प्रतिभा सिंह की पांच कविताएं

1
किसी ने कहा
आदमी खूबसूरत है
मैंने कहा
पेड़ खूबसूरत है…

फिर आदमी की कुछ खूबसूरती
क्रोध ने,
कुछ ईर्ष्या ने,
कुछ लोभ ने,
कुछ द्वेष ने छीन ली ….

फिर छीन ली दिल ख्वाहिशों  ने
फिर एक दिन
आदमी ने
पेड़ के वज़ूद को मिटा डाला
खूबसूरती के फेर में
नदियों के रूख को अपने रिमोट से घुमाया
चट्टानों के  दिलों को दहलाकर
बना डाले दोराहे,तिराहे ,चौराहे

खूबसूरत पेड़
देखता रहा
सभी कृत्य …
जिसकी कोख में थी खूबसूरती
वो दुनिया को खूबसूरती बांटता रहा
हमेशा , कल भी ,आज भी ,
इंसानियत की आखिरी सांस तक
उसमें बांटने का जज़्बा था…..

और आदमी में लेने का ….

                2

मेरा आंखों से ढलकना
व्यर्थ है
गर तुम्हारे दिल की गहराई में
कोई आवाज न हो
बदल जाते हैं हर्फ़ किताबों के भी
दिल में शिद्दत से
जज्बातों का तूफान जो हो
बेकार है सारी दुनिया के रिश्ते
जिन की तर्ज पर होती हैं सियासत की बातें
जिससे चलते हैं सारी दुनिया के व्यापार
एक धागा काफी है
विश्वास का ,
पिरोने को प्यार  के अल्फाज जितने हैं
कबूतरों  के पांव
कभी बांधे नहीं समय ने
उड़ जाते हैं  वो परिन्देे हैं
जो लौट आये हैं वो अपने हैं…

                  3

पर्यावरण के लिए

पेड़ों पर हैं मछलियांँ
क्योंकि हमने छीन लिए हैं उनके समुद्र
हमने भेद दिए हैं,
उनकी आँखों में तीर
हमने छीन ली है उन की सिसकियाँ
जिससे वह अपने दर्द कहा करती थीं….

पेड़ों की पत्तियाँ हरी नहीं हैं
बादलों की रंगोली
अब दृश्य-मात्र
जिनसे बनते हैं सिर्फ़ रंगीन चित्र
वे नहीं भर सकते तुम्हारी दरारों में नमी
क्योंकि तुमने भेज दिए हैं
सीने में ज़ख़्म
जो भर चुके हैं दर्द के भारी बोझ से
अब वे बरसते नहीं
फट पड़ते है…..

                 4

[राष्ट्रीय चरित्र]

यूनान की ख़ूबसूरती,
रोम की विधि,
इस्राइल का मजहब,

हे देवों
भारत का धर्म तो
ईश्वरीय पूंजी का पुँज है

आकाश की गूँज है
सूरज की गठरी है

तुम धरती पर आकर देखो
उन्हें कर्मकाण्ड मिले हैं सौगात में
और मुझे तत्वज्ञान का दर्शन

उन्हें अभिमान है ईश्वर होने का
तो प्राणियों पर दया मेरा मौलिक स्वभाव

उनकी भेद भरी दृष्टि
तो मेरी एकात्म अनुभूति–बेमेल है

प्रदीप्ति अतीत से
छनकर आती सुनहरी धूप की गरमी
दीप्तिपूर्ण प्रिज्म की त्रिविमीय श्रृंखला है

पर
शायद तुम्हें अहसास भी नहीं
चन्द दिनों पूर्व उड़ता हुआ चाँद
नीली झील में गिर गया

जिसे ढूँढा गया
खेल के मैदान से विज्ञान की लैब तक
सुनो
कल रात्रि दूसरे देशों ने
उसे अपनी नीली झील से निकाल लिया

जानते हो ?
त्रासदी पूर्ण नाकामी में
उनकी खामियों की जड़ें
राष्ट्रीय चरित्र के अभाव में पोषित हो रही है

हे देव
अभी समय है
बिखेर दो धरा पर राष्ट्रीय रंग
गढ़ दो नया चरित्र

ओ धरा
अब जन्म दो
वीर सपूतों को
जो निकाल सकें उतराते हुए चाँद को
दिन रात के अथक प्रयत्नों में
अपनी देह-पाँवों को छलनी कर देने वाले ज़ज़्बों के साथ
जन्म-जन्मान्तर के लिए। ……

                        5

शायद कैक्टस के रहस्य
थार के रेगिस्तान में मिल जाएँ……

तब तुम अपने व्यक्तित्व की ऊपरी परत को छूना……

उभर आएगी आँखों में
एक ही तरह के कई प्रतिबिम्ब

फिर छूना भीतरी तह…….

धो देना तब बरसों से
गले में अटकी फाँस को ……..

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प्रतिभा  चौहान

जन्म– 10 जुलाई , हैदराबाद (आन्ध्र प्रदेश) में
शिक्षा– एमo एo( इतिहास ), एलo एलo बीo

प्रकाशन– वागर्थ, जनपथ, अक्सर, अंतिम जन,निकट, दैनिक भास्कर, हिन्दुस्तान, अमर उजाला, दैनिक जागरण, चौथी दुनिया, कर्तव्य-चक्र, जागृति, कृत्या, सरिता, वाक्-सुधा, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की संचयिका एवं जर्नल में लेख एवं कविता प्रकाशित।

  इसके अलावा देश के प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में लेख एवं कविता प्रकाशित एवं देश की विभिन्न भाषाओं में कविताओं का अनुवाद। देश के विभिन्न भागों में राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय सेमिनार में शिरकत व आलेख पठन ।

संप्रति– न्यायाधीश ,बिहार न्यायिक सेवा

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1 Response

  1. तेज साहू says:

    बहुत खूब 👌👍😊

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