प्रतिभा चौहान की पांच कविताएं

||हमारे फूल -तुम्हारे नक्शे||

तुम्हें उलझे हुए आदमी हो

तुम सुलझा नहीं  सके समय की लट को

तुमने नहीं सीखा खुशियों से खेलना

तुम्हें नहीं आता सीधे सरल सवालों का जवाब देना

तुमने तो यह भी नहीं समझा

कि डूबते हुए आदमी को तिनके का सहारा होता है

तुमने नहीं सीखा समंदर में उतराना

झंझावात भवर कुंड से नाव को बचाना

सीखा है बंद सात कोठरी के भीतर

चीखों को बंद करना

तुमने सीखा है अंकुश के बालों से सीने छलनी करना

सीख लिया गर्म कोलतार जैसे परमादेशों को

देह पर कैसे दागा जाता

तुमने अपनी निजी संस्कृति के हवन कुंड में

जिंदा लोगों की आहुतियां दी हैं….

पर वर्तमान को यह पसंद नहीं

उगते हुए पौधे

तुम्हारे साये के पीछे-पीछे चल रहे हैं

वह दिन दूर नहीं

जब हमारी फुलवारी के फूल

तुम्हारे बनाए नक्शों को रौंदेंगे….

 

||सुनहरा धुआँ||

मीलों से उतरता घना सुनहरा धुआँ
बढ़ रहा है मेरे पांव तक
पहली किलकारी
मिठास घुले मुंह
फैली मुस्कुराहटें….

मीलों से उतरता घना सुनहरा धुआं

बढ़ गया मेरे पांव से सर तक

पसीना सिलवटों में सिमटता जा रहा है ठेले पर

नसों में लहू की रफ्तार सौ किलोमीटर प्रति घंटा

चिंघाड़ती बसों के सायरन

दाएं-बाएं ,ऊपर-नीचे , शोर मचाते

भरे हुये बच्चे

बुलाती दाल चावल की खुशबू ………

उथल-पुथल

धक्का मुक्की

शोर मचाते

भागते चिलाते

गर्मी में खदबदाता शहर .

दुपट्टे में चमकती लड़कियों आंखें

रिक्शों साइकिलों की घंटियां

बात-बात पर

नाक नाक पर

झगड़ा झंझट

गुत्थम गुत्थी

शहर अभी अपनी जवानी में है

मीलों से उतरता धना सुनहरा धुआं

और गहरा हो चला

अपने पूरे शबाब पर है ……..

सिर पर बैठ गया ,खा गया परछाई भी

मीलों से उतरता घना सुनहरा धुआं

चढ़ रहा है पांव से ऊपर

पीछे-पीछे चढ़ रहे हैं

घने अंधेरों के कण

फिर कुछ ख्वाब …

कुछ कहे

कुछ अनकहे

फिर दूसरी दुनिया ….

 

||प्रेम का रोग||    

भीड़ में घिरे होने पर भी
अकेलेपन का कानून ,
मीठी खट्टी यादों के नियम
लागू हैं
और लागू है
तमाम दुनिया के सिद्धांत
अपनी-अपनी जगह
लांघ जाते हैं अक्सर देश की सीमाएं भी
वे सब
जो प्रतिनिधित्व करते हैं सारे जग के प्रेमियों का
पर कुछ लांघ नहीं पाते
अपने अहम और जिद को भी ….

सुस्ती में पेंडुलम भी नहीं बताता
समय
और रिश्तो की शांत धड़कन
और बढ़ते हुए फीकेपन को
कब लांघ जाता है प्रेम
पता ही नहीं चलता…..

भरते भरते
भारी हो गया है सर से पांव तक
दर्द है कि इंटरवीनस दौड़ता ही जा रहा है ……
पहन लिया कलावा
प्रेम के टुकड़े सा बंधा
शायद सुरक्षित है नसों में मेरे प्यार के कण
तुम्हारा सराय मेरा घर कब बन गया दिल को मालूम भी न चला ……

एक अनिवार्य शर्त
मुझे तुम्हारे मस्तिष्क के नीचे रहना होगा
मंजूरी का प्रमाण पत्र लिए
मुझे चलना था
अनगिनत तारों को पार करते हुए
और तुम तक पहुंचना आसान नहीं

तुम्हारी चुप्पी के बाबस्ता
ठहरे हुए पानी में
हजार हजार लहरों का बल
और दातों तले दबी कोई सिसकी
यह तटस्थता तुम्हारी है या समाज की या समय की
नहीं मालूम
मेरी पाँवों के नीले  निशानों में बसती है
तुम तक पहुंचने की कीमत
मैंने इंद्रधनुष से शायद नीला रंग उधार लिया
और कुछ उधार सतरंगी दुनिया
कर लो जज्ब़ मेरे नीले रंग को
और दे दो मुझे मुक्ति नीले रंग से….

शायद यही मेरी प्रार्थना है
और मेरे प्रेम का रंग भी..

एक ग़ज़ल

अपनी हकीकत पर मुझे इत्मिनान था
क्योंकि मेरी नजरों में  आसमान था
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खुली फिजा में होंगी राहत की बस्तियां
भटकती राहों को ऐसा  कुछ गुमान था
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मंजिल यूं ही नहीं मिली इन नुमाइंदों  को
कई रतजगे, कई मशवरे ,कड़ा इम्तिहान था
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उगा डाली सूखी दरारों में नमी की पत्तियाँ
पत्थरों में कहाँ  ऐसा  हौसला – ईमान था….

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नाम-  प्रतिभा चौहान
जन्म- 10 जुलाई , हैदराबाद (आन्ध्र प्रदेश) में
शिक्षा- एमo एo( इतिहास ), एलo एलo बीo

प्रकाशन- वागर्थ, जनपथ, अक्सर, अंतिम जन,निकट, दैनिक भास्कर, हिन्दुस्तान, अमर उजाला, दैनिक जागरण, चौथी दुनिया, कर्तव्य-चक्र, जागृति, कृत्या, सरिता, वाक्-सुधा, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की संचयिका एवं जर्नल में लेख एवं कविता प्रकाशित।

  इसके अलावा देश के प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में लेख एवं कविता प्रकाशित एवं देश की विभिन्न भाषाओं में कविताओं का अनुवाद। देश के विभिन्न भागों में राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय सेमिनार में शिरकत व आलेख पठन ।

संप्रति- न्यायाधीश ,बिहार न्यायिक सेवा

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