प्रसून परिमल की दो कविताएं

प्रेम-कहानी का एक ‘ पाठक ‘ हूँ…

पता है, मुझे प्रेम कहानियाँ पढ़नी
अच्छी लगती है..बहुत अच्छी लगती है
मैं पढ़ना चाहता हूँ एक-एक प्रेम-कहानी..एक-एक-की प्रेम-कहानी..हर्फ़- हर्फ़..शब्द-शब्द
मैं दुनिया की सारी प्रेम कहानियाँ पढ़ना चाहता हूँ
सच..तुम्हारी भी ..तुम्हारी भी..और तुम्हारी भी…
मैं हर प्रेमी-ह्रदय की संजो-संजो रखी बेशक़ीमती
अक्षय अनुभूतियों का क़तरा -क़तरा पढ़ना चाहता हूँ …जीना चाहता हूँ..महसूस करना चाहता हूँ…
मैं तुम्हारी मौन तन्हाई की तिजौरी में बंद पुस्तक का पन्ना-पन्ना पढ़ना चाहता हूँ…

ना – मानो..पर मैं चाहता हूँ पढ़ना वो कहानियाँ… जो हैं..जो रहीं हैं हमेशा से..अनकही–सी…भटकती-सी..तड़पती-सी..यहाँ-वहाँ.. इधर-उधर
मैं हर बेचैन तड़पती कहानी के गुमसुम ओस-कणों को
अपनी हथेलियों पर रख पढ़ना चाहता हूँ..तुम्हारी क़सम…उनमें डूबना चाहता हूँ..

ज़रा देखो न..सितारों भरी ये निस्तब्ध काली रात
टिमटिमाता-सा..धड़कता-सा आकाश…
माफ़ करना…मैं प्रेमाकाश की हर ‘ नन्हीं ‘ धड़कन.. बस आँखें बंद कर सुनना चाहता हूँ..महसूसने की हद तक महसूस करना चाहता हूँ…

अरे सितारों…ये क्या किया…अपने किस पन्ने को ‘ यूँ ‘ मचोड़ तिरछे अँधेरों में फेंक दिया…मत भूलो ,मैं प्रेम का कथाकार नहीं ,एक पाठक हूँ..मोमबत्तियों की लौ में ‘ आहुत ‘ तुम्हारे सारे प्रेम-पत्रों की राख से लिखी गई तुम्हारी ‘ अ-समाप्त ‘ कहानी का ‘ भस्म-भस्म ‘ पढ़ना चाहता हूँ…गंगा की लहरों में प्रवाहित तुम्हारे ‘ एक ज़िन्दगी बराबर ख़त ‘ को समंदर के
‘ अतल ‘ से निकाल अपने सामने लाना चाहता हूँ…सितारों भर लायक़ धूप में उन्हें पुनः सुखा रख लेना चाहता हूँ…मैं तुम्हारा सब पढ़ना चाहता हूँ..समझते क्यूँ नहीं..मैं ‘ तुम्हें ‘ पढ़ना चाहता हूँ..

तुम न जानो..पर मैं पाठक हूँ न..मुझे पता है कि ये आकाश में टिमटिमाते सितारे नहीं ,हर शख़्स की प्रेम कहानियाँ हैं..नम-सी झिलमिल करती ..तो कभी मासूम मुस्कुराहट वाली टिमटिम करती…
इक बात कहूँ मेरे मित्र ,यार मेरे
मैं ‘ झिल और मिल ‘ के बीच के सम्पूर्ण अंतराल को
मैं ‘ टिम और टिम ‘ के बीच के मुक़म्मल कालखण्ड को ..पढ़ना चाहता हूँ…
मैं तुम्हारी ‘असाधारण ‘ प्रेम -कहानी का एक बेहद साधारण पर सबसे अंतिम पाठक हूँ…बस , तुम्हारा
‘ सब ‘ पढ़ना चाहता हूँ …सssssब…..!!

तुमने विद्रोह क्यों किया?

मैं जानना चाहता हूँ
तुमने विद्रोह क्यूँ किया..
कितने आराम से थे तुम..एक सितारा
अपने सितारों की बस्तियों में
चमकते लटकते-झटकते सितारों के बीच
स्वप्निल रातों का उनींदा मदमस्त संगीत सुनते
लेटे.. अधलेटे..पर
अनायास तुम उठे..पूरी लहक के साथ
भभक उठे..
क्षण भर को सही…
तुम्हारी फ़ैलती बिखरती ‘ विदग्धता ‘ पर
टिक गई सारी क़ायनात की नज़रें…
मेरे भाई…!
..दोस्त मेरे!
बचपन से देखा होगा तुम्हें भी किसी ने…
तुम्हारे नन्हें- नन्हें हाथ-पाँव का
आकाश के बिछौने पर
फ़ेंक-फ़ेंक कर पटक-पटक कर खेलना…
टिमटिम-टिमटिम-सी होती होंगी तुम्हारे भी छोटे-छोटे हाथों की पटकन..बिलकुल अन्य मासूम सितारों की तरह..हँसता-सा..खेलता-सा..
पर तुम्हारी मासूम मुस्कराहट की चमक
पहले धवल ,फिर उज्ज्वल फिर कब प्रज्ज्वलित हो विदग्ध होने लगी ,अफ़सोस..किसी को पता न चला…
बतलाओ मुझे ..बतलाओ मेरे भाई
अपनी रौशनी के भीतर हर रोज़ ‘ टिम- टिम भर ‘
..’टप-टप भर ‘अवसादों की कालिमा
तुम कैसे जमा करते रहे…हमने तो
सितारों की रौशनी ही आज तलक़ देखी है
और तुमने.. स्वयं सितारा हो ‘ रात का अँधेरा ‘ देखा..!!..ओह !!
इक बात कहूँ मित्र !! तुम सितारों की वैभवशाली दुनिया ने ‘ यावत जीवेत सुखं जीवेत ‘ के ऐश्वर्य को भोग- भोग ‘ चार्वाक के अधूरे दर्शन ‘ को पूर्णतः बदनाम कर दिया..
पर हैरत है कि तूम भी तो वहीं थे न..वहीं तो था तुम्हारा जन्म…यौवन..
पर ऐश्वर्य की उकताहट ने तुम्हें
‘ चार्वाक को पूर्णतः ‘ समझा दिया ..और तुमने जान लिया पूरा चार्वाक–“भष्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनम् कुतः..”..सच ,भष्म देह का पुनः आगमन नहीं होता..
और तुमने अर्थ दे दिया ‘ ख़ुद ‘ को ,’ चार्वाक ‘ को..
आकाश की कालिमा के विरुद्ध अपनी ताप से उठ खड़े हुए तुम…
और ‘ ख़ुद ‘ को भष्म कर ‘ क्षणांश ‘ भर सही
सारी क़ायनात- ही रौशन कर डाली..
जानता हूँ ,तुम्हारी देह का पुनरागमन नहीं होगा
पर धन्यवाद मित्र ..तुम्हारी ‘ अग्नि-काया ‘ के
दिव्य -प्रकाश ने हमें ‘ अग्नि-साक्षी ‘ बना दिया..
‘ अग्नि-साक्षी ‘ बना दिया भाई…
हाँ..अग्नि-साक्षी बना दिया
अब ‘ अग्नि -साक्ष्य ‘ बोलेगा..
हाँ..अग्नि की काया से गुजरे नज़र का साक्ष्य बोलेगा
दोष- रहित..संदूषण रहित तपा-तपाया साक्ष्य…
आकाश को गिरफ़्त में लिए कालिमा के विरुद्ध..!!

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1 Response

  1. Neelam Naveen Neel says:

    Prasoon parimal आपकी कविताएँ बेमिसाल हैं और ये एक कहानी की तरह है जैसे कोई काव्य कथा ।

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