूसरी औरत जो मेरी ज़िंदगी में आ सकती है ,मेरा प्यार बढ़ा रही है ! मुझे मन ही मन आर्या की याद आने लगी । 
क्या सोच रहे हो – संध्या ने कहा ।
नहीं ,यूँ ही ,सोच रहा था कि कोई दूसरी औरत तुम्हारे जैसे प्यार करेगी  या नहीं !
धत्त !- वह बोली 
मैंने सोचा कि यह शब्द तो दोनों एक ही तरह कहती है ,तो प्यार भी एक ही तरह करती होगी !
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ठीक सोचा था ,एक ही तरह करती है ! अभी उस दिन हमलोग फिर मिले ,हमारे अॉफिस से लगभग एक ही समय निकलते तो कम से कम मुस्कुराते ,फिर बात करते- करते पार्क में जाते ,अभी तक दोनों ही नहीं खुल पाए थे ,हालाँकि पहुँचना चाहते थे वहाँ ,जहाँ मुक़ाम है ! उस दिन उसने कहा – किसी रेस्त्रां में चलते !
कुछ खाना है !- मैंने पूछा !
तुम्हें – उसने कहा ,लेकिन मैं बुरी तरह चौंक गया ,ऐसा पटाखे- सा जवाब वह देगी मुझे उम्मीद नहीं थी ! मैंने उसकी हथेली पर हाथ रखा तो उसने हठा लिया ,बोली – सड़क पर नहीं – जो खुद ही अपने आप आमंत्रण था !
शहर के उदास रेस्त्रां में हम पहुँचे ,जिसमें सुविधा यह थी कि रोशनी का इंतज़ाम इतना ही था कि आप ,जिसके साथ हैं ,टकराए वग़ैर आगे बढ़ सकते हैं ! बेयरे ने हमें एक केबिन में पहुँचा दिया जिसमें हम दोनो थे । 
क्या ऑर्डर दें !- मैं बोला !
जो तुम चाहो – वह बोली !  , बेयरे को एक छोटा- सा ऑर्डर दिया ,ताकि ,पहले और दूसरे के बीच में कुछ वक़्फा मिलें !
मैंने उसके हाथों को ,बेयरे के बाहर जाते ही पकड़ा और मुझे लगा कि वह मुझको पूरा छूना चाहती है ,मुझमें आ जाना चाहती है ! कुछ दिनों की मुलाक़ात के बाद यह आश्चर्यजनक लगा ,मैं झुक गया ,उसने मेरे सर पर होंठ रखे और आगे झुक कर अपनी छातियों से मुझको छुआ रही हो जैसे ! मैं सावधान था कि बेयरा कभी भी आ सकता है ,जिसे मैं समझा नहीं पाऊँगा कि यह पवित्र और अद्भुत प्रेम है और उसकी छिछोरी हँसी का सामना करना मुश्किल होगा ! वह भी समझ गई ,हमलोग एक दूसरे को अतृप्त नज़रों के तृप्त इंतज़ार से देख रहे थे !
मैं सोच रहा था कि क्या ऐसी चीज हो सकती है कि उम्र की इस ढलान पर ऐसे अनुभव हों ,हालाँकि जो था पका हुआ ,ज़िम्मेदार और लबालब ! उसने कहा – क्या सोच रहे हो !
देखो आर्या, कल मैंने महसूस किया कि मैं अपनी पत्नी संध्या से अतृप्त नहीं हूँ ,फिर भी तुम मुझे तृप्त करती हो ,तुम्हारी ज़रूरत लगती है ,यह एक अजीब- सा अनुभव है !
मुझे भी- आर्या बोली-  विजय ,मेरे पति से कोई शिकायत तो नहीं है ,आजतक नहीं हुई ,हम परस्पर विश्वासी हैं ,ज़रूरतमंद हैं ,लेकिन मेरे साथ भी ,ऐसा ही हुआ । पहले क़रीब महीने भर पहले सबसे पहले देखा तो ऐसा नहीं लगा था ,लेकिन फिर तुम बैठते गए ,मुझमें !
इस दौरान उस मद्धिम रोशनी में मैंने देखा कि आर्या कोई बहुत खूबसूरत महिलाओं में नहीं रखी जा सकती ,लेकिन ,उसमें एक ऐसी दहक थी ,महक थी ,जैसे शाख़ पर अभी- अभी खिला  कोई फूल है !
बेयरा हमारा ऑर्डर टेबल पर रख गया था ,उसके जाने के बाद मैंने कहा – शुरु करो ! देर हो जाएगी !
आर्या बोली- देर होने  पर संध्या पूछती भी है !
विजय नहीं पूछता है क्या !- मैं बोला – इस तरह उन दोनों को पराया कर हम नज़दीक  होते जा रहे थे ! सेंडविच कुतरते हुए वह मेरी तरफ देख रही थी और मैं उसकी तरफ ,फिर वह उठ कर मेरी तरफ बैठ गई और पर्दे की तरफ देखते हुए मुझसे लिपट गई ,मैं क्या कर सकता था ,हम चूम रहे थे ,उसकी छातियां मेरे सीने से गले लग चुकी थी ,फिर मैंने उसे परे हटाया ,कहा- चलो, अपनी जगह पर बैठो !
एक बार आलिंगन और चुंबन से कितनी ताक़त आ गई थी ,वह हार गई ,उठ कर उधर बैठ गई और चुप ,उदास- सी खाने लगी !
मैंने उसे कहा कि देखो यह बहुत ही बचकाना तरीक़ा है ,नए- नए लोग जवानी में इश्क़ करते हैं ,वे ऐसी हरकतें करतें हैं ,यह अच्छा नहीं लगता !
तो तुम भी तो शामिल हो इसमें ,मुझे क्या सीख दे रहे  हो – वह बोली ।
मैं इंकार नहीं कर रहा हूँ ,अच्छे लगने की बात कर रहा हूँ – मैं बोला !
हाँ ,मैं तो मज़ाक़ कर रही थी ,ठीक तो नहीं है ,इस उम्र में और संबंधों में !
मैं सोच रहा था प्रेम कच्चा ही होता है ,और एक कच्ची ज़मीन पर इसका पौधा उगता है सो हमेशा काँपता रहता है ,पौधे की तरह ।
रात गहरा रही थी ,शाम के बाद का समय था ,मैंने कहा – चलें ,देर हो रही है ,तुम्हे भी ।
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कभी- कभी का यह कार्यक्रम हमारी छोटे-मोटी ‘जरूरतों’ को पूरा करता रहा । एक दिन उसने कहा कि हमलोग एकाध दिनों के लिए बाहर जा सकते थे !
कैसे- मैं बोला 
कोई बहाना – झिझकते हुए बोली – जैसे ऑफ़िस का काम ,या कुछ ऐसा !
हालाँकि मुझे आजकल लगता था कि मैं संध्या से और भी प्यार करने लगा था । उसने कई बार ऐसा कहा था – क्या बात है ,आजकल ,आशिक हो रहे हो !
ऐसा भी नहीं था कि उस वक़्त मुझे आर्या की याद आती हो ,लेकिन मेरे मन में संध्या का अक्स मारक हो गया था । यह गणित जैसा कई हिसाब हो सकता है !
उसने पूछा- क्या सोचने लगे !
मैंने बताया ,तो बोली – ठीक कहते हो ,मुझे विजय अच्छा तो लगता ही था ,और अच्छा लगने लगा ,वह पूछता है ,कभी- कभी ।
तब फिर- मैं बोला – ये हमलोगों का मिलना क्यों हुआ ,अगर। ज़रूरत नहीं थी ।
ज़रूरत थी- वह बोली- ज़रूरत रहती है ,शायद पुराने पर कुछ नयापन आ जाता है !
अंतत: एक बार हमारा कार्यक्रम बन गया – ठीक फ़िल्मी अंदाज में ,दोनों ने ऑफ़िस के काम का बहाना बनाया ,शक की गुंजाइश नहीं थी ,और हमलोग किसी दूर के अंजान शहर में पहुँच गए ,मंझला- सा होटल किया और पहली बार खुल कर मिले ।पता नहीं आदमी की कैसी यह सिम्त है कि नया पुरुष और नयी स्त्री होने से उम्र के किसी भी पड़ाव पर कुछ अद्भुत मिलने की अनुभूति होती है – हमें भी हुई । ज्यादा दिन रहना तो संभव नहीं था ,पोल खुल सकती थी ,साथ ही यह भी लग रहा था कि इस हो रहे को ज्यादा ढोना भी संभव नहीं था । यह भी नहीं था कि दिन भर ,रात भर हम एक दूसरे को मादक नज़रों से देखते हुए लिपट गए और ………. एक वयस्क ,पूर्णतया वयस्क मोहब्बत थी ,जिसमें शरीर एक सुविधा- सी था ,बाकि तलाश कुछ और था और उसे ही खोजते रहे , जैसे ।
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लौटते समय ,तृप्त- तृप्त थे ,आर्या भरीपूरी और उज्ज्वल- सी लग रही थी – जैसे सुहाग रात मना कर लौटने पर लड़कियाँ लगती है । मुझे अच्छा लग रहा था कि किसी के तृप्त होने का मैं बहाना बना ,कहीं एक अपराध भावना भी थी कि यह इतना सरल नहीं था ,कहीं संध्या भी तो किसी और से प्यार करते हुए ही मुझे इतना प्यार करती हो ,कहीं विजय भी किसी और से प्यार करते हुए आर्या से खूब मोहब्बत करतें हों – नहीं- नहीं ,यह मेरे मन का चोर बोल रहा है – मैंने सोचा !
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अपने शहर में हम अलग- अलग उतरे ,जैसे बहुत- से लोग उतरतें हैं और अलग- अलग ही अपने घरों की तरफ चले ।
घर पहुँचने पर संध्या हमेशा की तरह बोली – काम कर आए !
मुझे द्विअर्थी लगा यह वाक्य ,जो मेरे मन का पाप था ,बोला- हाँ ,तुम्हारी ठीक गुज़री ?
वह बोली- धत्त, और मेरी पीठ की तरफ से मुझसे लिपट कर सट गई और लगा कि इन दिनों की बेचैनी लिपटी हुई है ,मैंने उसका मजा लेते हुए हर तरफ से आश्वस्त होते हुए सोचा कि आज से घर लौटने का रास्ता बदल लूँगा,  जिसमें आर्या नहीं आती है ,वैसे ही मैं भी उसके रास्ते में नहीं रहूँगा ! हम दोनों ने जो धरोहर पा ली है उसे सहेजने के लिए हमारे तहख़ाने हैं ,जिसमें हम जब चाहे जा- आ सकते हैं । आर्या के पास भी तहख़ाना होगा ही ,वह भी सहेज रही होगी ।
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** कुमार गंधर्व की बंदिश 

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1 Response

  1. ANAND VIKRAM TRIPATHI says:

    BAHUT ACHHI KAHANI

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