प्रतिभा चौहान की पांच कविताएं

आज का दिन

शताब्दियों ने लिखी है आज

अपने वर्तमान की आखिरी पंक्ति

आज का दिन व्यर्थ नहीं होगा

चुप नहीं रहगी पेड़ पर चिड़िया

न खामोश रहेंगी

पेड़ों की टहनियाँ

न प्यासी गर्म हवा संगीत को पियेगी

न धरती की छाती ही फटेगी

अंतहीन शुष्कता में

न मुरझायेंगे हलों के चेहरे

नहीं कुचली जायेंगी बालियाँ बर्फ की मोटी बूँदों से

बेहाल खुली चोंचों को मिलेगी समय से राहत

नहीं करेगी तांडव नग्नता

आकाश गंगा की तरह

पीली सरसों से पीले होंगे बिटिया के हाथ

अबकी जेठ- घर – भर,

आयेगा तिलिस्मी चादर ओढ़े

न अब उड़ेगा ,न उड़ा ले जायेगा चेहरों के रंग

आँखों के सपने , दिलों की आस

भर देगा आँखों में चमक

आँखों से होता हुआ आँतों तक जायेगा

बुझायेगा पेट की आग ये बादल

आज के वर्तमान में।

हमारे हिस्से की आग

पत्थर सरीखे जज़्बात

एक टोकरी बासे फूल भर हैं

शब्दों का मुरझा जाना

एक बड़ी घटना है

पर चुप्पियों को तोड़ा जाना

शायद बड़ी घटना नहीं बन पायेगी कभी

इस रात्रि के प्रहर में

घुटे हुये शब्दों वाले लोगों की तस्वीर

मेरी करवटों सी बदल जाती है

खामोशी की अपनी रूबाइयाँ हैं

जिसका संगीत नहीं पी सकता कोई

सूरज की पहली किरन को रोकना

तुम्हारे बस की बात नहीं

न आखिरी पर चलेगा तुम्हारा चाबुक

थाम नहीं सकते तिल तिल मरते अँधेरे को

नहीं बना सकते तुम हमारे रंगों से

अपने बसंती चित्र

नहीं पी सकते

हमारे हिस्से की आग

हमारे हिस्से का धुँआ

हमारे हिस्से की धूप

हमारे हिस्से की हँसी

पत्थरों से फुट निकली है घास

नही रोक सकते उनका उगना , बढ़ना , पनपना

जिस पर प्रकृति की बूँद पड़ी है

अंतहीन सौम्यता की जुब़ान

अपनी भाषा चुपके तैयार कर रही है

जो खौफनाक आतंक को फटकार सके

कर सके विद्रोहियों से विद्रोह

सीना ताने , सच बोले,

जिसका संविधान की अचुसूची में दर्ज किया जाना जरुरी न हो

तब, यदि ऐसा होगा

हे भारत।।

वो इस ब्रह्माण्ड की

सबसे शुभ तारीख होगी।

मनुष्य होने का अर्थ

मनुष्य होने का अर्थ
मनुष्य मात्र होना ही नहीं
कल्पनाओं से परे जा कर
प्रेम की सर्वोच्चता को समझना
जानना सुनामियों के अंदर पनपते यथार्थ को,
देखना बारिश के पीछे के समस्त रहस्यों को ,
नापना समुद्र की गहराइयों को
मछलियों का संगीत गुनगुनाना
चांदनी की धवल रंग की किरणों का रहस्य

जिनसे बुना होना संपूर्ण आकाश का उजाला,
सीने के भीतर धधकती आग से उबलते हुए रक्त का

भाप बनकर आंखों से बहना

मनुष्य का मर कर जीवित होना
जीवित होते हुए भी मर जाना
कांटो में फूलों का पिरोया जाना
फूलों के साथ कांटों का होना
स्याही और रोशनी के खतों का लिखा जाना ,पहुंचाया जाना ,
शहीदों की शहादत
नागफनियों का स्वतः उग आना
गरल का व्यापार और रसों का पान किया जाना
तटों की तबाही का मंजर का दिलों में उगना,
सूरज का मस्तिष्क में डूबना
विलापों का आकाश तक जाकर टकराकर लौटना
लंबे इतिहासों का बदल जाना

आत्मविश्वास एवम संकल्पों को तोड़ा जाना समझना भी
मनुष्यता की सार्थकता है
मनुष्य होने का गुप्त एवं तार्किक संदेश है ।

माँ तुम जीवनधारा हो

निष्प्राण वस्तु में
गढ़ती भाग्य
इंद्र वरूण यम
अग्नि शिव की आराध्य
संसार स्थली पर
नवीन स्फूर्ति बन
अंशों में जीवन भरती राग
सुंदर, सुंदर तन ,सुंदर हृदया
वाक -आनंद विज्ञान और प्राण
झरना दरिया बन मुस्काई
चिंतन दर्शन सृजन
प्रेम की परछाई
संचित कर्म संस्कार

मनोभूमि पर उपजाती
निष्पक्ष, कोमल, निर्मल, उज्ज्वल
सूक्ष्म लोक में घटनाक्रम
अंतःचेतन में अदृश्य चेतना सी
घुलमिल जाती
आराध्य तुम ही साध्य
संभाव्य काव्य
मां तुम जीवनधारा हो

वजूद

विश्वास की
स्याही का पक्का रंग है ये प्यार
अब किस के बस की बात है इसको फीका करना
तुम्हें याद करना है मेरा पेशा नहीं है
यूँ समझ लो कि
तुम्हारी सांसों के धागे से बुना है
मेरा जीना मरना
मेरा वजूद
गुम हो गया है
तुम्हारी आंखों के सागर में
चाहत है
मेरी जज़्बातों की हर
नदी छुप जाए तुम्हारे सागर से सीने में
मुझे तो सिर्फ
तुम्हारी आंखों का रास्ता मालूम था
दिल के दरवाजे तो
तुमने खुद खोले हैं
अब
हमारी सोच के दायरे में
हमारे रिश्तों के बेशकीमती नगीने हैं
मैं इसे छू लेना चाहती हूँ
चलना चाहती हूं साथ-साथ
तुम्हारी परछाई की तरह।

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1 Response

  1. कृष्ण मनु says:

    प्रतिभा चौहान की कवितायें भावपूर्ण हैं ।
    – कृष्ण मनु

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